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दिसम्बर 11, 2013

जो हो रहा है वह रुकता नहीं, हो ही जाता है : ओशो

Osho-Mahaveer
ओशो सदेह उपस्थित होते तो आज 11 दिसम्बर को अपनी आयु के 82 साल पूरे कर रहे होते| उनकी सदेह उपस्थिति के समय भी कुछ हजारों को छोड़ बाकी संसार का उनसे मिलना उनकी किताबों, ऑडियो टेपों और वीडियो टेपों के द्वारा ही होता था सो उस लिहाज से उनके देह त्याग का उनकी सार्थकता पर कोई असर नहीं पड़ा है और उनकी सार्थकता बढ़ती ही जा रही है| उनसे परिचय न हो तो आदमी केवल नाम और उस नाम की छवि के बारे में प्रचलित धारणाओं से प्राभावित हो कैसे भी विचार उनके बारे में बनाए रख सकता है और रखता है पर देर सिर्फ उनसे एक मुलाक़ात की होती है फिर हरेक व्यक्ति का जीवन दो खण्डों में बंटता है, ओशो से मिलने से पहले ओशो से मिलने के बाद| कोई स्वीकार न करे यह अलग बात है पर ओशो उसे प्रभावित न करें ऐसा संभव है नहीं|

ओशो ने धरती पर मानव जीवन में जो भी और किसी भी काल में श्रेष्ठ घटा या उत्पन्न हुआ उसे समय की गर्त से निकाल आधुनिक मानव के समक्ष आज की समझदारी के हिसाब से रखा और आज की जरुरत के अनुसार अपने अस्तित्व के अंदर से नया भी जन्माया|

जो कार्य शुरू हो गया वह रुकता कभी नहीं| वह क्रिया अपनी पूर्णता को अवश्य ही प्राप्त करती है भले ही शुरू करने वाला व्यक्ति परिदृश्य से अनुपस्थित हो जाए|

एक अन्य महत्वपूर्ण बात वे ज्योतिष को समझाते हुए कहते हैं कि जो हमें अभी दिख रहा है या जैसा हमने विगत में घाटे के अनुसार समझा है केवल वही सत्य नहीं है सत्य तभी पूर्ण होता है जब वह भूत,वर्तमान और भविष्य के तीनों कालखंडों में पूर्ण आकार के साथ देख लिया जाए| भविष्य हमसे अज्ञात है इसलिए हमें पूर्ण सत्य के दर्शन होने बहुत मुश्किल होते हैं| भूत ने ही नहीं वर्तमान को रचा है बल्कि भविष्य में से भी कुछ है जो बात को, घटना को एक निश्चित आकार दे रहा है|

जीवन में बहुत सारी घटनाओं के सन्दर्भ में इस बात को समझा जा सकता है|

ओशो महावीर के जीवन के सहारे अपनी बात कहते हैं|

महावीर के जीवन में एक घटना का उल्लेख है, जिस पर एक बहुत बड़ा विवाद चला। और महावीर के अनुयायियों का एक वर्ग टूट गया। और पाँच सौ महावीर के मुनियों ने अलग पंथ का निर्माण कर लिया उसी बात से। महावीर कहते थे जो हो रहा है वह एक अर्थ में हो ही गया है। अगर आप चल पड़े तो एक अर्थ में पहुंच ही गए।  अगर आप बूढ़े हो रहे है तो एक अर्थ में बूढ़े हो ही गए।

