Posts tagged ‘Jaun Elia’

अगस्त 5, 2011

नरेश कुमार “शाद” : परिचय उस महान शायर से

हर शब्द का अर्थ ज़रूर होता है, फिर शब्द अगर शब्दों के जादूगरों की कलम की पैदाइश हों तो  तो क्या कहिये! यूँ सभी श्रद्धेय हैं पर मुझे आधुनिक युग के ये हजरात – जैसे साहिर साहिब, नूर साहिब, जॉन एलिया साहिब, फैज़ साब और शाद साहिब बहुत भाते हैं। नरेश शाद साहिब पर बहुत कम लिखा गया है सो एक छोटी सी कोशिश पेश है।

उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर नरेश कुमार “शाद” का जन्म वर्ष 1928 में पंजाब राज्य के जिला जालंधर के निकट ग्राम नकोदर में साधारण से परिवार में हुआ था। इनके पिता नोहरा राम की माली हालत बहुत खराब थी, रोज़गार के रूप में वे एक लोकल साप्तहिक में काम करते थे जहां से नाम-मात्र पगार मिलती थी। शाद साब के पिता ‘दर्द’ के उपनाम से शायरी भी करते थे तथा उनके सुरापान करने की आदत के कारण से परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद शोचनीय थी। शाद साब की माँ सीधी-सादी देहाती महिला थी, जो किसी तरह घर चला रही थी। इस तरह शाद के पास शायरी विरासत में आई और दो वक्त रोटी का जुगाड ना होने जेसा माहौल घर में मिला। बाद के जीवन की नाकामियों, विषमताओं और नाउम्मीदी ने उन्हें भी शराबी बना दिया, जो कालान्तर में उनकी जवान उम्र में ही मौत का कारण भी बना। अजीब बात है नरेश केवल नाम के नरेश थे साथ ही शाद (प्रसन्न) उपनाम भी रख लिया था, कौन जाने शाद ने ऐसा गरीबी से उपजी कुंठा और उसका मजाक उड़ाने के लिए किया हो, अन्यथा तो दरिद्रता, नाकामी और उदासी का शाद साब से चोली दामन का साथ रहा। वे अपने परिवेश से इस कद्र तंग आ गये के निकल पड़े घर से एक आवारा सफर पर। पेट की भूख और तबियत की बैचेनी लाहौर, रावलपिंडी, पटियाला, दिल्ली, कानपुर, मुम्बई, और लखनऊ, कहाँ नही ले गयी उन्हें।

ऐसी ही कैफियत में शायद गज़ल के ये शेर निकले है :-

 

हाय! मेरी मासूम उम्मीदें, वाय! मेरे नाकाम इरादे
मरने की तदबीर न सूझी जीने के अंदाज़ न आये
शाद वही आवारा शायर जिसने तुझे प्यार किया था
नगर-नगर में घूम रहा है अरमानों  की लाश उठाये।

 

शाद साब, चाहे शायरी हो कि निजी जीवन में वे जो कुछ भी बने अपने बलबूते और कड़ी मेहनती के के कारण बने थे। अन्यथा तो हाल यह था कि पैसे नहीं होने के कारण उन्हें अपना कलाम तक भी बेचना पडा। एक साहब ने मात्र साठ रूपये में उनकी 60 गज़लों का सौदा अपने नाम से छापने के किया और बेहयाई ये के वे पैसे भी नकद नहीं मिले। ऐसे हालात का दर्द उनके इस कलाम में साफ़ नज़र आरहा है:-

आप गुमनाम आदमी हैं अभी
इस लिए आपका ये मजमूआ
अजसर-ए-नो दुरस्त करवाकर
अपने ही नाम से मैं छापूंगा
रह गया अब मुआवज़े का सवाल
नकद लेना कोई ज़रूर नहीं
शाम के वक्त आप आ जाएँ
मयकदा इस जगह से दूर नहीं

(मजमूआ : कवितासंकलन, अजसर-ए-नो : नए सिरे से, दुरस्त : ठीक)

 

उर्दू के प्रसिद्ध व्यंगकार फिक्र तौस्वी ने शाद साब के उस उलट-पलट जीवन का बेहतरीन खाका खींचा है। उनके शब्दों में…

 

