Posts tagged ‘Ishwar’

फ़रवरी 10, 2017

शून्य और अशून्य … कुँवर नारायण

संबंध में शून्यता को प्रेम भर देता है, संसार से कर्म संबंध जोड़ देता है, अथाह अकेलेपन में आस्था ईश्वर रूपी बंधन से जोड़कर भराव कर देती है पर आतंरिक शून्यता का क्या किया जाए? वह तो रहती ही है, पर उसका भी एक परम उपयोग है जो कुँवर नारायण अपनी इस छोटी लेकिन अनूठी कविता में सुझाते हैं|

एक शून्य है

मेरे और तुम्हारे बीच

जो प्रेम से भर जाता है|

एक शून्य है

मेरे और संसार के बीच

जो कर्म से भर जाता है|

एक शून्य है

मेरे और अज्ञात के बीच

जो ईश्वर से भर जाता है|

 

एक शून्य है

मेरे ह्रदय के बीच

जो मुझे मुझ तक पहुँचाता है|

(कुँवर नारायण)

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फ़रवरी 21, 2015

भूखा आदमी और ईश्वर

भूखे नेbhookh
ईश्वर से रोटी मांगी
ईश्वर ने कहा
पहले स्तुति गाओ
भूखे ने
गायी
ध्यान भूख में रहा
ईश्वर ने कहा
पापी हो तुम
भूखे ने सुना ईश्वर का कटाक्ष


ईश्वर ने फिर कहा
यही है तुम्हारे दुखो का कारण
इसीलिए भूख तुम्हारी नियति है


भूखे ने कहा
हमारा संयम हमारी भूख का कारण है ईश्वर
ईश्वर ने आँखे तरेरी
बोले अदब से बात करो
भूखे की इतनी हिम्मत!


भूखे ने डाल दिया ईश्वर की गर्दन पर हाथ
बोला
भूखा हिम्मत ही करता
तो ना तुम ईश्वर होते
ना मैं भूखा

(संकलन साभार – Arvind Thalor)

जनवरी 17, 2014

आंसू…

बहुत बड़ी सी भीड़ थी

दोनों पार्श्व में

मंत्रोच्चार करती, जय-जयकार करती!

कान्हा के सामने बैठे थे,

हम तीन

माँ, पिताजी और मैं|

आह्लाद नहीं था

कि कहीं हो रहा था

ईश्वर से मेरा संयोग

वरन,

मैं जार-जार रोया था

सिर्फ इस खुशी को जीकर

कि, आज इस क्षण में

मैं शांत होकर

बैठ सका हूँ

इन् दोनों के साथ

और कि,

कहीं तो ईश्वर मुझ पर मुस्कराया है|

Yugalsign1

दिसम्बर 24, 2013

अंत भी हो प्रकाशमान…

manbird-001उठकर

छू ले गगन

विहग के ले कर पर

भर ऊंची उड़ान

हो जा मगन!

विधाता का अंश है यात्रा

यात्रा का चरम उड़ान

मन खोजता रहेगा

गति से और गतिमान!

प्रहार कर

मन पर, तन पर

संवेगों और प्रतिक्रियाओं का पा बल

कूद पड़ समर-तम पर!

छांह की खोज

ईश्वर के उलट है

यदि है प्रकाश ही रचियता

तो अंत भी हो प्रकाशमान !

Yugalsign1

जून 6, 2013

ओशो : राहुल सांकृत्यायन (बौद्ध भिक्षु और वामपंथी लेखक)

Osho rahulमेरे एक मित्र, संस्कृत, पाली और प्राकृत के विद्वान, बौद्ध भिक्षु थे| लेकिन वे कम्यूनिज्म की ओर भी आकर्षित हो गये, और इसका कारण साधारण सी समानता थी, कि बुद्ध के यहाँ भी ईश्वर की परिकल्पना नहीं  है और मार्क्स के यहाँ भी नहीं है| सो वे मार्क्सिज्म की ओर आकर्षित हो गये और अंततः कम्यूनिस्ट बन गये| और सोवियत यूनिवर्सिटी ने उन्हें कहा कि वे वहाँ जाकर  संस्कृत पढाएं और वे मॉस्को चले गये|

भारत से बाहर, मॉस्को में हर चीज अलग थी| यहाँ उनके लिए असंभव था कि बौद्ध भिक्षु भी बने रहते और किसी स्त्री से प्रेम भी कर लेते| सोवियत यूनियन  में ऐसी कोई परेशानी नहीं थी| वे वहाँ एक स्त्री के प्रेम में पड़ गये| लोला– उसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थी और उसके दो बच्चे भी थे|

सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी कि वे लोला और उसके बच्चों को सोवियत संघ के बाहर ले जाएँ, अलबत्ता वहाँ वे उनके साथ रह सकते थे| पर राहुल भारत वापिस आना चाहते थे|  और वे घबराये हुए भी थे| एक तरह से सोवियत सरकार उनकी अंदुरनी इच्छा ही पूरी कर रही थी – कैसे वे पत्नी और दो बच्चों के साथ भारत जा सकते थे? सबने उनकी निंदा की होती, खासकर बौद्धों ने,”तुम एक भिक्षु हो|” सो एक तरह से वे खुश भी थे कि सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी सो अब वह प्रश्न ही खड़ा नहीं हुआ|