      महावीर कहते थे, जो हो रहा है, जो क्रियमाण है—वह हो ही गया। महावीर का एक शिष्‍य वर्षा काल में महावीर से दूर जा रहा था। उसने अपने एक शिष्‍य को कहा कि मेरे लिए चटाई बिछा दो। उसने चटाई बिछानी शुरू की। मुड़ी हुई, गोल लिपटी हुई चटाई को उसने थोड़ा सा खोला, तब महावीर के उस शिष्‍य को ख्‍याल आया कि ठहरो, महावीर कहते है—जो हो रहा है वही हो ही गया। तू आधे में रूक जा, चटाई खुल तो रही है, लेकिन खुल नहीं गयी है—रूक जा।
      उसे अचानक ख्‍याल हुआ कि यह तो महावीर बड़ी गलत बात कहते हे। चटाई आधी खुली है, लेकिन खुल कहां गई है। उसने चटाई वहीं रोक दी। वह लौटकर वर्षा काल के बाद महावीर के पास आया और उसने कहा कि आप गलत कहते है कि जो हो रहा है, वह हो ही गया। क्‍योंकि चटाई अभी भी आधी खुली रखी है—खुल रही थी, लेकिन खुल नहीं गई। तो मैं आपकी बात गलत सिद्ध करने आया हूं। महावीर न उससे जो कहा,वह नहीं समझ पाया होगा, वह बहुत बुद्धि का राह होगा, अन्‍यथा ऐसी बात लेकर नहीं आता।
      महावीर ने कहा, तूने रोका—रोक ही रहा था….ओर रूक ही गया। वह जो चटाई तू रोका—रोक रहा था…रूक गया। तूने सिर्फ चटाई रुकते देखी,एक और क्रिया भी साथ चल रही थी, वह हो गयी। और फिर कब तक तेरी चटाई रुकी रहेगी। खुल नी शुरू हो गयी है—खुल ही जाएंगी….तू लोट कर जा वह जब लौटकर गया तो देखा  एक आदमी खोलकर उस पर लेटा हुआ है। विश्राम कर रहा था। इस आदमी ने सब गड़बड़ कर दिया। पूरा सिद्धांत ही खराब कर दिया।
      महावीर जब यह कहते थे जो हो रहा है वह हो ही गया तो वह हय कहते थे, जो हो रहा है वह तो वर्तमान है, जो हो ही गया वह भविष्‍य है। कली खिल रही है। खिल ही गई—खिल ही जाएगी। वह फूल तो भविष्‍य में बनेगी, अभी तो खिल ही रही है। अभी तो कली ही है। जब खिल ही रही है तो खिल ही जाएगी। उस का खिल जाना भी कहीं घटित हो गया।
      अब इसे हम जरा और तरह से देखें, थोड़ा कठिन पड़ेगा।
      हम सदा अतीत से देखते है। कली खिल रही है। हमारा जो चिन्‍तन है, आमतौर से पास्‍ट ओरिएंटेड़ है, वह अतीत से बंधा है। कहते है कली खिल रही हे, फूल की तरफ जा रही है। कली फूल बनेगी…लेकिन इससे उल्‍टा भी हो सकता है। यह ऐसा है जैसे मैं आपको पीछे से धक्‍के दे रहा हूं, आपको आगे सरका रहा हूं। ऐसा भी हो सकता है कोई आपको आगे खींच रहा हो। गति दोनों तरफ हो सकती है। मैं आपको पीछे से धक्‍का दे रहा हूं,और आप आगे जा रहे हो।
      ज्‍योतिष का मानना है कि यह अधूरी है दृष्टि कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य हो रहा हे।
पूरी दृष्‍टि यह है कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य खींच रहा है। कली फूल बन रही है,इतनी ही नहीं—फूल कली को फूल बनने के लिए पुकार रहा है। खींच रहा है, भविष्‍य आगे हे। अभी वर्तमान के क्षण में एक कली है। पूरा अतीत धक्‍का दे रहा हे। खुल जाओ। पूरा भविष्‍य आह्वान दे रहा है, खुल जाओ, अतीत और भविष्‍य दोनों के दबाव में कली फूल बनेगी।
      अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत अकेला फूल न बना पाएगा। क्‍योंकि भविष्‍य में आकाश चाहिए फूल बनने के लिए। भविष्‍य में जगह चाहिए स्‍पेस चाहिए। भविष्‍य स्‍थान दे तो ही कली फूल बन पाएगी। अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत कितना ही सिर मारे, कितना ही धक्‍का माने—मैं आपको पीछे से कितना ही धक्‍का मारू, या दूँ।  लेकिन सामने एक दीवार हो तो मैं आपको आगे न हटा पाऊँ गा। आगे जगह चाहिए। मैं धक्‍का दूँ और आगे की जगह आपको स्‍वीकार कर ले, आमंत्रण दे-दे कि आ जाओ,अतिथि बना लें, तो ही मेरा धक्‍का सार्थक हो पाए। मेरे धक्‍के के लिए भविष्‍य में जगह चाहिए। अतीत काम करता है भविष्‍य जगह देता है।
      ज्‍योतिष की दृष्‍टि यह है कि अतीत पर खड़ी हुई दृष्‍टि अधूरी है, आधी—वैज्ञानिक हे, भविष्‍य पूरे वक्‍त पुकार रहा है, पूरे वक्‍त खींच रहा है। हमें पता नहीं हमें दिखाई नहीं पड़ता। यह हमारी आँख की कमजोरी है, यह हमारी दृष्‍टि की कमजोरी है। हम दूर नहीं देख पाते हमें कल कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।

ओशो की इस दृष्टि को हम आज के भारत पर लागू करें तो भारत से गलत को, बुराई को, भ्रष्टाचार को हटाने का जो कार्य शुरू हुआ है वह रुकेगा नहीं और अपनी पूर्णता को प्राप्त करके रहेगा| अगर ऐसी संभावना न होती तो इतना भी न होता|

