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नवम्बर 30, 2014

अरी ओ करुणा प्रभामय…अज्ञेय

जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया हैagyeya
उस दुख में नही जिसे बेझिझक मैने पिया है।
उस गान में जियो जो मैंने तुम्हें सुनाया है,
उस आह में नही जिसे मैंने तुमसे छिपाया है।

उस द्वार से गुजरो जो मैंने तुम्हारे लिए खोला है
उस अंधकार से नहीं जिसकी गहराई को
बार बार मैंने तुम्हारी रक्षा की भावना से टटोला है।

वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ, बुनूँगा,
वे काँटेगोखतो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ, चुनूँगा।

वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे हित बनाता हूँ, बनाता रहूँगा,
मैं जो रोड़ा हूँ, उसे हथौड़े से तोड़तोड़
मैं जो कारीगर हूँ, करीने से
सँवारता सजाता हूँ, सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुँचाने का
उदार उद्यम मेरा होः
फिर वहॉ जो लहर हो, तारा हो,
सोनतरी हो, अरुण सवेरा हो,
वह सब, ओ मेरे वर्ग !
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो।

(अज्ञेय)

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