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जनवरी 14, 2014

दोपहर, साथ, नींद और पलायन

इस तरह तो न थे, हम-तुम! avishkar-001

दुश्वारियां जिंदगी की तो पता थीं

कल भी|

ये फिरकते वृत्त है रौशनी के

किनारियाँ अंधेरों की तो पता थीं

कल भी|

बुद्धू बुद्ध की नींद भी गहरी

लाचारियाँ असमंजसों की तो पता थीं

कल भी|

सयानेपन की तुम्हारे भी सीमाएं हैं

पारियां बचपने की मेरी तो पता थीं

कल भी|

निर्वात तोडता है देह का चुम्बक

सीढियां लम्बी समाधानों की तो पता थीं

कल भी|

रिश्ते हैं कई मेरे और तुम्हारे तईं

गारियाँ सर्द अबोलों की तो पता थीं

कल भी|

कई तो हैं संजोग, ऐसे-वैसे

कलाकारियाँ कायनात की तो पता थीं

कल भी|

सिर्फ बोलों के आईने में रिश्तों का सच

दीवारियाँ रंग-ऐ-नस्ल की तो पता थीं

कल भी|

अपने-अपने सुखों में चटख आए दुख

बीमारियाँ सुखों -दुखों की तो पता थीं

कल भी|

प्यार भरे वो तरंगित, शर्मीले स्पंदन

यारियाँ दिल से दिल की तो पता थीं

कल भी|

Yugalsign1

नवम्बर 16, 2013

हर प्रीत नूतन है!

पांच बरस लंबी सड़क पर AB-001

पता नहीं सोता सा चला था शायद !

कि,

हर नया दिन,

पुराने का हिस्सा नहीं लगता|

लगता है, सड़क भी बनी है,

टुकड़ों-टुकड़ों में!

कल की याद ही नहीं कुछ-

बस अहसास भर होता है कि

कुछ गुजरा भर था|

मुझे कुछ याद नहीं है-

न परिणय

न चुम्बन

न कलह

जब तुमसे मिलता हूँ,

लगता है फिर कोंपलें फूट आई हैं

फिर नया सवेरा है

और हर बात,

हर प्रीत नूतन है|

Yugalsign1

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