जून 5, 2013

आत्महत्या : जीने की इच्छा (ओशो)

osho dancingकहा जाता है कि अभिनेता-निर्देशक गुरुदत ने आत्महत्या की थी, और इस बात को मानने वाले इस बात को स्वीकार नहीं करते कि शराब और नींद की गोलियों के मिश्रण से यह एक दुर्घटना मात्र भी हो सकती थी पर तब भी यह प्रश्न उठना तो वाजिब है ही कि वे शराब और नींद की गोलियों के नशे के आदि क्यों बने| इन नशों की लत कहीं न कहीं यह दर्शाती ही है कि वे जीवन का मूल्य कम करके आंकने लगे थे और कहीं न कहीं उनकी नशे की लत उनके जीवन को समय पूर्व ही मौत की ओर ले जा रही थी| ऐसे बहुत से कलाकार हुए हैं जिन्होने आत्महत्या की और ऐसा नहीं कि इनमे वे लोग हैं जिनके जीवन में असफलता ज्यादा थी| ऐसे ऐसे कलाकारों ने भी आत्महत्या का सहारा लेकर जीवन का परित्याग कर दिया जो बेहद सफल थे| इससे यही साबित होता है कि कुछ लोगों में कहीं न कहीं जीवन को त्यागने की इच्छा का बीज छिपा रहता है और किसी भी तरह की समस्याओं से घिरने पर वह बीज अंकुरित हो उठता है और ऐसे लोगों में से कुछ लोग आत्मघात की ओर चले जाते हैं वरना ऐसे लोग भी देखने में आ सकते हैं जिनके दुखों की दास्तान सुनकार रोंगटे खड़े हो जाएँ और सुनने वाला सोचने पर मजबूर हो जाए कि यह आदमी जी कैसे रहा है?
ज्योतिष और अध्यात्म के संबंध पर बोलते हुए ओशो ने जीने की इच्छा और मरने के लिए बहाना ढूँढने की प्रवृत्ति पर भी एक बेहद अच्छी कथा के माध्यम से प्रकाश डाला है|

उन्होने महावीर स्वामी, कभी उनके शिष्य रहे गोशालक और जीने की इच्छा के बारे में एक कथा कही है। इस कथा में सुसाइडल इंस्टिक्ट और जीने की प्रबल इच्छा पर बेहद गहरी समझ उन्होने दुनिया को देकर उसे समृद्ध बनाया है।

प्रस्तुत है वही अनूठी कथा।

महावीर एक गांव के पास से गुजर रहे हैं। और महावीर का एक शिष्य गोशालक उनके साथ है, जो बाद में उनका विरोधी हो गया। एक पौधे के पास से दोनों गुजरते हैं।

गोशालक महावीर से कहता है कि सुनिए, यह पौधा लगा हुआ है। क्या सोचते हैं आप, यह फूल तक पहुंचेगा या नहीं पहुंचेगा? इसमें फूल लगेंगे या नहीं लगेंगे? यह पौधा बचेगा या नहीं बचेगा? इसका भविष्य है या नहीं?

महावीर आंख बंद करके उसी पौधे के पास खड़े हो जाते हैं।

गोशालक पूछता है कि कहिए, आंख बंद करने से क्या होगा? टालिए मत।

उसे पता भी नहीं कि महावीर आंख बंद करके क्यों खड़े हो गए हैं। वे एसेंशियल की खोज कर रहे हैं। इस पौधे के बीइंग में उतरना जरूरी है, इस पौधे की आत्मा में उतरना जरूरी है। बिना इसके नहीं कहा जा सकता कि क्या होगा।

आंख खोल कर महावीर कहते हैं कि यह पौधा फूल तक पहुंचेगा।

गोशालक उनके सामने ही पौधे को उखाड़ कर फेंक देता है, और खिलखिला कर हंसता है, क्योंकि इससे ज्यादा और अतर्क्‍य प्रमाण क्या होगा? महावीर के लिए कुछ कहने की अब और जरूरत क्या है? उसने पौधे को उखाड़ कर फेंक दिया, और उसने कहा कि देख लें। वह हंसता है, महावीर मुस्कुराते हैं। और दोनों अपने रास्ते चले आते हैं।

सात दिन बाद वे वापस उसी रास्ते पर लौट रहे हैं। जैसे ही महावीर और वे दोनों अपने आश्रम में पहुंचे जहां उन्हें ठहर जाना है, बड़ी भयंकर वर्षा हुई। सात दिन तक मूसलाधार पानी पड़ता रहा। सात दिन तक निकल नहीं सके। फिर लौट रहे हैं। जब लौटते हैं तो ठीक उस जगह आकर महावीर खड़े हो गए हैं जहां वे सात दिन पहले आंख बंद करके खड़े थे। देखा कि वह पौधा खड़ा है। जोर से वर्षा हुई, उसकी जड़ें वापस गीली जमीन को पकड़ गईं, वह पौधा खड़ा हो गया।
महावीर फिर आंख बंद करके उसके पास खड़े हो गए, गोशालक बहुत परेशान हुआ। उस पौधे को फेंक गए थे। महावीर ने आंख खोली।

गोशालक ने पूछा कि हैरान हूं, आश्चर्य! इस पौधे को हम उखाड़ कर फेंक गए थे, यह तो फिर खड़ा हो गया है!

