Posts tagged ‘Jungle’

मई 17, 2016

प्रकृति एवं जैव-विविधता – महात्मा गाँधी

Gandhiहम प्रकृति के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए पारिस्थितिकी आंदोलन (इकॉलोजी मूवमेंट) तब तक नहीं चला सकते जब तक कि अहिंसा के नियम मानव सभ्यता के केन्द्र बिन्दु नहीं बन जाते|

इंसान के पास जीवन को रचने की शक्ति नहीं है और इसीलिये उसके पास जीवन को नष्ट करने का अधिकार भी नहीं है|

किसी भी समाज को इस कसौटी पर जांचा जा सकता है कि उसका जानवरों के प्रति व्यवहार कैसा है?

यह कहना एक अहंकारजनित अवधारणा है कि मानव के पास बाकी जीव जंतुओं का स्वामितव है और वह उनका भगवान है| इसके उलट, प्रकृति दवारा मानव जीवन को दिए गये वरदानों के कारण, मानव को एक ट्रस्टी के रूप में जीव-जंतुओं की देखभाल की जिम्मेदारी उठानी चाहिए|

वन्य जीवन जंगलों में कम होता जा रहा है लेकिन शहरों में यह बढ़ता ही जाता है|

जीवन में हम अपने आसपास जितनी भी विविधता देखते हैं प्रकृति ने एक मूल एकता के सूत्र से हम सबको आपस में जोड़ रखा है|

मुझे प्रकृति के सिवा कहीं और से प्रेरणा लेने की आवश्यकता नहीं होती| प्रकृति ने कभी मुझे निराश नहीं किया| प्रकृति के रहस्य नित नये रूप में सामने आते हैं,  और वह मुझे हमेशा ही आश्चर्यचकित करती है| प्रकृति ही है जिसने मुझे आनंद की पराकाष्टा का अनुभव अकसर ही कराया है|

 

 

जनवरी 1, 2015

नए साल की शुभकामनाएँ!

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को
नए साल की शुभकामनाएं!

जाँते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएँ!

वीराने जंगल को तारों को रात को
ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को
हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे
नए साल की शुभकामनाएँ!

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

दिसम्बर 18, 2014

जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है

सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !
सुना है शेर का जब पेट भर जाये
तो वो हमला नही करता ,
दरख्तों की घनी छाओँ जा कर लेट जाता है !
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !!
सुना है जब किसी नदी के पानी में
हवा के तेज़ झोंके जब दरख्तों को हिलाते हैं
तो मैना अपने घर को भूल कर
कौवे के अंडो को परों से थाम लेती है |
सुना है घोंसले से कोई बच्चा गिर पड़े तो ,
सारा जंगल जाग जाता है |
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !!
सुना है जब किसी नद्दी के पानी में
बये के घोंसले का गुन्दुमी साया लरज़ता है |
तो नदी की रुपहली मछलियाँ उसको
पडोसी मान लेती हैं |
नदी में बाढ़ आ जाये ,
कोई पुल टूट जाये तो ,
किसी लकड़ी के तख्ते पर
गिलहरी, सांप ,बकरी और चीता
साथ होते हैं |
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !!
ख़ुदा-वंदा , जलील-ओ -मोतबर , दाना-ओ-बीना
मुंसिफ-ओ-अकबर
मेरे इस शहर में
अब जंगलों ही का कोई क़ानून नाफ़िस कर
कोई दस्तूर नाफ़िस कर |
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है !!

