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अप्रैल 18, 2014

अरविंद केजरीवाल : कहानी डेंटिस्ट की ज़ुबानी

AKeatingअरविंद से मेरी पहली मुलाक़ात तब हुयी जब वे एक मरीज के तौर पर मेरे पास आए| दांत में दर्द के कारण वे पिछली रात सो नहीं पाए थे| मैंने जांच के बाद उन्हें बताया कि या तो उन्हें रूट-कैनाल करवाना पड़ेगा या फिर दांत निकलवाना पड़ेगा|

अन्य डाक्टरों के मुकाबले मैं काफी सस्ता था पर जब मैंने उन्हें रूट कैनाल करवाने का खर्चा बताया तो उन्होंने कहा कि वे यह खर्च वहन नहीं कर सकते| उन्होंने दांत उखड़वा लिया|

मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक IRS अधिकारी मेरे जैसे सस्ते डेंटिस्ट का इलाज भी वहन नहीं कर सकता|

उसके बाद दीपावली की शाम मैं बाजार से दिए आदि खरीदने घर से बाहर निकला तो देखा कि केजरीवाल दंपत्ति अपनी इमारत के बाहर एक मेज के पीछे खड़े थे और मेज पर तोहफे रखे हुए थे|

यह सब क्या है? मैंने पूछा!

अरविंद बोले,”दीवाली से पहले ही घर के दरवाजे के बाहर मैंने नोटिस लगा दिया था”नो गिफ्ट्स”, पर तब भी लोग तोहफे दे गये| यह भी दीवाली की आड़ में जबर्दस्ती घूस देने वाली बात है- जैसे बच्चों के लिए मिठाई”|

उन्होंने बताया कि वे वहाँ तोहफों को बेचने के लिए खड़े हैं और इनसे होने वाली कमाई को एनजीओ को दान कर देंगें|

मेरे लिए एक IRS दंपत्ति का इस तरह सड़क पर खड़े होकर सामान बेचना अकल्पनीय था| मैं स्तब्ध रह गया|

मुझे गुस्सा आता है जब लोग उनके ऊपर स्याही फेंक देते हैं, उन पर शारीरिक हमले कर देते हैं| पर अरविंद इन् सब हमलों से प्रभावित नहीं होते| मैं क्रोघित हो उठता हूँ क्योंकि मेरे लिए अरविंद का दर्जा बहुत ऊपर है| मैं नास्तिक हूँ पर मेरे लिए वह ईश्वर जैसे हैं…

जब उन्होंने राबर्ट वाड्रा के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस की थी और बाद में अन्य शक्तिशाली लोगों के खिलाफ तो मैं बहुत भयभीत हो गया था| पश्चिमी उ.प्र में कानून व्यवस्था का क्या हाल है इससे सभी परिचित हैं| इंसानी जान की कीमत वहाँ कुछ भी नहीं है|

तब हमने सोचा कि उनसे बात की जाए कि अगर वे सरकार से सुरक्षा नहीं लेना चाहते तो उन्हें कम से “आप” के स्वयंसेवकों को चौबीस घंटों साथ रखना चाहिए| पर वे तैयार नहीं हुए| तब हमने फेसबुक पर एक पेज बनाया – आप एक राष्ट्रीय संपत्ति हैं, और आप पर हमारा अधिकार है| थोड़ी ही देर में दस हजार लोगों ने इस पर अपने हस्ताक्षर किये| पर अरविंद नहीं माने|

उनका विश्वास दृढ़ है|

जब हम दिल्ली विधानसभा  के चुनाव में उतरे तो हमने देखा कि “आप” के स्वयंसेवक जबर्दस्त ऊर्जा से लबरेज थे| उनकी मानसिकता अलग है| वे अरविंद के साथ एक लक्ष्य के तहत थे और वह लक्ष्य सबसे बड़ा था उनके दिमाग में|

जब अरविंद विचार कर रहे थे शीला दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ने के बारे में तो मैंने उन्हें चेताया कि यह राजनीतिक आत्महत्या के बराबर होगा| अरविंद की नई दिल्ली से जीत अनोखी थी…

समस्या यह हो गई है कि मीडिया अचानक से इतना महत्वपूर्ण बन गया है देश में कि ज्यादातर तो यह लोगों के विचार बनाने लगता है|

शिक्षित मध्यवर्ग थोड़ा निराश है| पर ये लोग ये नहीं समझते कि जनता की सवारी नहीं की जा सकती| हमारे ज्यादातर मंत्री आम-जन थे| यदि कोई मुझे 50 करोड़ रूपये देता है एक पेपर पर साइन करने के लिए – मैं ईमानदार हूँ जब तक कि मुझे मौक़ा नहीं मिला कमाने का, ऐसा है कि नहीं?