महावीर ने कहा, यह फूल तक पहुंचेगा। और इसीलिए मैं आंख बंद करके… खड़े होकर इसे देखा! इसकी आंतरिक पोटेंशिएलिटी, इसकी आंतरिक संभावना क्या है? इसकी भीतर की स्थिति क्या है? तुम इसे बाहर से फेंक दोगे उठा कर तो भी यह अपने पैर जमा कर खड़ा हो सकेगा? यह कहीं आत्मघाती तो नहीं है, सुसाइडल इंस्टिंक्ट तो नहीं है इस पौधे में, कहीं यह मरने को उत्सुक तो नहीं है! अन्यथा तुम्हारा सहारा लेकर मर जाएगा। यह जीने को तत्पर है? अगर यह जीने को तत्पर है तो…मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंक दोगे।

गोशालक ने कहा, आप क्या कहते हैं?

महावीर ने कहा कि जब मैं इस पौधे को देख रहा था तब तुम भी पास खड़े थे और तुम भी दिखाई पड़ रहे थे। और मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंकोगे। इसलिए ठीक से जान लेना जरूरी है कि पौधे की खड़े रहने की आंतरिक क्षमता कितनी है? इसके पास आत्म-बल कितना है? यह कहीं मरने को तो उत्सुक नहीं है कि कोई भी बहाना लेकर मर जाए! तो तुम्हारा बहाना लेकर भी मर सकता है। और अन्यथा तुम्हारा उखाड़ कर फेंका गया पौधा पुनः जड़ें पकड़ सकता है।

गोशालक की दुबारा उस पौधे को उखाड़ कर फेंकने की हिम्मत न पड़ी; डरा।

पिछली बार गोशालक हंसता हुआ गया था, इस बार महावीर हंसते हुए आगे बढ़े।

गोशालक रास्ते में पूछने लगा, आप हंसते क्यों हैं?

महावीर ने कहा कि मैं सोचता था कि देखें, तुम्हारी सामर्थ्य कितनी है! अब तुम दुबारा इसे उखाड़ कर फेंकते हो या नहीं?

गोशालक ने पूछा के आपको तो पता चल जाना चाहिए कि मैं उखाड़ कर फेंकूंगा या नहीं।

तब महावीर ने कहा, वह गैर अनिवार्य है। उखाड़ कर फेंक भी सकते हो। अनिवार्य यह था कि पौधा अभी जीना चाहता था। उसके पूरे प्राण जीना चाहते थे, वह अनिवार्य था। वह एसेंशियल था। यह तो गैर अनिवार्य है, तुम फेंक भी सकते हो, नहीं भी फेंक सकते हो। यह तुम पर निर्भर हे। लेकिन तुम पौधे से कमजोर सिद्ध हुए हो—हार गए।

महावीर से गोशालक के नाराज हो जाने के कुछ कारणों में एक कारण यह पौधा भी था।

जिस ज्‍योतिष की मैं बात कर रहा हूं उसका संबंध अनिवार्य से एसेंशियल से फाउण्‍ड़ेशनल से है। आपकी उत्‍सुकता ज्‍यादा से ज्‍यादा सेमी एसेंशियल तक आती है। पता लगाना चाहते हे कि कितने दिन जियूंगा, मर तो नहीं जाऊँगा, जीकर क्‍या करूंगा। जी ही लुंगा तो क्‍या करूंगा, आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती। मरूंगा तो मरने के बाद क्‍या करूंगा। इस तक भी आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती। घटनाओं तक पहुँचती है, आत्‍माओं तक नहीं पहुँचती। जब मैं जी रहा हूं तो यह तो घटना है सिर्फ—जीकर मैं क्‍या हूं। वह मेरी आत्‍मा होगी। हम सब मरेंगे। मरने के मामले में सबकी घटना होगी। लेकिन मरते क्षण में मैं क्‍या होऊंगा, क्‍या करूंगा। मरने के क्षण में हमारी स्‍थिति सब से भिन्‍न होगी। कोई मुस्कराते हुए भी मर सकता है।

ओशो (ज्योतिष और अध्यात्म)

जुलाई 27, 2011

ओशो, महावीर, ज्योतिष, आत्मघाती और जीने की इच्छा

ओशो ने ज्योतिष जैसे विवादित विषय का भी विश्लेषण अपनी अदभुत दृष्टि से किया है। ज्योतिष को अद्वैत का विज्ञान बताते हुये वे इस विषय की अनूठी व्याख्या करते हैं। उन्होने प्राचीनतम उपलब्ध ज्ञान और उदाहरणों से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक समझ वाले उदाहरणों को एक सूत्र में पिरोकर बेहद रोचक व्याखान प्रस्तुत किये हैं जो इस विषय के सम्बंध में एक बिल्कुल स्पष्ट छवि लेकर आते हैं। ज्योतिष और जीवन को वे तीन भागों में जोड़ते हैं।