(ज़ेहरा निगाह)

जून 4, 2014

अलगाव : सब जान लें इसके बारे में

बजरिये  इश्तेहार womanleavingman-001
ये एलान किया जाता है
अब “हम”,
“मैं” और “वो” हो गए हैं
मेरे और उन के
अलहदा अलहदा
आधे आधे वज़ूद
आवारा फिर रहे हैं
खासो आम को हिदायत है
हमारे बाकी आधे तलाश न करे
जुदाई के तिराहे पे
नये बाज़ार खड़े हो गए हैं
पीछे के रास्ते में बबूल के जंगल उग आये  हैं
Rajnish sign
नवम्बर 15, 2013

एक चाय तो पिलाती जा यार

एक प्रहर बादwomanhill1-001

उठकर चल देती है वह

नीचे जाती पगडंडी पर

उसे जाता देख

मैं सोचता हूँ हैरान

जिंदगी से तंग आए

जीवों की जमात है यह

न है कोई गीत

न है कोई राग

न है कोई बात

पर,

तभी बीवी पलटी है

उसकी आँखों की चमक

जंगल को रौशन कर गई

प्लम वाले ने बस पूछा भर है –

“एक चाय अपने हाथों से पिला जा ना यार!”

Yugalsign1

नवम्बर 8, 2013

तिनकों का समाजवाद और पूंजीवाद

(1)

रोज की तरहstraw-001

कई-कई संकेत कर

आज भी अस्त हुआ

सूर्य!

कई तिनके बीने मैंने

तुमने भी कुछ तिनके उठाये

लोग भी थे

तिनके उठाते |

(2)

धरती बड़ी थी

जमीन उपजाऊ भी

कहीं बंजर भी

यदृच्छया लोग बिखेरे गये थे

बड़ी सी जमीन पर!

मौसम की हवा सर्द भी थी

गर्म भी!

बारिश की फुहारें भी थीं

ओले भी, बाढ़ भी!

सूरज भी पक्षपाती

गरम कहीं, नरम कहीं!

(3)

लोग भी भिन्न थे,

पता नहीं क्यों!

कुछ चपल, कुछ मद्धम

कुछ सुस्त, कुछ रेंगते से

एक ने कहा

तिनके बीनना है, लक्ष्य

यह खोज है,

संकेत है प्रगति का!

सब जुट गये,

‘अ’ ने, ‘ब’ ने, ‘स’ ने, ‘द’ ने

कई कई तिनके बीने

गट्ठर बनाए

(4)

तिनके बीनते बीनते,

एक ने पाया

कि,

इस तरह संतुलन बिगड रहा है

कुछ के पास तिनके ज्यादा हैं,

कुछ के पास कम

धरती भी कहीं तिनकों से पटी,

कहीं तिनका विहीन!

कई वाद चले,

तिनकों की ढेरियाँ बनती रहीं

बिगड़ती रहीं|

(5)

तिनकों का मूल्य क्या था?

तिनके क्या थे?

क्यों बीने गये?

कितने वृक्ष कटे?

कितने जंगल जले,

तिनकों के उत्पादन में?

तिनके तिनके थे,

चुभते भी थे,,

जलते भी थे|

(6)

तिनकों ने अपनी चुभन

अपनी जलन

उधार दी आदमी को

आदमी कभी न उतार सका

यह कर्ज!

ब्याज चक्रवृद्धि था

पुश्त दर पुश्त

बढ़ता गया…

(7)

आज फिर तुमने मुझसे बातें की

“‘युगल’

‘अ’ ने तिनके ज्यादा उठाये|”

मैंने मायूसी में सिर हिलाया

कोसा खुद को

चंद बातें की

मुट्ठी बांधी

कि,

कल हम अधिक तिनके उठाएंगे!

तिनके ही क्यों?

