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जनवरी 21, 2014

अरविन्द केजरीवाल : एक धरना और सहूलियत को खांसी

नई राहें बताता है नये रास्ते दिखाता हैarvind sleep

नहीं मालूम जालिम (…) रहजन है कि रहबर है 
जब प्रकृति भी बारिश और सर्द हवाओं के जरिये भारत देश की राजधानी दिल्ली में वी.आई.पी क्षेत्र में खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठे अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों एवं समर्थकों के हौसले, उनकी सच्चाई और ईमानदारी में निष्ठा को कसौटी पर कस रही है तब अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के उद्देश्यों में पूरी निष्ठा रखने वाले लोगों को ही  आशा है कि जल्द ही सूरज निकलेगा और पूर्णतया स्वच्छ आकाश में पहले से ज्यादा लुभावनी छटा और चमक दिखायेगा और बाकी लोगों को संदेह ने घेर लिया है| इन् बाकी लोगों में ज्यादातर ऐसे हैं जिनका कभी भी जनांदोलनों में विश्वास नहीं रहता और व्यवस्था के विरोध मात्र से उन्हें कंपकंपी छूटने लगती है| ‘आप‘ की दिल्ली विधानसभा में मिली सफलता ने इन् शंकालुओं में से बहुतों को ‘आप‘ की ओर और इस विचार की ओर धकेला कि शायद अब आगे ‘आप‘ का हे ज़माना रहेगा और यही व्यवस्था भारत में चलेगी सो बेहतर है थोड़ा पहले ही ‘आप‘ के साथ हो लो, बच्चों और नाती पोतों को कहने को भी हो जाएगा कि एक बदलते समय में वे बदलाव लाने वालों के साथ खड़े थे|

पर उन्हें आशा नहीं थी कि अरविन्द केजरीवाल सरकार बनाने के बावजूद कबीर की तरह बीच बाजार लठ लेकर खड़े हो जायेंगे और सत्ता और व्यवस्था को ललकारेंगे कि जनता के हक उसको दो नहीं तो उन्हें भी चैन से सोने नहीं दिया जाएगा|

ये बड़े आनंद का विषय है कि ‘आप‘ के स्थायी और अस्थायी विरोधीगण पानी पी पीकर ‘आप‘ को कोस रहे हैं कि ‘आप‘ अराजकता फैला रही है और और भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं कि यह खत्म हो जायेगी| अरे, ‘आप‘ अगर खत्म हो जायगी तो इन्हें तो खुश होना चाहिए कि इनके मार्ग का काँटा अपने आप दूर हो गया पर इनके चेहरे की हवाइयां कुछ और ही बयान कर रहे हैं| कांग्रेस और भाजपा के नेता क्यों इतने परेशान हैं अगर ‘आप‘ वाले गलत कर रहे हैं| अगर वे संविधान अपने हाथों में ले रहे हैं तो उन्हें उठाकर जेल में ठूंस दो और अगर वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं तो आनंद मनाओ कि आगामी लोकसभा चुनाव में फिर से चुनावी समर दो सत्ताभोगी अनुभव प्राप्त दलों के बीच ही होगा और कोई एक शक्ति सरकार बनाएगी|

जिन्हें लग रहा है कि सब प्रचार के लिए हो रहा है उन्हें क्या किसी ने रोका है, निकलो घर से बाहर, सर्द रातें खुले आसमान के नीचे बिताओ और अपने दलों के लिए वोट जुटाओ| जनहित के मुद्दों पर कष्ट सहकर वोट जुटाएंगे तो जनता अपने आप उनका सम्मान करने लगेगी|

शरीर की अपनी सीमाएं हैं और सड़क पर भयंकर सर्दी में रात में सोकर सुबह उठने पर बीमार अरविन्द केजरीवाल का चेहरा तो लाजिम था कि इस बात की गवाही देता कि स्थितियां उनके शरीर पर असर डाल रही हैं पर उनके हौसले तो बीते दिन से भी ज्यादा मजबूत दिखाई दिए|

तेरी सुबह बता रही है तेरी रात का अफसाना

सुबह जैसा चेहरा लिए ‘आप‘ विरोधी तंत्र सक्रिय हुआ है उससे पता चलता है कि रात अरविन्द केजरीवाल पर नहीं पर इस तंत्र पर भारी बीती है|

और अगर ‘आप‘ सिर्फ और सिर्फ दिल्ली की सीमाओं में फैला एक संकीर्ण आंदोलन मात्र है तो क्यों परेशान हो रहा है ‘आप‘ विरोधी तंत्र?

कहते हैं एक चित्र हजारों शब्दों से ज्यादा सजीव होता है सन्देश देने के लिए| नीचे दिया चित्र भी कुछ कह रहा होगा|

संसार जानता है थोड़े से लोग बहुतों से अधिक हैं!

arvindkejriwal

विगत में देश को कई मर्तबा अराजकता के दलदल में धकेलने वाले भी गले फाड़ फाड़ चिला रहे हैं कि देश अराजकता की ओर ले जाया जा रहा है ‘आप‘ द्वारा|