बहुत बार सत्य खोज लिए जाते हैं, खो जाते हैं। बहुत बार हमें सत्य पकड़ में आ जाता है, फिर खो जाता है। ज्योतिष उन बड़े से बड़े सत्यों में से एक है जो पूरा का पूरा खयाल में आ चुका और खो गया। उसे फिर से खयाल में लाने के लिए बड़ी कठिनाई है। इसलिए मैं बहुत सी दिशाओं से आपसे बात कर रहा हूं। क्योंकि ज्योतिष पर सीधी बात करने का अर्थ होता है कि वह जो सड़क पर ज्योतिषी बैठा है, शायद मैं उसके संबंध में कुछ कह रहा हूं। जिसको आप चार आने देकर और अपना भविष्य-फल निकलवा आते हैं, शायद उसके संबंध में या उसके समर्थन में कुछ कह रहा हूं।
नहीं, ज्योतिष के नाम पर सौ में से निन्यानबे धोखाधड़ी है। और वह जो सौवां आदमी है, निन्यानबे को छोड़ कर उसे समझना बहुत मुश्किल है। क्योंकि वह कभी इतना डागमेटिक नहीं हो सकता कि कह दे कि ऐसा होगा ही। क्योंकि वह जानता है कि ज्योतिष बहुत बड़ी घटना है। इतनी बड़ी घटना है कि आदमी बहुत झिझक कर ही वहां पैर रख सकता है। जब मैं ज्योतिष के संबंध में कुछ कह रहा हूं तो मेरा प्रयोजन है कि मैं उस पूरे-पूरे विज्ञान को आपको बहुत तरफ से उसके दर्शन करा दूं उस महल के। तो फिर आप भीतर बहुत आश्वस्त होकर प्रवेश कर सकें। और मैं जब ज्योतिष की बात कर रहा हूं तो ज्योतिषी की बात नहीं कर रहा हूं। उतनी छोटी बात नहीं है। पर आदमी की उत्सुकता उसी में है कि उसे पता चल जाए कि उसकी लड़की की शादी इस साल होगी कि नहीं होगी।
इस संबंध में यह भी आपको कह दूं कि ज्योतिष के तीन हिस्से हैं।

एक–जिसे हम कहें अनिवार्य, एसेंशियल, जिसमें रत्ती भर फर्क नहीं होता। वही सर्वाधिक कठिन है उसे जानना।

फिर उसके बाहर की परिधि है–नॉन-एसेंशियल, जिसमें सब परिवर्तन हो सकते हैं। मगर हम उसी को जानने को उत्सुक होते हैं।

और उन दोनों के बीच में एक परिधि है–सेमी- एसेंशियल, अर्द्ध-अनिवार्य, जिसमें जानने से परिवर्तन हो सकते हैं, न जानने से कभी परिवर्तन नहीं होंगे। तीन हिस्से कर लें।

एसेंशियल–जो बिलकुल गहरा है, अनिवार्य, जिसमें कोई अंतर नहीं हो सकता। उसे जानने के बाद उसके साथ सहयोग करने के सिवाय कोई उपाय नहीं है। धर्मों ने इस अनिवार्य तथ्य की खोज के लिए ही ज्योतिष की ईजाद की, उस तरफ गए।

उसके बाद दूसरा हिस्सा है–सेमी एसेंशियल, अर्द्ध अनिवार्य। अगर जान लेंगे तो बदल सकते हैं, अगर नहीं जानेंगे तो नहीं बदल पाएंगे। अज्ञान रहेगा, तो जो होना है वही होगा। ज्ञान होगा, तो आल्टरनेटिव्स हैं, विकल्प हैं, बदलाहट हो सकती है।

और तीसरा सबसे ऊपर का सरफेस, वह है…नॉन-एसेंशियल। उसमें कुछ भी जरूरी नहीं है। सब सांयोगिक है।