वे वापिस आ गये| उन्होंने मुझे बताया,” जब मैं पहले पहले सोवियत संघ पहुंचा मैंने एक छोटे लड़के से पूछा,” क्या तुम ईश्वर में विश्वास रखते हो|” उसने कहा,”ईश्वर! लोग अंधे युगों में उसमें विश्वास किया करते थे| अगर आपको ईश्वर की मूर्ति देखनी हो तो आप म्यूजियम में जा देख सकते हैं|” ”

लेकिन ये सब भी प्रोग्रामिंग है| ऐसा नहीं है कि ऐसे छोटे लड़के जानते हैं कि ईश्वर नहीं है या कि कार्ल  मार्क्स ही जनता था कि ईश्वर नहीं है| केवल ध्यान में गहरे उतरने वाला व्यक्ति ही जां सकता है कि ईश्वर है या नहीं|

आप सब लोग किसी न किसी सांचे में ढाले गये लोग हो| आपकी प्रोग्रामिंग की गई है| और तुम्हारे साथ यह इतने गहरे में किया गया है कि तुम समझने लगे हो कि यह तुम्हारा स्वभाव है| तुम्हारी कल्पनाएं, तुम्हारी आशा, तुम्हारा भविष्य …कुछ भी प्राकृतिक नहीं है|

प्रकृति इस क्षण के सिवाय कुछ नहीं जानती| प्रकृति कुछ नहीं जानती, आशा, इच्छाएं , लालसा| प्रकृति तो आनंद उठाती है उसका जो इस क्षण, अभी और यहीं, उपलब्ध है|

राहुल ने मुझे बताया,” रशियन लोगों के लिए सबसे बड़ी अचरज की बात थी मेरे हाथ|”

मैंने कहा,” आपके हाथ!”

उन्होंने कहा,” हाँ मेरे हाथ! जब भी मैं उनसे हाथ मिलाता, वे तुरंत अपने हाथ खींच लेते और कहते,”तुम जरुर बुजुर्वा हो, तुम्हारे हाथ बताते हैं कि तुमने कभी काम नहीं किया|””

मैंने बौद्ध भिक्षु से कहा,”आप मेरे हाथ का स्पर्श करो| तब आपको पता लगेगा कि आप श्रमजीवी हो और मैं बुजुर्वा| यह आपको बहुत बड़ा दिलासा देगा|”

मार्च 4, 2011

दोमुँहे…

मैं चूमता हूँ हवाएं
देखता हूँ सितारे
पूजता हूँ सागर
सहेजता हूँ नदियां
सहलाता हूँ लहरें
छूता हूँ मिट्टी
बनाता हूँ सोना
मुझे कोई कुछ नहीं कहता।

लेकिन-
जब देखता हूँ औरत
लिखता हूँ उसके बारे में
तो लोग भूल जाते हैं
अपनी आँखें
बन जाते हैं जबान
मुझे पोर्नोग्राफर और
मेरी रचनाओं को
कहते हैं अश्लील,
चाहते हैं हो जाऊँ
दोमुँहा उनकी तरह
और बकूँ बकवास।

मैं पूछता हूँ
हुजूर!
आप ईश्वर से क्यों नहीं पूछते
लगाते तोहमत
कि दो एक से इंसानों की तकदीर
उसने क्यों पलट दी है
धरती के एक हिस्से को चमन
तो दूसरे को
बनाया क्यों है रेगिस्तान
कहीं बर्फ की चादर
कहीं पर आग की बारिश
कहीं पर टॉरनेडो।
सुबह और शाम के फासले में
जो बदल देता है दुनिया
उसके खिलवाड़ को आप कहते हैं
करिश्मा।

और-
मैं जो सोचता हूँ
कहता हूँ
लिखता हूँ
उसे ईमानदारी से पढ़ने
या सुनने के बाद
चोरी से कहते हैं आप
बहुत घटिया है तुम्हारी सोच
केवल गलाज़त देखते हो
अपना कचरा दूसरों पर फेंकते हो।

हुजूर!
माफ करें मुझे
मुझमें बहती नहीं है गंगा
छटपटाती है वैतरणी
डूबना चाहेंगे?
तो हकीकत में डूबिये
मगर खुदा की कसम
झूठ मत बोलिये
एक बार तो ईमान से कहें
अपनी संतति के लिये
कि दोमुँहे नहीं हैं आप
शायद, बदल जाये यह दुनिया।

मेरे लिये मुश्किल है
बदलना
मैं कर सकता हूँ कोशिश
चलने की जमाने के साथ
मगर हो नहीं सकता हूबहू उस जैसा।

हाँ, उसे लिख सकता हूँ
ईमानदारी के साथ
आप जैसों के लिये
जो गालियाँ बकें मुझे
ताज़िंदगी ऊपर से
और मुझें पढ़ें भीतर से।

{कृष्ण बिहारी}

 

[चित्र : राजा रवि वर्मा]

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