“यह हकीकत है कि शाद ने अपनी मौजूदा जिंदगी की टूटी फूटी इमारत भी सिर्फ अपने ही बलबूते पर खड़ी की है। प्रतिभा की चिंगारी उसके नसीब में थी, उसने उसे बुझने नहीं दिया… उसके इस संघर्ष की कहानी न सिर्फ लंबी है, बल्कि तेज रफ़्तार भी। यूँ लगता है, जैसे उसने पैदल ही 100-100 मील का फासला एक–एक घंटे में तय कर लिया है। इस सफर में यद्यपि उसके चेहरे पर गर्द अट गयी, उसकी हड्डियां चटक गयी… उसके पाँव टूट गए…’’

 

जिंदगी के छोटे आवारा और परेशान सफर में नरेश शाद साब ने उर्दू कविता की तमाम बारीकियां बहुत परिपक्वता व गहराई के साथ अपने कलाम में पेश की हैं। गज़ल, नज़्म, कते और रुबाई सभी बेहतरीन अंदाज़ में पेश की हैं, परन्तु कते और गज़ल से आपको अधिक लगाव था।

शाद साब के कालाम के बारे में समकालीन बड़े शायर जोश मलीहाबादी, जिन्हें क्रान्तिकारी विचारों के कारण शायर-ए-इंकेलाब भी कहा जाता है, ने लिखा है:-

 

‘’नरेश कुमार शाद  आजकल के नौजवान शायरों से एक दम भिन्न हैं, वे दिल के तकाजों से मजबूर होकर शेर लिखते हैं, सोच समझ के शेर कहते हैं… इसी कारण उनके शेरों में प्रभाव और प्रभाव में वह विशेषता होती है जो शब्दों के बंधन में नहीं आ सकती’’।

शाद साब को निर्मोही काल चक्र ने सन 1928 से 1969 अर्थात मात्र 41 बहारों का समय ही दिया और वे बहारें भी काँटों द्वारा अहसास अजमाइश के सिवा कुछ नहीं थ॥ बहुत उदासी, दर्द और शराब के ज़हर में डूब कर इस लोकप्रिय और हर दिल अज़ीज़ शायर ने दुनिया से मुँह मोड़ लिया। पर उनका लेखन कद्रदानों को तो कयामत तक मोहता रहेगा।

प्रस्तुति : रफत आलम

 

…जारी

दिसम्बर 23, 2010

जॉन एलिया : कहते हैं कि उनका था अंदाजे बयां और

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे बयां और

यह शेर कहा तो हजरत ग़ालिब ने खुद के लिये था पर जॉन साब को मंच से शायरी करते देखना और सुनना बखूबी जता देता है कि यह शेर जॉन साब पर भी उतना ही मौजूँ है जितना कि हजरत ग़ालिब के लिये था। जॉन साब द्वारा पिरोये गये अल्फाज़ गहरे मायने बिखेर देते हैं अगर उन्हे खुद जॉन साब की आवाज में ही सुना जाये और अगर उन्हे कलाम कहते देख लिया जाये तो साफ साफ पता चलता है कि वे मंच की दुनिया के बादशाह थे।

कतात

—————

मेरी अक्लो होश की सब हालते
तुमने साँचे में जुनु के ढाल दी

कर लिया था मैंने एहदे तर्के-इश्क
तुमने फिर बाहें गले में ड़ाल दी

—————————–

किसी लिबास की खुशबू जब उड़ के आती है
तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है

तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी खुशबू को
तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है

तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं
मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

————

कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग होंगे जो उसको भाते होंगे

उसकी याद की बादेसबा और तो क्या होता होगा
यूँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे

यारो कुछ तो जिक्र करो तुम उसकी क़यामत बाहों का
वो जो सिमटते होंगे उनमे वो तो मर जाते होंगे

————————–

गज़ल
………….

