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नवम्बर 10, 2013

मजनूँ कहीं के

crescent
कल शाम चाँद देखा

वही,

कालिमा पर

रेखाओं की

सुनहली छटा बिखेरता|

प्याले सा चन्दा

तारों की सोहबत में

बिगड सा गया है

मुसकराता है,

मुझे मुँह चिढ़ाकर

मेरी खिड़की के पार

जब तकिये में सिर घुसा,

फिर सिर उठाकर

मैं देखता हूँ उसे

कहता है,

भंवे

टेढी करके

बाईं आँख दबाकर-

“मजनूँ कहीं के”

Yugalsign1

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