लेकिन हम जिस ज्योतिषी की बात समझते हैं, वह नॉन-एसेंशियल का ही मामला है। एक आदमी कहता है, मेरी नौकरी लग जाएगी या नहीं लग जाएगी? चांद तारों के प्रभाव से आपकी नौकरी के लगने, न लगने का कोई भी गहरा संबंध नहीं है। एक आदमी पूछता है, मेरी शादी हो जाएगी या नहीं हो जाएगी? शादी के बिना भी समाज हो सकता है। एक आदमी पूछता है कि मैं गरीब रहूंगा कि अमीर रहूंगा? एक समाज कम्युनिस्ट हो सकता है, कोई गरीब और अमीर नहीं होगा। ये नॉन-एसेंशियल हिस्से हैं जो हम पूछते हैं। एक आदमी पूछता है कि अस्सी साल में मैं सड़क पर से गुजर रहा था और एक संतरे के छिलके पर पैर पड़ कर गिर पड़ा, तो मेरे चांद तारों का इसमें कोई हाथ है या नहीं है? अब कोई चांद तारे से तय नहीं किया जा सकता कि फलां-फलां नाम के संतरे से और फलां-फलां सड़क पर आपका पैर फिसलेगा। यह निपट गंवारी है।
लेकिन हमारी उत्सुकता इसमें है कि आज हम निकलेंगे सड़क पर से तो कोई छिलके पर पैर पड़ कर फिसल तो नहीं जाएगा। यह नॉन एसेंशियल है। यह हजारों कारणों पर निर्भर है, लेकिन इसके होने की कोई अनिवार्यता नहीं है। इसका बीइंग से, आत्मा से कोई संबंध नहीं है। यह घटनाओं की सतह है। ज्योतिष से इसका कोई लेना-देना नहीं है। और चूंकि ज्योतिषी इसी तरह की बात-चीत में लगे रहते हैं इसलिए ज्योतिष का भवन गिर गया। ज्योतिष के भवन के गिर जाने का कारण यह हुआ कि ये बातें बेवकूफी की हैं। कोई भी बुद्धिमान आदमी इस बात को मानने को राजी नहीं हो सकता कि मैं जिस दिन पैदा हुआ उस दिन लिखा था कि मरीन ड्राइव पर फलां-फलां दिन एक छिलके पर मेरा पैर पड़ जाएगा और मैं फिसल जाऊंगा। न तो मेरे फिसलने का चांदत्तारों से कोई प्रयोजन है, न उस छिलके का कोई प्रयोजन है। इन बातों से संबंधित होने के कारण ज्योतिष बदनाम हुआ। और हम सबकी उत्सुकता यही है कि ऐसा पता चल जाए। इससे कोई संबंध नहीं है।
सेमी एसेंशियल… कुछ बातें हैं। जैसे जन्म-मृत्यु सेमी एसेंशियल हैं। अगर आप इसके बाबत पूरा जान लें तो इसमें फर्क हो सकता है; और न जानें तो फर्क नहीं होगा। चिकित्सा की हमारी जानकारी बढ़ जाएगी तो हम आदमी की उम्र को लंबा कर लेंगे–कर रहे हैं। अगर हमारी एटम बम की खोजबीन और बढ़ती चली गई तो हम लाखों लोगों को एक साथ मार डालेंगे–मारा है। यह सेमी एसेंशियल, अर्द्ध अनिवार्य जगत है। जहां कुछ चीजें हो सकती हैं, नहीं भी हो सकती हैं। अगर जान लेंगे तो अच्छा है; क्योंकि विकल्प चुने जा सकते हैं। इसके बाद एसेंशियल का, अनिवार्य का जगत है। वहां कोई बदलाहट नहीं होती। लेकिन हमारी उत्सुकता पहले तो नॉन एसेंशियल में रहती है। कभी शायद किसी की सेमी एसेंशियल तक जाती है। वह जो एसेंशियल है, अनिवार्य है, अपरिहार्य है, जिसमें कोई फर्क होता ही नहीं, उस केंद्र तक हमारी पकड़ नहीं जाती, न हमारी इच्छा जाती है।

ज्योतिष संबंधी अपने व्याखानों में बेहद रोचक कथाओं से अपनी बात स्पष्ट करते हैं। उन्ही कथाओं में से एक उन्होने महावीर स्वामी, कभी उनके शिष्य रहे गोशालक और जीने की इच्छा के बारे में कही है। इस कथा में सुसाइडल इंस्टिक्ट और जीने की प्रबल इच्छा पर बेहद गहरी समझ उन्होने दुनिया को देकर उसे समृद्ध बनाया है।

प्रस्तुत है वही अनूठी कथा।

महावीर एक गांव के पास से गुजर रहे हैं। और महावीर का एक शिष्य गोशालक उनके साथ है, जो बाद में उनका विरोधी हो गया। एक पौधे के पास से दोनों गुजरते हैं।

गोशालक महावीर से कहता है कि सुनिए, यह पौधा लगा हुआ है। क्या सोचते हैं आप, यह फूल तक पहुंचेगा या नहीं पहुंचेगा? इसमें फूल लगेंगे या नहीं लगेंगे? यह पौधा बचेगा या नहीं बचेगा? इसका भविष्य है या नहीं?

महावीर आंख बंद करके उसी पौधे के पास खड़े हो जाते हैं।

गोशालक पूछता है कि कहिए, आंख बंद करने से क्या होगा? टालिए मत।

उसे पता भी नहीं कि महावीर आंख बंद करके क्यों खड़े हो गए हैं। वे एसेंशियल की खोज कर रहे हैं। इस पौधे के बीइंग में उतरना जरूरी है, इस पौधे की आत्मा में उतरना जरूरी है। बिना इसके नहीं कहा जा सकता कि क्या होगा।

आंख खोल कर महावीर कहते हैं कि यह पौधा फूल तक पहुंचेगा।

गोशालक उनके सामने ही पौधे को उखाड़ कर फेंक देता है, और खिलखिला कर हंसता है, क्योंकि इससे ज्यादा और अतर्क्‍य प्रमाण क्या होगा? महावीर के लिए कुछ कहने की अब और जरूरत क्या है? उसने पौधे को उखाड़ कर फेंक दिया, और उसने कहा कि देख लें। वह हंसता है, महावीर मुस्कुराते हैं। और दोनों अपने रास्ते चले आते हैं।

