Posts tagged ‘Kamra’

अप्रैल 1, 2014

गंगा और महादेव… (राही मासूम रज़ा)

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो

मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाने जाग रही हैं

और मैं जिसमें तुलसी की रामायण से सरगोशी करके

कालीदास के मेघदूत से यह कहता हूँ

मेरा भी एक संदेश है।

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो

लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है

मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुँह पर फेंको

और उस योगी से कह दो- महादेव

अब इस गंगा को वापस ले लो

यह जलील तुर्कों के बदन में गढ़ा गया

लहू बनकर दौड़ रही है।

[राही मासूम रज़ा]

जनवरी 22, 2014

सर्दी के सफ़ेद बादल और रक्तिम लौ

सर्दी में बादल fireplace-001

पुकार लगाते तो हैं

पर बहुधा बिन पानी चले आते हैं

आते हैं

तो हर चीज को सफेदी से ढक देते हैं

चारों ओर ऐसा प्रतीत होता है

जैसे धुंध ने घर कर लिया हो

शामें धुंधला जाती हैं

मेरे कमरे में अंधियारा बढ़ जाता है

मैं गमन कर जाता हूँ

बीते काल में –

मोमबत्ती के हल्के प्रकाश से

भरे कमरे में!

जब आतिशदान में लकडियाँ जलती हैं

तो कभी भी बोल नहीं पाता हूँ

बस खो जाता हूँ

आग की लपटों से बनती बिगड़ती आकृतियों में|

तुम्हारी त्वचा का गोरापन ओढ़ने लगता है

हल्का लाल-गुलाबी रंग

जब तपन की गहन तरंगें

और लालसा घेर लेती है

तुम्हारा खूबसूरत चेहरा

दमकने लगता है ऐसे

जैसे तालाब से कमल खिलकर निकलना शुरू करने लगता है

जिस्मानी  उतार चढ़ाव

चमकने लगते हैं

और एक गर्म एहसास चारों ओर बहने लगता है

और तुम्हे और मुझे अपने पंखों में समेट लेता है

सब कुछ उड़ने लगता है

ऐसे जैसे सब कुछ बादल ही हो गया है

कमरे में निस्तारित होने लगता है

श्वेत धीरे-धीरे लाल में

ऐसा लगने लगता है

हमारे जिस्म पिघल जायेंगे

मोमबत्ती की लौ

मोटी हो और तेजी से जलने लगती है

बादल रक्तिम लाल हो जाते हैं

और मुझे प्रतीत होता है

कि सर्दी के बादल लाल तप्त हो गये हैं

और वास्तव में

वे बिन पानी के ही हैं!

Yugalsign1

दिसम्बर 12, 2013

कब खुलेंगे रौशनदान?

कर्मगति पर अकर्मण्यताyadein-001

फिसलन की हरियाली-रपटीली राह

बंद कमरों में कैद

बुद्धि और चेतनता –

कोई तो राह होगी?

जहां पर दृष्टि ठहरे पार पथ के –

जहाँ पर त्वरित हो जीवन शक्ति

हो प्रकाशित किसी सार्थक संकल्प से

पर होगी कब मुक्ति मन की-

कब खुलेंगे बंद कमरों के रौशनदान?

Yugalsign1

दिसम्बर 1, 2013

ये क्या जिद ले बैठा

सुकून भी गया था एक बार मंदिर में,

पर

hoffman-001घडियालों के शोर से घबरा कर भाग आया|

सोचता हूँ बंद कमरे में गुमसुम बैठा,

ले बैठा मैं ये जिद,

ये क्या जिद मैं ले बैठा?

अपनों के आजमाने से आजिज आकर,

गैरों की तरफ कदम बढाए,

अब ये बैचेनी और बेबसी है मेरी कि

दोनों ही तरफ,

एक से लोग नजर आए हैं|

Yugalsign1

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