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अप्रैल 27, 2011

एक रचना: पहला प्रसंग

प्राय: सोचता हूँ
दिल के भीतर कैद
यादों की वह कालकोठरी खोलूँ
जिसमें एक निर्दोष आत्मा
जाने कब से अनियत कालीन
दण्ड भुगत रही है।

खुद को
अपने भीतर बंदी रखना
कितनी बड़ी सजा है!

यही समय है
मुक्त्त कर दूँ उसे
या फिर निर्वासन ही दे दूँ
हमेशा-हमेशा के लिये,
सही
एक यही प्रायश्चित होगा।

जैसी करनी वैसी भरनी…
कैसा अतीत…
क्या इतना मुश्किल है
बिना विगत के जीना?
जी लूँगा…
एक और विष पी लूँगा।

उसे मुक्त्त करना ही होगा
पता नहीं – कोठरी छोटी हो गई है या कि
यादों का आकार बड़ा
दोनों ही एक दूसरे के लिये नाकाफी हैं।

सब कुछ धुंधुला-धुँधला सा है।
सचमुच मैं इतना उदार कब था
उसे दुख देना ही तो
मेरा सुख था।

यह कैसी बैचेनी है
जिस पर कोई लगाम नहीं है
जिसकी गति हलचल
और अस्थिरता पर कोई
विराम नहीं है।

कुछ करना ही होगा अब तो
इससे निजात पाने को
वह प्यास बुझाने को
जो एक नदी पीकर भी शांत नहीं होगी।

फिर भी
प्यास बुझाने की कोशिश
अपराध नहीं है।

लो हो गया निर्णय!

मुक्त्त करुँगा कैदी को कारा से!

{कृष्ण बिहारी}

एक रचना : दूसरा प्रसंग

एक रचना : तीसरा प्रसंग
एक रचना: निर्णायक प्रसंग

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