सात दिन बाद वे वापस उसी रास्ते पर लौट रहे हैं। जैसे ही महावीर और वे दोनों अपने आश्रम में पहुंचे जहां उन्हें ठहर जाना है, बड़ी भयंकर वर्षा हुई। सात दिन तक मूसलाधार पानी पड़ता रहा। सात दिन तक निकल नहीं सके। फिर लौट रहे हैं। जब लौटते हैं तो ठीक उस जगह आकर महावीर खड़े हो गए हैं जहां वे सात दिन पहले आंख बंद करके खड़े थे। देखा कि वह पौधा खड़ा है। जोर से वर्षा हुई, उसकी जड़ें वापस गीली जमीन को पकड़ गईं, वह पौधा खड़ा हो गया।
महावीर फिर आंख बंद करके उसके पास खड़े हो गए, गोशालक बहुत परेशान हुआ। उस पौधे को फेंक गए थे। महावीर ने आंख खोली।

गोशालक ने पूछा कि हैरान हूं, आश्चर्य! इस पौधे को हम उखाड़ कर फेंक गए थे, यह तो फिर खड़ा हो गया है!

महावीर ने कहा, यह फूल तक पहुंचेगा। और इसीलिए मैं आंख बंद करके… खड़े होकर इसे देखा! इसकी आंतरिक पोटेंशिएलिटी, इसकी आंतरिक संभावना क्या है? इसकी भीतर की स्थिति क्या है? तुम इसे बाहर से फेंक दोगे उठा कर तो भी यह अपने पैर जमा कर खड़ा हो सकेगा? यह कहीं आत्मघाती तो नहीं है, सुसाइडल इंस्टिंक्ट तो नहीं है इस पौधे में, कहीं यह मरने को उत्सुक तो नहीं है! अन्यथा तुम्हारा सहारा लेकर मर जाएगा। यह जीने को तत्पर है? अगर यह जीने को तत्पर है तो…मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंक दोगे।

गोशालक ने कहा, आप क्या कहते हैं?

महावीर ने कहा कि जब मैं इस पौधे को देख रहा था तब तुम भी पास खड़े थे और तुम भी दिखाई पड़ रहे थे। और मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंकोगे। इसलिए ठीक से जान लेना जरूरी है कि पौधे की खड़े रहने की आंतरिक क्षमता कितनी है? इसके पास आत्म-बल कितना है? यह कहीं मरने को तो उत्सुक नहीं है कि कोई भी बहाना लेकर मर जाए! तो तुम्हारा बहाना लेकर भी मर सकता है। और अन्यथा तुम्हारा उखाड़ कर फेंका गया पौधा पुनः जड़ें पकड़ सकता है।

गोशालक की दुबारा उस पौधे को उखाड़ कर फेंकने की हिम्मत न पड़ी; डरा।

पिछली बार गोशालक हंसता हुआ गया था, इस बार महावीर हंसते हुए आगे बढ़े।

गोशालक रास्ते में पूछने लगा, आप हंसते क्यों हैं?

महावीर ने कहा कि मैं सोचता था कि देखें, तुम्हारी सामर्थ्य कितनी है! अब तुम दुबारा इसे उखाड़ कर फेंकते हो या नहीं?

गोशालक ने पूछा के आपको तो पता चल जाना चाहिए कि मैं उखाड़ कर फेंकूंगा या नहीं।

तब महावीर ने कहा, वह गैर अनिवार्य है। उखाड़ कर फेंक भी सकते हो। अनिवार्य यह था कि पौधा अभी जीना चाहता था। उसके पूरे प्राण जीना चाहते थे, वह अनिवार्य था। वह एसेंशियल था। यह तो गैर अनिवार्य है, तुम फेंक भी सकते हो, नहीं भी फेंक सकते हो। यह तुम पर निर्भर हे। लेकिन तुम पौधे से कमजोर सिद्ध हुए हो—हार गए।

महावीर से गोशालक के नाराज हो जाने के कुछ कारणों में एक कारण यह पौधा भी था।

जिस ज्‍योतिष की मैं बात कर रहा हूं उसका संबंध अनिवार्य से एसेंशियल से फाउण्‍ड़ेशनल से है। आपकी उत्‍सुकता ज्‍यादा से ज्‍यादा सेमी एसेंशियल तक आती है। पता लगाना चाहते हे कि कितने दिन जियूंगा, मर तो नहीं जाऊँगा, जीकर क्‍या करूंगा। जी ही लुंगा तो क्‍या करूंगा, आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती। मरूंगा तो मरने के बाद क्‍या करूंगा। इस तक भी आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती। घटनाओं तक पहुँचती है, आत्‍माओं तक नहीं पहुँचती। जब मैं जी रहा हूं तो यह तो घटना है सिर्फ—जीकर मैं क्‍या हूं। वह मेरी आत्‍मा होगी। हम सब मरेंगे। मरने के मामले में सबकी घटना होगी। लेकिन मरते क्षण में मैं क्‍या होऊंगा, क्‍या करूंगा। मरने के क्षण में हमारी स्‍थिति सब से भिन्‍न होगी। कोई मुस्कराते हुए भी मर सकता है।

साभार : ओशो की पुस्तक – ज्योतिष और अध्यात्म

फ़रवरी 18, 2011

स्वतंत्रता : मोहम्मद का नुस्खा ओशो का शहद

मोहम्मद का एक शिष्य है, अली। और अली मोहम्मद से पूछता है कि बड़ा विवाद है सदा से कि मनुष्य स्वतंत्र है अपने कृत्य में या परतंत्र! बंधा है कि मुक्त! मैं जो करना चाहता हूं वह कर सकता हूं या नहीं कर सकता हूं?

सदा से आदमी ने यह पूछा है। क्योंकि अगर हम कर ही नहीं सकते कुछ, तो फिर किसी आदमी को कहना कि चोरी मत करो, झूठ मत बोलो, ईमानदार बनो, नासमझी है! एक आदमी अगर चोर होने को ही बंधा है, तो यह समझाते फिरना कि चोरी मत करो, नासमझी है! या फिर यह हो सकता है कि एक आदमी के भाग्य में बदा है कि वह यही समझाता रहे कि चोरी न करो–जानते हुए कि चोर चोरी करेगा, बेईमान बेईमानी करेगा, असाधु असाधु होगा, हत्या करने वाला हत्या करेगा, लेकिन अपने भाग्य में यह बदा है कि अपन लोगों को कहते फिरो कि चोरी मत करो! एब्सर्ड है! अगर सब सुनिश्चित है तो समस्त शिक्षाएं बेकार हैं; सब प्रोफेट और सब पैगंबर और सब तीर्थंकर व्यर्थ हैं। महावीर से भी लोग पूछते हैं, बुद्ध से भी लोग पूछते हैं कि अगर होना है, वही होना है, तो आप समझा क्यों रहे हैं? किसलिए समझा रहे हैं?

मोहम्मद से भी अली पूछता है कि आप क्या कहते हैं?

अगर महावीर से पूछा होता अली ने तो महावीर ने जटिल उत्तर दिया होता। अगर बुद्ध से पूछा होता तो बड़ी गहरी बात कही होती। लेकिन मोहम्मद ने वैसा उत्तर दिया जो अली की समझ में आ सकता था। कई बार मोहम्मद के उत्तर बहुत सीधे और साफ हैं। अक्सर ऐसा होता है कि जो लोग कम पढ़े-लिखे हैं, ग्रामीण हैं, उनके उत्तर सीधे और साफ होते हैं। जैसे कबीर के, या नानक के, या मोहम्मद के, या जीसस के। बुद्ध और महावीर के और कृष्ण के उत्तर जटिल हैं। वह संस्कृति का मक्खन है। जीसस की बात ऐसी है जैसे किसी ने लट्ठ सिर पर मार दिया हो।

कबीर तो कहते ही हैं: कबीरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी हाथ

लट्ठ लिए बाजार में खड़े हैं! कोई आए हम उसका सिर खोल दें!

मोहम्मद ने कोई बहुत मेटाफिजिकल बात नहीं कही।

मोहम्मद ने कहा, अली, एक पैर उठा कर खड़ा हो जा!

अली ने कहा कि हम पूछते हैं कि कर्म करने में आदमी स्वतंत्र है कि परतंत्र!

मोहम्मद ने कहा, तू पहले एक पैर उठा!

अली बेचारा एक पैर–बायां पैर–उठा कर खड़ा हो गया।

मोहम्मद ने कहा, अब तू दायां भी उठा ले।

अली ने कहा, आप क्या बातें करते हैं!

तो मोहम्मद ने कहा कि अगर तू चाहता पहले तो दायां भी उठा सकता था। अब नहीं उठा सकता।

तो मोहम्मद ने कहा कि एक पैर उठाने को आदमी सदा स्वतंत्र है। लेकिन एक पैर उठाते ही तत्काल दूसरा पैर बंध जाता है।

वह जो नॉन-एसेंशियल हिस्सा है हमारी जिंदगी का, जो गैर-जरूरी हिस्सा है, उसमें हम पूरी तरह पैर उठाने को स्वतंत्र हैं। लेकिन ध्यान रखना, उसमें उठाए गए पैर भी एसेंशियल हिस्से में बंधन बन जाते हैं। वह जो बहुत जरूरी है वहां भी फंसाव पैदा हो जाता है। गैर-जरूरी बातों में पैर उठाते हैं और जरूरी बातों में फंस जाते हैं।

साभार – (ओशोज्योतिष अद्वैत का विज्ञान)

 

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