हालतेहाल के सबब हालतेहाल ही गयी
शोक में कुछ नहीं गया शोक की जिंदगी गयी

एक ही हादसा तो है और वो यह की आज तक
बात नहीं कही गयी बात नहीं सुनी गयी

बाद भी तेरे जानेजा दिल में रहा जब समां
याद रही तेरी यहाँ फिर तेरी याद भी गयी

उसकी उम्मिदेनाज़ का हमसे यह मान था के आप
उम्र गुजार दीजिए उम्र गुजार दी गयी

उसके विसाल के लिए अपने कमाल के लिए
हालतेदिल थी खराब और खराब की गयी

तेरा फिराक जानेजा ऐश था क्या मेरे लिए
तेरे फ़िराक में खूब शराब पी गयी

उसकी गली से उठ के में आन पड़ा था अपने घर
एक गली की बात थी और गली गली गयी

…………………………………………………………

नज्म

………….

मुझ से पहले के दिन
अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हे

ख्वाब ओ ताबीर के गुमशुदा सिलसिले
बारह अब सताने लगे हैं तुम्हे

दुःख जो पुहंचे थे तुमसे किसी को कभी
देर तक अब जगाने लगे हैं तुम्हे

अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हे
अपने वो अहद ओ पेमा मुझे से जो न थे

क्या तुम्हे मुझसे कुछ भी कहना नहीं

 

प्रस्तुती – (रफत आलम)

टैग: , ,
दिसम्बर 21, 2010

जॉन एलिया : तन्हा शायर, बेशकीमती अश’आर

सालहा साल और एक लम्हा
कोई भी तो ना इनमे बल आया

खुद ही एक दर पर मैंने दस्तक दी
खुद ही लड़का सा मैं निकल आया

उर्दू शायरी के गुलशन में हज़ारों फूलों ने अहसास की अमिट खुशबू बिखेरी है जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के दिलोदिमाग को आल्हादित करती रही है। वर्तमान लबो-लहजे में अशआर की यह खु्शबु इस कदर समायी हुई है कि शायद ही कोई दिन जाता हो जब हम बोलचाल में कोई न कोई उर्दू शेर का सहारा, अपनी बात को पुख्ता करने में नहीं लेते हों।

इसी गुलशन के एक महकते फूल का नाम जॉन एलिया है। वर्तमान दोर के इस मकबूल शायर का जन्म 14 दिसम्बर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में रहने वाले एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ था। जॉन साब के पिता का नाम अल्लामा शफीक हसन एलिया था, जो जाने माने विद्वान, शायर और भविष्यद्रष्टा थे। अल्लामा की सबसे छोटी औलाद जॉन एलिया साब के अतिरिक्त इनके बड़े भाई रईस अमरोही जाने माने शायर, पत्रकार और डॉक्टर थे तथा मानव मूल्यों के बड़े हिमायती थे। बाद में रईस साब की पाकिस्तान में किसी सरफिरे धार्मिक कट्टरपंथी द्वारा हत्या कर दी गयी। जॉन साब के दूसरे भाई सय्यद मोहम्मद तकी विश्व प्रसिद्ध अहमदिया चिन्तक रहे हैं। जॉन एलिया साब की पूर्व पत्नी जाहिदा हिना इंडो- पाक की सुप्रसिद्ध पत्रकार हैं तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामायिक एवं सामाजिक घटनाओं पर आज भी सक्रीय लेखन कर रही हैं। इनके लेख, विशेष रूप से – पाकिस्तान की डायरी, भारत में भी सुधि पाठक चाव से पढते हैं। जॉन एलिया साब की हिना जी से मुलाकात उर्दू साहित्यिक पत्रिका ’इंशा’ निकालने  के दोरान हुई थी, जो बाद में विवाह में तब्दील हो गई। इस विवाह से जॉन साब को दो पुत्रियां और एक पुत्ररत्न प्राप्त हुए, परन्तु बाद में अप्रिय परिस्थतियों के चलते दोनों के बीच 1984 में विवाह विच्छेदन हो गया। तलाक के बाद तबियत से ही सारे जहाँ से खफा जॉन एलिया अवसाद में रहने लगे। उर्दू शायरी का यह देवदास अत्याधिक सुरापान करने और खुद को बर्बाद करने के नए-नए बहाने तलाशने लगा।