बहुत साल नहीं बीते – भाजपा के उस समय के अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी देश भर में रथ यात्रा करते हुए नफ़रत के कण बिखेरते चलते हैं, भाजपा का मुख्यमंत्री (कल्याण सिंह) हलफनामा देता है, और पार्टी के बड़े बड़े नेता (लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, और उमा भारती आदि इत्यादि) भीड़ इकट्ठा करके इतिहास (रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का विवादास्पद ढांचा तोड़ना) से छेड़खानी करके देश को साम्प्रदायिक दंगों के हवाले कर देते हैं और ऐसे सीधे, भोले और भले लोग आज अराजकता की बातें कर रहे हैं जबकि सारी दिल्ली जानती है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले बिना और बिना क़ानून व्यवस्था को दिल्ली राज्य सरकार के अधीन बनाए बिना दिल्ली में सरकार (कोई भी दल सरकार बनाए) ढंग से दिल्लीवासियों की सेवा नहीं कर सकती| अगर कोई प्रस्ताव सालों से अटका हुआ है और दिल्ली में क़ानून व्यवस्था का ठीकरा दिल्ली सरकार के सिर फोड़ा जा रहा हो तो दिल्ली के मुख्यमंत्री को केन्द्र के सामने दबाव तो बनाना ही पड़ेगा कि पहले क़ानून व्यवस्था दिल्ली सरकार के अधीन करो और उसके बाद सरकार का प्रदर्शन देखो|

केन्द्र सरकार सरकारी दिल्ली (लुटियंस जोन्स) को छोड़कर बाकी सारी दिल्ली की क़ानून व्यवस्था दिल्ली सरकार के अधीन कर सकती है|

दिल्ली पुलिस अरविन्द केजरीवाल की ‘आप‘ सरकार के अधीन होगी तो इतना तो निश्चित है कि बी.एम्.डब्लू एक्सीडेंट केस, प्रियदर्शनी मट्टू, नीतिश कटारा और जेसिका लाल हत्याकांडों जैसे मामलों में कितना भी प्रभावी व्यक्ति न हो, पुलिस के ऊपर दबाव नहीं बना पायेगा और मृतक के परिवार वालों को केस में शुरू से ही क़ानून का निष्पक्ष साथ मिलेगा|

जनकवि सालों साल इस आशा में दिमाग, कलम और गले का उपयोग कर करते रहे कि कभी तो कोई नायक उठेगा जनसाधारण के हितों के लिए और ऐसे जनकवियों को रात दिन अपने लेखों और भाषणों में याद कर करके अपने को जनता से जुड़ा बताने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग और मुँह में भरी सर्दी में दही जम गया है जब सामने घटनाएं हो रही हैं और अब आग से खेलने की बात करने वाले एक सुर में गा रहे हैं – ज्यादा हो रहा है| इनके पूर्वजों के जीवन के घटनाक्रमों की मैपिंग संभव हो तो पाया जाएगा विगत में वे गांधी, सुभाष, भगत सिंह आदि और उनके कर्मों को भी ऐसे ही संशय में खड़े देखते रहे होंगे और सोच रहे होंगे कहाँ फंसा रहे हैं ये बंदे, थोड़ी बहुत परेशानी है गुलामी में पर अब तो आदत हो गई है सो चलने दो|

उलजलूल  तर्क देने वाले लोगों को कोई समझदार व्यक्ति समझाए कि उन्हें इस बात पर ऊर्जा लगानी चाहिए कि कैसे केन्द्र सरकार दिल्ली की क़ानून व्यवस्था को दो भागों में विभक्त करके वीआईपी लुटियंस जोन की सुरक्षा केन्द्र के पास रखकर बाकी सारी दिल्ली की क़ानून व्यस्था की जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से दिल्ली सरकार के हाथों में दे सकती है| इन्ही पुलिस वालों की क्षमता निखर कर सामने आयेगी ईमानदार और जवाबदेह सरकार के साथ काम करने से|

कहा जा रहा है कि एक केन्द्रीय मंत्री के घर का शीशा टूटने पर सुरक्षा में तैनात बारह -तेरह पुलिसकर्मी निलंबित या बर्खास्त कर दिए गये थे अब इतने सक्रिय तंत्र को क्या हो गया है?

दिल्ली में कानून दिल्ली सरकार के हाथ में नहीं है, और केन्द्र के गृह मंत्री और केन्द्र सरकार के सामने इस प्रश्न पर दिल्ली सरकार भी आम आदमी जैसी ही बेबस है| विचित्र लगते हैं लोगों के तर्क कि दिल्ली में अपराध होते रहें और दिल्लीवासी इस द्वंद में फंसे रहें कि उनकी अपनी सरकार से कैसे इस मामले में काम करवाया जाए? क्या दो राज्यों की सीमाओं पर क़ानून व्यवस्था बिगड जाती है? चंडीगढ और पंचकूला में दिक्कते आ रही हैं? अगर नहीं तो कैसे केन्द्र और दिल्ली राज्य सरकार के बीच कानून व्यवस्था को लेकर स्पष्ट विभाजन होने से समस्या हो जायेगी? यह एक ज्वलंत समस्या है और केन्द्र सरकार को अपनी पूरी क्षमता इसका समाधान देने में लगा देनी चाहिए| समस्या को ताला क्यों जा आरहा है? अरविन्द केजरीवाल की सरकार तो भागने वाली है नहीं इस समस्या से मुँह मोड़कर, आज केन्द्र की सत्ता उन्हें वहाँ से हटा सकती है, जेल में बंद कर सकती है पर जब भी वे आजाद होंगे यही मांग उठाते रहेंगे| दिल्ली राज्य का वाजिब हक उसे दे दो और सर्वत्र शान्ति बरपा दो|

एक बात तो तय है कि अरविन्द केजरीवाल नामक ऊर्जा नखदंत विहीन दिल्ली सरकार में जाया करने के लिए नहीं है| केन्द्र सरकार और पुराने दलों को भली भांति समझ लेना चाहिए कि जनता अब इस जागृति से भर चुकी है कि

सरकारें देश के लिए होती हैं, देश सरकारों के लिए नहीं होता|

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