तिनके ही क्यों उठाएंगे

न तुम जानते थे,

न मुझे मालूम था|

Yugalsign1

अगस्त 22, 2011

ख़ाली घोंसला


जब भी मन करता है देर तक पूरा चाँद देखूँ, चांदनी की शीतल चादर से लिपट कर सो जाऊँ या दूज का थोडा चाँद निरखने के बाद आकाश गंगा के धुंधलको में खो जाऊं तो मुझे गावँ का रास्ता पकडना पड़ता है। वहाँ अब भी उगते सूरज की उषा और सूर्यास्त की लाली, काले-सुरमई प्रदुषण से बीमार आकाश के दर्शनों बिना देखी जा सकती है। बरखा की फुहारों में भीग कर माटी की आदिम खुशबु सूँघते हुए इंद्र-धनुष क्षितिज के इस छोर से परले सिरे तक बिना ऊँची बहुमंजिला इमारतों की रुकावट के सराहा जा सकता हैं। वैसे भोले किसानों को विदेशी शराब, गुटखे और लंबी सिगरटों के जाल में फाँस कर भूमि कारोबारियों के दलाल बीघा के हिसाब से उसकी विरासत लूटवाने पर लगे हुए हैं, फिर भी शहरी जीवन की समस्त बुराइयों के वहाँ तक पहुँचने में अभी समय है।

नगरीकरण ने खेतों की हरियाली तो खाई ही है एक कंक्रीट जंगल भी फैला दिया है जिसमें चारों तरफ आदमियों के दड़बे नज़र आते हैं., हर इंसान अपने ही अस्तित्व की कैद में है, सभी अपनत्व और पड़ोसी होने के हकों से कटा हुआ अजीब सा जीवन जी रहा है, जहाँ कोई किसी का नहीं है

हरे पेड़, उन पर चहचहाते पक्षी, शहर के चंद उजड़ते बागों तक सीमित रह गए हैं। कोई समय था, घरेलु चिड़िया हर आँगन का आवशयक हिस्सा हुआ करती थी। बस अब सूखे ठूठों तक सिमित होकर चहचहांती है सुबह-शाम। चौराहों पर आवारा गायें और कबूतर केवल लोगों की धार्मिक प्रवृत्ति के कारण ही तादाद में नज़र आते हैं, गिद्ध विलुप्त हुए अरसा हुआ, कुछ एक चील–कौवे आकाश में ज़रूर दिखाई दे जाते हैं।

खुशनसीबी से मैं जिस स्थान पर रहता हूँ वह एक पुराना उजड़ा हुआ बाग है सो यादगार स्वरूप थोड़ा खुला मैदान और गिनती के चौबीस बड़े व कुछ एक छोटे दरख्त वहाँ अब भी मोंजूद हैं। गए वक्तों के भूले बिसरे खेल, किलोल–आँख मिचौली–गुलाम, लकड़ी आदि के गवाह और बचपन की उन मासूमियत भरी शरारतों के भी, जो बेरहम वक्त के कटाव में या तो माटी में मिल चुकीं या झुर्री भरे बदनों में चूरा हुए दिनों की गर्द बन कर जिंदा हैं।

बात चूँकि छोटे-मोटे जानवरों तथा पक्षियों की चल रही है व बुलबुल के घोंसले और बच्चों पर आकर खत्म होनी है सो बताना ज़रूरी है, बाग में पालतू बकरियों और कुत्तों के सिवा अब कोई चरिन्दा नहीं रहता। कुछ आज़ाद गिलहरियाँ व बिल्लियाँ तो हैं पर उनका क्या जिक्र! परिंदों में घरेलु चिड़िया, कबूतर, तोते, और कबूतर ये आम हैं, कभी नीलकंठ-कोयल-बुलबुल-खातीचिड़ा आदि, और दिन बहुत अच्छा हो तो मोर भी दिखाई दे जाते हैं।

अब असल बुलबुल वाली बात पर आया जाए पर तनिक तो रुकिए। जाने आप बुलबुल को क्या समझते है पर मेरे लिए तो ये दुनिया का एक मात्र वह पक्षी है जिसके काले रंग में जादुई कुरूपता सफ़ेद गुलाबी सुंदरता के साथ मौजूद है। इसकी लयभरी और सुरीली तीखी आवाज़ भोर होने से पूर्व अक्सर मेरे नींद में डूबे बदन को जागती है तो कई बार लोरी बनकर सुला भी देती है। हुआ यूँ था हम दो चार दिन के लिए गावँ गए थे, लौट कर जब घर का ताला खोला और भीतर पहुँच कर आंगन की बत्ती जलाई, फुर्र की आवाज़ के साथ संतरे के बौने पर जवान पेड़ से जैसे चिड़िया के उड़ने की आवाज़ आई।