जॉन साब ने पैदाइशी रूप में संवेदनशील होने के अतिरिक्त, घर में सुसंस्कृत और सभ्य माहोल होने के कारण आठ साल की उम्र में ही पहला शेर कह लिया था। किशोर अवस्था आते आते जैसा कि अक्सर होता बाली उम्र में होता है वे एक ख्याली प्रेमिका सोफिया के सपने देखने लगे और उसी में जीने लगे। इसी दौर में देश के शासक अंग्रेजों से उनकी नफरत भी उभरने लगी और साम्यवादी विचारधारा उन्हें खासी प्रभावित करने लगी थी। उनके नजदीकी रिश्तेदार सईद मुमताज़ के अनुसार जॉन एलिया की भाषाओँ में खासी रूचि थी। बचपन में मदरसे से जहाँ उन्होंने अरबी फारसी का ज्ञान प्राप्त किया, आगे अध्यन के दौरान अंग्रेजी वे धारा प्रवाह बोलने लगे और हिब्रू और संस्कृत भी चलती फिरी सीख ली।

1947 में देश के टुकड़े होने पर जॉन का दिल भी खासा टूटा। वे साम्यवादी विचारधारा के पोषक होने के कारण धर्म के आधार पर बंटवारे के घोर विरोधी थे और हर हाल भारत में ही रहना चाहते थे। अंत में अधिकांश परिवार के पाकिस्तान चले जाने के फलस्वरूप १९५६ में कराची में जाकर बस गए। अपने आखरी समय आने तक वे अपने जन्म के शहर अमरोहा को बहुत प्यार से याद करते रहे। अपनी अर्थपूर्ण शायरी और मुशायरों में दिलफरेब अंदाज़ से प्रस्तुति के कारण जॉन एलिया पाकिस्तान में भी काफी लोकप्रिय और ख्यात नाम हो गए।

विधा के गंभीर जानकारों के अनुसार परम्परागत उर्दू शायरी की ज़मीन पर रहते हुए जॉन एलिया को सदा जीवन में आदर्श की तलाश रहती थी। वास्तविक जीवन में आदर्श कहाँ? लोगों की मक्कारी और बनावट पर उन्हें गुस्सा आता था जिसके चलते उन्होंने अपने ही अंदाज़ से नए मूल्य शायरी में स्थापित किए हैं। उनकी शायरी क्लासिक आशिक-माशूक की शायरी न होकर धरती पर रहते औरत-आदमी के प्रेम/नफरत  की खुरदरी ज़मीन पर लिखी गयी शायरी है। जॉन एलिया का विरह भी आज के आदमी का है जो बादलों को संदेशवाहक बनाने के बदले माशूक से सीधा मुखातिब होता है। उनका कलाम समाज द्वारा स्थापित मूल्यों के विरुद्ध गुस्से और अपनी जिद के आगे न झुकने की शायरी है। अंतत उनकी यही हट्धर्मी उनके टूटने का कारण भी बनी लगती है। तल्ख़ हालात और अपनी तबियत की संवेदना के कारण जॉन एलिया  साब खुले अराजकतावादी – शून्यवादी हो गए थे, जिनकी सदा अपने परिवेश से लड़ाई रहने लगी थी। अपने अच्छे समय में शायरी के अतिरिक्त उनके द्वारा इस्माइलिया सेक्ट पर बहुत शोधपूर्ण कार्य के साथ अन्य साहित्यिक रचनाओं का अनुवाद भी किया गया है।

जॉन एलिया साब खूब लिखते थे पर अपनी फक्कड तबियत, अलमस्तजीवन शैली और हालत से समझौता न करने की आदत के कारण इनकी पहली पुस्तक ’शायद’ मंज़र-ए-आम तक 1991 में ही आ सकी। इसके प्रकाशन में खुद जॉन एलिया साब ने खूब ढ़िलाई की और रचनाओं के चयन में ही दस से अधिक और संकलन की एडिटिंग में ही पांच वर्ष लगा दिए। खुद जॉन एलिया साब का अपने कलाम के बारे में क्या नजरिया था, देखिये -..

