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जून 7, 2013

कार्तिक साहनी चले स्टैनफोर्ड : आई.आई.टी संस्थानों की दृष्टिहीनता

डी.पी.एस, आर.के.पुरम स्कूल में 12वीं कक्षा के 18 साल Kartik

के छात्र – कार्तिक साहनी, ने CBSE बोर्ड की 12वीं की

परीक्षा 95.8 % अंकों के साथ उत्तीर्ण की है|

इसमें खास क्या है, बहुत सारे अन्य छात्रों ने

भी इतने या इससे ज्यादा अंक प्राप्त किये होंगे|

खास दो बाते हैं :-

कार्तिक नेत्रहीन हैं और

– उन्होंने इतने अंक विज्ञान विषय लेकर प्राप्त किये हैं|

इतना बड़ा किला फ़तेह करने के बाद कार्तिक अमेरिका जा रहे हैं| क्यों?

उन्हें Stanford University में दाखिला मिल गया है पूरी छात्रवृत्ति के साथ|

यहाँ तक भी ठीक, आखिरकार अमेरिका को लाख कोसने के बाद भी इस बात को झुठलाना आसान कम नहीं कि वहाँ के शिक्षा संस्थानों में गजब की क्षमता, उदारता, मानवता और दूरदृष्टि है दुनिया भर के श्रेष्ठ दिमागों को अपने यहाँ आकर्षित करने की उन्हें अपने यहाँ पढाने की और ये ही वे दिमाग रहे हैं जिन्होने अमेरिका की उन्नति में दशकों से भागीदारी की है|

अब हिन्दुस्तान का हाल देखिये| पहले तो कार्तिक को सी.बी.एस.ई बोर्ड में विज्ञान विषयों में दाखिला लेने के लिए हजार किस्म की समस्याओं का सामना करना पड़ा क्योंकि ने केवल भारतीय बल्कि भारतीय संस्थान  भी लकीर के फ़कीर बन चुके हैं और खुली दृष्टि की संभावना यहाँ लगभग मृतप्रायः है| यहाँ कोई भी कर्मचारी सन 1860 में बने किसी घटिया से क़ानून का पीला जर्द पड़ा कागज़ का टुकड़ा लेकर खड़ा हो जाएगा और उस फटीचर कागज़ के बल पर आवेदनकर्ता को बाहर भगाकर मेज पर पैर रखकर या तो सो जाएगा या अपने जैसे ही किसी मूढ़ मगज साथी के साथ क्रिकेट, शेयर बाजार, या आर्तों के बेचने वाले बाजार आदि की चर्चा में मशगूल हो जाएगा|

12वीं पास करके गणित और विज्ञान के  ज्यादातर छात्रों का सपना होता है आई.आई.टी संस्थानों में  अपने मनपसंद इंजीनियरिंग क्षेत्र में दाखिला लेना| पर महामहिम आई.आई.टी कैसे किसी नेत्रहीन छात्र को अपने यहाँ घुसने दे सकते हैं?

उनकी शान में गुस्ताखी हो जायेगी कि उनके दुनिया भर में प्रसिद्द प्रोफेसर्स के चेहरे उस समय अगर छात्र ने देख पाए जब वे क्लास में पढ़ा रहे होते हैं?

पूरी तरह से सरकारी पैसे पर निर्भर आई.आई. टी संस्थानों के गुरुर पर शोध हो सकते हैं कि इतने हवाई संस्थान इतने घमंड का सहारा लेकर ज़िंदा कैसे हैं| इन्हें चलाने का पैसा आ कहाँ से रहा है| हिन्दुस्तानी टैक्स देने वालों से ही न!

दुनिया के श्रेष्ठ सौ संस्थानों में इनका नाम तक नहीं होता पर इनका व्यवहार ऐसा रहता है जैसे हावर्ड, ऑक्सफोर्ड, स्टैनफोर्ड, और एम्.आई.टी आदि तो इनके सामने दूध पीते बच्चे हैं| हालत यह है कि अगर खोज की जाए कि कब किसी आई.आई.टी ने विज्ञान की प्रतिष्ठित नेचर जर्नल में कोई शोध पत्र छापा था तो इनके निदेशकों और प्रोफेसरों को सर्दी में पसीने छूट जायें|

बहरहाल कार्तिक देश में रहकर आई.आई.टी में पढ़ना चाहते थे पर दृष्टिहीन आई.आई.टी ने अपने दरवाजे खोलना तो दूर उन्हें अंदर आने के लिए आवेदन तक न करने दिया|

यह भी तय है कि आई.आई.टी में पढकर शायद कार्तिक और उनके माता-पिता को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता पर अमेरिका के गैर मुल्क होने और भारत से बहुत दूर होने के बावजूद कार्तिक को तमाम सुविधाएँ मिलेंगी स्टैनफोर्ड में जो उन्हें मिलनी चाहिए|

ताज्जुब तो यह है कि न तो आई.आई.टी, न ही मानव संसाधन मंत्रालय, न ही देश के बुद्धिजीवी वर्ग और उन माफिया किस्म के भारी भरकम व्यक्ति, का जो हिन्दुस्तान में उच्च शिक्षा के क्षेत्र को नियंत्रित करते हैं, एक भी हरकत करते दिखाई देते इस खबर पर| लानत ही भेजी जा सकती है ऐसी जड़ मानसिकता पर|

पूर्व राष्ट्रपति ड़ा अब्दुल कलाम आजाद ने कार्तिक से एकदम सही कहा था,

“What is required is a vision and not vision”.

जब तक चल रहा है दृष्टिहीन आई.आई.टी संस्थानों की स्तुति चलती रहे!

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