अरे साब! ये छोटा पेड़ बोनसाई नही है, इसका जन्मदाता छिलकों के साथ गफलत में फेंका गया बीज था, जो गुलाब के गमले में जा ठहरा और ऐसा ठहरा कि गुलाब तो गुल हुआ और जड़ों का झाड़ बन यह बिराजमान है। आज आठ साल के लगभग का है मेरा बौना संतरा और पिछले साल से गिनती के तीन या चार फल भी दे रहा है।

वृतांत के बीच में बहकने से पहले मैं कह रहा था, चिड़िया के फुर्र होने के बाद पिछवाडे में जाकर देखा तो दो टहनियों के बीच बाकायदा करीने से बना घोंसला मौजूद था, जिसमें दो अदद अंडे भी सिमटे से सजे थे। इतने में चिड़िया, जो कि सुखद आश्चर्य के रूप में बुलबुल निकली और सर पर चिल्ला चिल्ला कर मंडराने लगी। तेज सीटीनुमा आवाज़ देकर उसने कही आसपास उपस्थित  चिड़े को भी पुकार लिया। हमने उस समय उन्हें उनके हाल पर छोड़ने में ही भलाई समझी।


सवेरे तक बुलबुल की समझ में आ गया था जैसे हो गुज़र यहाँ ही करनी है, सो वह अपने अंडों पर बैठी रही और थोड़ी दूर बिजली के पोल पर उसका चिड़ा पहरेदारी करता दिखा। कुछ-कुछ अंतराल से शायद जैसे ही कीड़ा-मकोड़ा या भोजन मिलता, ढूंढ कर, पकड़ कर चिड़िया को खिला जाता। कई दिन तक चौबीसो घंटे बुलबुल अंडे सहती रही और चिड़ा उसकी सेवा में लगा रहा।

यहाँ वृतांत के मूल स्वरूप से हटना फिर ज़रूरी हो गया है क्यों कि मन में इस विवरण से बिलकुल अलग हट कर यह विचार आ रहा है कि यूँ ही तो नहीं कहा गया – माँ के पैरों तले जन्नत होती है, सो देखिये ना कोई दस बारह दिन वह चिड़िया अपने अंडों पर से हिली भी नहीं। एक बात हम सभी तथा कथित पत्नी भक्त ‘’आई लव यू, किस उड़ाने वाले और बाय..बाय“ वालों के लिए लिखने को भी जी चाह रहा कि तमाम रोमांटिक कहानियों-टी.वी सीरियलों से ज्ञान लेने के बावजूद विवाह के चार सालों में मोहब्बत का जज्बा ठंडा पड़ने लगता है, फिर पत्नी सेवा अरे! कहाँ की बात कर रहे हो भारी से भारी गर्भवतियों को खाना लगा दूँ  जी की अनुमति के बाद, सरताज की थाली सजानी होती है। मुझे कई बार उस बुलबुल जोड़े से इर्ष्या सी होने लगी थी कि काश मैंने भी इनके सामान प्यार किया होता!


बुलबुल के अंडा सहजने का काल भी आखिर समाप्त हुआ। सवेरे-सवेरे हल्की चूँ…चूँ की आवाज़ से मेरा घर खबरदार हुआ कि चूजे निकल गए हैं। चूजों के निकलने के बाद बारी-बारी से माता-पिता उनके लिए भोजन की जुगाड़ में मशगूल रहते। मैं रोज देख रहा था आश्चर्यजनक रूप से बढ़ते हुये बच्चों के बदन। पर कोई छह दिवस बाद बुलबुल जोड़े को नज़र लग गयी। एक कौवे की निगाह जाने कैसे घोंसले पर पड गयी थी और उस कौवे के हमले का जिस बहादुरी के साथ चावं-चावं कर उन्होंने मुकाबला कर उसको घोंसले से दूर रखा ना भूलने काबिल मंज़र था। मेरा सारा परिवार ज़रा सी परिंदों की ची-चावं सुनता तो बुलबुल को बचाने के लिए दौड़ पड़ता।