अपनी शायरी का जितना मुन्किर मैं हूँ, उतना मुन्किर मेरा कोई बदतरीन दुश्मन भी ना होगा। कभी कभी तो मुझे अपनी शायरी ……. बुरी, बेतुकी …… लगती है… इसलिए अब तक मेरा कोई मज्मूआ शाये नहीं हुआ.. और जब तक खुदा ही शाये नहीं कराएगा उस वक्त तक शाये होगा भी नहीं…।

नजदीकी मित्रों की काफी समझाइश से ही जॉन साब ने पुस्तक का मसौदा फाइनल किया। यह दिलजला शायर तब तक तिल-तिल मरता हुआ ज़िदा लाश बन चुका था। इस अनूठे शायर, विद्वान और मनीषी को तल्ख़ हालत ने पहले ही घायल किया हुआ था उस पर हद दर्जे के  मदिरापान ने कोढ़ पर खाज का काम कर उन्हे अर्धविशिप्त सा बना दिया था। मुशायरों और काव्यगोष्ठियों में जाना लगभग बंद करके यह शायर अपने आप में ही सिमट कर रह गया था। अगर किसी महफ़िल में पहुंचे भी तो नशे में चूर बेहाल खुद ही अपने मेंटल होने का ऐलान करते हुए। उनकी पुस्तक ’शायद’ को लोगों ने हाथों हाथ लिया, पढ़ा और सराहा। किताब के नौ संस्करण जल्द ही निकल गए। इससे जॉन एलिया साब की लोकप्रयता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। पर जॉन एलिया से तो किस्मत नाराज़ सदा से थी, शायद इसी लिए इस मुमताज़ शायर, विद्वान और अत्याधिक संवेदनशील इंसान ने 8 नवम्बर 2002 को अपने सभी प्यारों से दूर एक दोस्त के घर लंबी बीमारी के बाद, इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह दिया।

जॉन साब की कविताओं का अगला संकलन ’यानि’ उनके मरणोपरांत सन 2003 में प्रकाशित हुआ। तदुपरांत उनके नजदीकी मित्र खालिद अंसारी द्वारा उनकी कविताएँ गुमान (2004), लेकिन (2006) और गोया (2008) नाम से पुस्तकों के रूप प्रकाशित की गईं और इन किताबों ने साहित्यिक हलकों में खासी लोकप्रिय पायी। जॉन एलिया साब ने शायरी विधा के लगभग सभी घटक ग़ज़ल, नज़्म, और कते आदि बहुत खूब लिखे हैं। जॉन एलिया  जीवन की बिसात पर तो नाकामयाब इंसान थे ही साहित्यिक दुनिया में भी गुटबंदी और अलमस्त तबियत के चलते उन्हें वो मुकाम हासिल नहीं जिसके वे हकदार थे। जॉन साब के विशाल खजाने से कुछ रचनायें सुधि पाठकों के समक्ष पेश करने की एक अदना सी कोशिश की जा रही है।

गज़ल
………….

गाहे गाहे बस अब यही हो क्या
तुमसे मिल कर बहुत खुशी हो क्या

मिल रही हो बड़े तपाक के साथ
मुझको यक्सर भुला चुकी हो क्या

याद हैं अब भी अपने ख्वाब तुम्हे
मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या

बस मुझे यूँही एक ख्याल आया
सोचती हो तो सोचती हो क्या

अब मेरी कोई जिंदगी ही नहीं
अब भी तुम मेरी जिंदगी हो क्या

क्या कहा इश्क जाविदानी है
आखरी बार मिल रही हो क्या

हाँ फज़ा यहां की सोई सोई सी है
तो  बहुत तेज रौशनी हो क्या

मेरे सब तंज बेअसर ही रहे
तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या

दिल में अब सोजे इंतज़ार नहीं
शमे उम्मीद बुझ गयी हो क्या

…………………………………………………………………………………..

नज्म
……………….

तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तनहाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं

मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं

इन किताबों ने बडा ज़ुल्म किया है मुझ पर
इन-में एक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़हन

मुज़दा-ए-इशरत अंजाम नहीं पा सकता
ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

[ रम्ज़=जादू ,रहस्य ,मुज़्दा =अच्छी खबर ,इशरत= खुश जिंदगी ]

…………………………………………………………………………………………………..

कता
……….

शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी
नाज़ से काम क्यों नहीं लेती

आप, वो, जी, मगर यह सब क्या है
तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेती

………………………………………………………………………

 

जॉन एलिया साब के बारे में और पढ़ने के लिये उनके ऊपर बने विकीपीडिया पेज पर दिये लिंक्स सहायक होंगे।

प्रस्तुती – (रफत आलम)

%d bloggers like this: