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फ़रवरी 21, 2017

काफ़िर क़ाफ़िर

मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर
फूलों की खुशबू भी काफ़िर
लफ्जों का जादू भी काफ़िर
ये भी काफिर, वो भी काफिर
फ़ैज़ भी और मंटो भी काफ़िर
नूरजहां का गाना काफिर
मैकडोनैल्ड का खाना काफिर
बर्गर काफिर, कोक भी काफ़िर
हंसना, बिद्दत, जोक भी काफ़िर
तबला काफ़िर, ढोल भी काफ़िर
प्यार भरे दो बोल भी काफ़िर

सुर भी काफिर, ताल भी काफ़िर
भांगडा, आतंक, धमाल भी काफ़िर
दादरा, ठुमरी, भैरवी काफ़िर
काफी और खयाल भी काफ़िर
वारिस शाह की हीर भी काफ़िर
चाहत की जंजीर भी काफ़िर
जिंदा-मुर्दा पीर भी काफ़िर
नज़र नियाज़ की खीर भी काफ़िर
बेटे का बस्ता भी काफ़िर
बेटी की गुड़िया भी काफ़िर
हंसना-रोना कुफ़्र का सौदा
गम काफ़िर, खुशियां भी काफ़िर
जींस भी और गिटार भी काफ़िर
टखनों से नीची लटके तो
अपनी ये शलवार भी काफ़िर
कला और कलाकार भी काफ़िर
जो मेरी धमकी न छापे
वो सारे अखबार भी काफ़िर
यूनिवर्सिटी के अंदर काफ़िर
डार्विन भाई का बंदर काफ़िर
फ्रायड पढ़ाने वाले काफ़िर
मार्क्स के सब मतवाले काफ़िर
मेले-ठेले कुफ़्र का धंधा
गाने-बाजे सारे फंदा
और मंदिर में तो बुत होता है
मस्जिद का भी हाल बुरा है
कुछ मस्जिद के बाहर काफ़िर
कुछ मस्जिद के अंदर काफ़िर
मुस्लिम मुल्क में अक्सर काफ़िर
काफ़िर काफ़िर मैं भी काफ़िर
काफ़िर काफ़िर तू भी काफ़िर|

(सलमान हैदर)

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जुलाई 16, 2011

ये कैसा आया जमाना

“जीन्स-कल्चर” की
नवीन जीवनशैली
नकल की है हमने
खुदगर्ज़-ह्रदयहीन पश्चिम से।

“लेपटाप” बन गए हैं
सब सम्बन्ध
घंटों अन्तरंग “चेट”
पल में सब “डीलिट”।

नैतिकता के उसूल
बेलगाम उन्मुक्तता के
विष सागर में डूब कर
‘चिल’ होते दिख रहे हैं।

“स्लीवलैस” “जीरो फ़ीगर” बेटी
तारिका बनने के सपनो में मगन
बेशरमी से “कास्टिंग-काउच” पर
कहीं ‘स्क्रिप्ट” में है गुम
स्क्रीन टेस्ट जो होना है।

“मॉड-जंकी’बेटा
मॉडल बनने की धुन में
लाल–पीली पोशाकें धारे
तमाशा बन कर
‘स्मैक’ में धुंआ हो रहा है।

दो दिवसी शोहरत के पीछे
जवानी मरीचिका हुई जाती है
मूल्यों के इस कत्लेआम में
मीडिया-टीवी के
प्रतिभाखोजी ‘रियलिटी-शो’
भौंडेपन के अखाड़े बने हैं
‘लव मीटरों’ से चैनलों पर
निजी रिश्ते जाँचे जा रहे हैं।

हीर-राँझा का देश
ऐसे संस्कारहीन माहौल में
किया भी क्या जाए
‘मॉम’ बेचारी ‘मम’ है
बेबस है ‘पॉप”
बेचारा ज़िदा ‘डेड’ हो गया है।

(रफत आलम)

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