बाहरहाल कोई नवें दिन ऐसा हादसा हुआ कि देर तक या कहूँ दिन भर मन टुटा रहा। घटना यह जब घटी, चिड़िया बच्चों के पास थी और चिड़ा सामने दीवार पर बैठा था, अचानक बिल्ली का झपट्टा, हल्की सी, ची.. की पुकार और चिड़े को मुँह में दबा कर वह यमदूत अंतर्ध्यान हो गयी थी।

इस दुर्घटना का चिड़िया के दिल दिमाग और जीवन पर पड़ने वाला असर, काश बाँटा जा सकता। मुझे जीवन की नश्वरता का बहुत गहरा आभास हुआ था उस समय। चिड़िया का दर्द और उसकी भाषा तो मुझे मालूम नहीं पर चूजों के लिए चुग्गा वह अकेली लाती रही। चूजे लगभग किशोर हो चले थे। कोई तेरहवें दिन शिकारी कौवों के जाने के समय पश्चात बुलबुल ने उन्हें आकाश दिखाने का समय चुना।

इस बात पर भी गौर कीजिये कि एक जानवर, जिसे हम अक्ल के दुश्मन मानव बुद्धिहीन कहते है, ने कितनी चतुराई से धुँधलके का वह समय चुना था जिसमें उसके बच्चो को सबसे कम ख़तरा था। उस ढलती शाम के वक्त, अचानक बुलबुल ने किसी गीत के बोल से गाये और फुर्र की आवाज़ के साथ अधिक स्वस्थ बच्चे के साथ उड़ गयी, सामने नीम के दरख्त की और कुछ समय बाद वही तरीका उसने दूसरे बच्चे के साथ अपनाया।

बुलबुल के बच्चों ने शक्तिशाली परों के सहारे नीले-नभ पर उड़ान भरी या किसी शिकारी का ग्रास बने, मालूम नहीं। श्यामल चिड़िया किस झुंड में जा खोई यह भी पता नहीं।

उसके जीवन-सफर का एक पड़ाव, वह खाली घोंसला, मेरे मिनी संतरे के पेड़ में अभी भी झूल रहा है। शायद किसी तेज बरसात या पवन के झोंके के साथ तिनका–तिनका बिखरने के इन्तज़ार में!

(रफत आलम)

जुलाई 13, 2011

दिल की लगी

फ़िक्र बहुत थी हमें दुनिया जहान की
सर पे गिरी छत अपने ही मकान की

दिल से दुआ हो हर एक मेहमान की
अल्लाह इज़्ज़त रखे मेरे मेज़बान की

किसी ने कुत्तों में खोजी वफ़ा की बू
वो समझ गया था फितरत इंसान की

कौन समझा दिल की कतरनों का दर्द
लोग तो कैंचियाँ चला गए ज़बान की

रिश्ते बहुत थे मगर कौन से रिश्ते थे
हमने जिनके वास्ते दुनिया वीरान की

मुस्कानों का बहरूप धरे अपनी काया
असल में बस्ती है जंगल बयाबान की

गुलशन के उजड़ने में किसका है दोष
मौसम का फरेब के भूल बागबान की

दीवाने तो तिरछी चितवन पे मर मिटे
ज़रूरत कहाँ पड़ी प्यारे, तीर-कमान की

सर इबादत से उठे ही कब दीवानों के
सजदों को ज़रूरत कहाँ थी अज़ान की

यूँ तो ज़मीन माटी का गोला है मगर
उठाए फिर रही है बुलंदी आसमान की

हमने कब कहा ये है गज़ल ऐ आलम
है दिल की लगी जो दिल ने बयान की

(रफत आलम)

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