Posts tagged ‘Jal’

मार्च 6, 2015

लीक पर वे चलें जिनके…

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं

शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
हिलती क्षितिज की झालरें
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

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जून 3, 2014

मृग मरीचिका

मृग मरीचिका…dreamwo-001

बस नज़र की हद के आगे ही…

बस यहीं मिलेगा जीवन

लेकिन…

प्यासे को मरना…

जल बिन…

जल के प्यासे को…

प्रेम बिन…

प्रेम पिपासु को…

Rajnish sign

जनवरी 1, 2014

सावित्री मंदिर … पुष्कर

सावित्री मंदिर की सीढ़ियों पर savitri-001

अस्ताचल को जाता सूर्य

खूब सिंदूरी हो,

सतरंगी बादलों को

नारंगी कर गया है!

घाटी की हरियाली,

पहाड़ के दोनों छोर पकड़ कर

सांवली सी हो,

मटियाली धरती को

समेट सी गई है!

मंद समीर,

हिचकोले खा- सम और विषम पर

ताल सा देता,

तीखी सी पहाड़ी को

तरंगित कर गया है!

दूर पुष्कर का नीला जल,

नारंगी, हरे और सफ़ेद रंगों के बीच

शांत सागर सा,

मेरे मन को

विश्रांत कर गया है!

रिधिम – रिधिम,

मंद – मंद थाप

पवन की, गगन की, मन की

पड़ती है इस हरी-भरी काया पर

और मेरा तन- शून्य हो गया है !

और मन –

वो उड़ा, वो उड़ा

जैसे में खुद रुई का फाहा

मंद समीर के झकोरे में

तिरता चला जाता हूँ!

परत-दर-परत

मन में शान्ति

तन में विश्रान्ति

देवताओं के द्वार के पास

शायद यही निर्वाण है कि

मैं- खो बैठा – सुध-बुध

तन की, मन की !

और,

पुष्कर के नील जल पर

सावित्री मंदिर से मैंने कहा –

– तीर्थ

दिव्य!

Yugalsign1

मई 27, 2010

कौन तो लिखता है, कौन तो रचता है

प्रतीत तो ऐसा ही होता है
कि यह लिखा मेरे द्वारा ही जा रहा है
पर क्या लिखने वाला वास्तव में “मैं” ही हूँ ?
मेरे देखे मेरे समझे तो,
कभी एक तीन से तेरह साल का बाल मन,
कभी चौदह से उन्नीस साल का किशोर मन,
कभी बीस से पचास साल का युवा मन,
कभी पचास से साठ साल का प्रौढ़ मन,
और कभी साठ से सौ साल का वृद्ध मन
यह सब लिखता है।
क्या यह वही “मैं” हूँ जो कि “मैं” वास्तव में हूँ?

आयु की बात को छोड़ भी दें तो
क्या यह जो मन जिसके द्वारा सब कुछ लिखा जा रहा है,
वह स्त्री है या पुरुष?
या कि वह निरपेक्ष है
इन दोनों ही जैविक अंतरों से,
इन दोनों ही भावों से,
या कि वह ऊपर उठ चुका है ऐसे किसी भी अंतर से?

यदि सब कुछ “मैं” के द्वारा ही लिखा जाता है
तो क्यों श्रद्धा भाव उमड़ता है प्रकृति के प्रति,
इस पूरी सृष्टि के प्रति
तब तब
जब जब कुछ भी बहुत अच्छा लिखा जा सकना संभव हो जाता है
और ऐसा लगता है कि मेरा तो
सारा अस्तित्व ही एक खोखली बासुंरी समान हो गया है
जिसमें कोई और ही फूँक भर कर
सुरीली तान छेड़ रहा है।

यदि सब “मैं” का भाव ही रचता है तो क्यों
एक अदभुत कृति की रचना के समय
शिल्प और शिल्पकार के बीच स्थित
द्वैत खो जाता है
और रह जाता है केवल
“एक” का भाव।
इस अद्वैत के भाव को या तो “मैं” कह लो या
“वह” कह लो
पर इस “मैं” में “वह” भी है
बल्कि “वह” ही महत्वपूर्ण है
और उस “वह” में “मैं” का भी समावेश है

पर एक बात विनीत भाव से सामने आती है
यह “मैं” वही नहीं है
जो कि यह बताता चलता है
कि अरे सब तुमने ही तो किया है।

बहुत कुछ ऐसा रचा जाता है
जो जन्म तो लेता है
पर उसे जन्माया नहीं जाता
उसे जन्माया नहीं जा सकता
वह तो बस ऐसे ही उतरता है
मानस की शुद्धतम अवस्था में
जैसे कि बाकी सब रचनायें उतर रही हैं
प्रकृति में
प्रकृति के द्वारा ही
यहाँ वहाँ
जल में, थल में, नभ में,
धूप में छाया में।

…[राकेश]

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