जनलोकपाल के बिना बहुत खतरे थे| जनलोकपाल के साथ बहुत चीजें सुधर सकती थीं| तो आप या तो गिलास को आधा भरा देख सकते हैं या आधा खाली…

बिना शक शिक्षित मध्य वर्ग के समर्थन के बिना दिल्ली में इतनी सीटें नहीं मिलतीं पर अरविंद द्वारा त्यागपत्र दिए जाने पर बहस की जा सकती है|

बहुत से कह रहे हैं कि अरविंद ने जिम्मेदारी छोड़ दी…आप मुझे बताओ अगर किसी एक भी आदमी ने गलती कर दी होती तो सारा आंदोलन नष्ट हो जाता हमेशा के लिए|

सच है कि कुर्सी के अंदर बिच्छू हैं…

एक कठोर कानून जैसे कि जन-लोकपाल की महती आवश्यकता है| अगर अरविंद भी गलती करे तो वे भी उत्तरदायी रहें और पकडे जा सकें|

समस्या यह है कि शिक्षित मध्य वर्ग  चाय-कॉफी पीते हुए इन पर बहस करता रहता है| वे कभी सड़कों पर नहीं आयेंगें पुलिस की लाठियाँ और पानी की बौछार सहने के लिए| उनमें से कितने अपने बच्चों को सीमाओं पर भेजेंगे?

सत्यता यह है कि यह सब जो दिखाया जा रहा है कि मध्य वर्ग का एक तबका अरविंद से निराश है यह कुछ ही समय की बात है| नरेंद्र मोदी का प्रोपेगंडा कम ही समय जी पायेगा|

दूध का दूध और पानी का पानी होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी| मध्य वर्ग का भ्रमित तबका भी जल्द ही इस बात का बोध कर लेगा कि अरविंद सही आदमी हैं|

अरविंद सत्ता के पीछे कभी नहीं रहे| वे केवल 45 साल के हैं और वे कभी भी भौतिकवाद के पीछे नहीं भागे हैं| 

मैं उन्हें 1995 से जानता हूँ पर पहले उनके इतना करीब नहीं था|

उन्होंने गाज़ियाबाद में कौशाम्बी, जहां वे रहते थे, एक पायलेट प्रोजेक्ट चलाने के बारे में सोचा और उसके लिए उन्हें मेरी सहायता की जरुरत थी क्योंकि मैं हमेशा ही एक सामाजिक आदमी रहा हूँ|

अरविंद हमेशा से ही अपने काम के प्रति जूनूनी रहे हैं| जब वे किसी काम को हाथ में लेते हैं तो उसी में रम जाते हैं|

लगभग ढाई साल तक अरविंद और मैं सुबह से शाम साथ साथ उस इलाके में एक-एक घर गये| सीवर नहीं था और हम लोगों को बताते थे कि वे हाउस टैक्स क्यों दे रहे हैं जबकि उसमें सीवरेज का पैसा भी शामिल है जबकि आपको यह सुविधा दी ही नहीं जा रही है|

लोगों ने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं था| और ये सब लोग शिक्षित थे और इसी बात से खुश थे कि उनका घर साफ था और उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि घर से निकला सीवेज कहाँ जा रहा था|

ढाई साल के कठोर परिश्रम के बाद स्थानीय प्रशासन हरकत में आया| मायावती के दाहिने हाथ समझे जाने वाले – विजय शंकर पांडे के छोटे भाई अजय शंकर पांडे जो कि गाजिआबाद नगर निगम में कमिश्नर थे, उन्होंने एक जनसभा में वादा किया कि RWA को रोड पर लाइट्स, पार्क, और अन्य जन सुविधाओं को सँभालने की जिम्मेदारी दी जायेगी|

अरविंद की किताब- स्वराज यही बताती है कि सड़कें, स्ट्रीट-लाईट, पानी, सीवर आदि जन सुविधाओं – की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों के पास होनी चाहियें|  जो भी धन राज्य से इस मद में मिलता है वह लोगों की जरुरत और सामहिक सहमति से खर्च किया जाना चाहिए| ठेकेदार को भुगतान तभी हो जब स्थानीय निवासी ढंग से कार्य पूरा होने की रपट दे दें|

अरविंद और मनीष सिसौदिया ने 2001 में परिवर्तन नाम की एनजीओ शुरू की थी| पहले दिन से  मनीष, अरविंद के साथ हैं|

मेरी समझ में लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला समझदारी का नहीं था| शुरू में अरविंद भी इसके पक्ष में नहीं थे|

8 दिसम्बर के बाद बहुत आशामयी माहौल था और मेरे जैसे बहुत से लोगों का मानना रहा है कि इस उर्जावान माहौल को संगठन को मजबूत बनाने में लगाना चाहिए था पर ऊपर बहुत से नेताओं का यह भी मानना था कि पार्टी को राष्ट्रीय चुनाव लड़ना चाहिए ताकि इस ऊर्जा को सही ढंग से इस्तेमाल किया जा सके और राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता मिल सके लेकिन अरविंद और मनीष के दिल्ली सरकार में व्यस्त हो जाने के कारण मुझे यह निर्णय गलत लगता था|

अगर लोकसभा चुनाव में निर्णय अनुकूल नहीं आते तब भी अरविंद जैसे लोग थक-हार कर घर बैठने वाले नहीं हैं|

भारतीयों में जो निराशा घर कर गई है उसे दूर करना जरूरी है| “आम आदमी पार्टी” के उदय के साथ लोगों को पहली बार पता चला कि राजनीति ऐसे भी हो सकती है और यह सफल भी हो सकती है|

अरविंद के प्रति मेरा विश्वास पूर्ण है| अरविंद अपने जीवन को ताक पर लगाकर देश के प्रति अपनी निष्ठा रखते हैं और यह बात लोगों को कुछ समय में ही इसका बोध हो जायेगा|

जब अगस्त 2011 में अन्ना आन्दोलन शुरू हुआ तो हमारे दिमाग में राजनीतिक बात नहीं थी| जब प्रधानमंत्री ने अपने हस्ताक्षर वाला आश्वासन पत्र हमें दिया और संसंद ने उसका अनुमोदन किया किनती बाद में ये सरे सांसद अपनी बात से पलट गये तब पहली बार राजनीतिक परिपाटी में भागीदारी की बात उठने लगी|

मेरे पिता बताते हैं कि उस आंदोलन के कुछ माह बाद वे और अरविंद ऑटो से मेट्रो स्टेशन जा रहे थे और वहाँ पहुंचकर पिताजी ने अरविंद से कहा कि अब राजनीति में उतरने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है तो अरविंद ने तुरंत इस बात का पुरजोर विरोध कर दिया था|

उस समय केवल कुछ लोग ही थे जो यह बात कह रहे थे, संगठन के अंदर से यह आवाज नहीं आ रही थी|

जन लोकपाल ड्राफ्ट का प्रत्येक शब्द अरविंद ने खुद गढा था| जब इस आंदोलन की रूपरेखा बन रही थी, बैनर आदि के बारे में विचार चल रहा था, मैंने अरविंद से कहा कि यह आपके दिमाग की उपज है तो आपका फोटो इस पर होना चाहिए पर अरविंद अलग ही किस्म के इंसान हैं|

उन्होंने केवल अन्ना का फोटो जन-लोकपाल के साथ रखा| यह कोई मामूली त्याग नहीं है| मुझे कोई नहीं दिखाई देता संसार में जो यह काम करता, और तब से जन-लोकपाल आंदोलन अन्ना आंदोलन बन गया|

किसी ने नहीं कहा कि यह अरविंद का आंदोलन था, यह अन्ना का आंदोलन था| बिल का हरेक शब्द अरविंद ने सोचा और लिखा था और कानूनी भाषा के सुधार के लिए प्रशांत भूषण जी, शान्ति भूषण जी और जज राजिंदर सच्चर जी ने इसे बाद में देखा|

अरविंद ने 25 जुलाई से 10 दिनों का अनशन करने की घोषणा की| मैं उनके साथ अकेला डाक्टर था| अनशन के दौरान मेडिकल जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी| मैं उन दस दिनों और बाद के अनशन के पन्द्रह दिनों को कभी नहीं भूल सकता| अरविंद ने वास्तव में मेरी परीक्षा ली|

अरविंद मधुमेह के करीज हैं| और मधुमेह के मरीज को नियमित अंतराल पर कुछ खाना पड़ता है, और समय पर दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं| लेकिन जब से वे जन-जीवन में उतरे हैं तब से खाना और दवाइयों को समय पर लेना लगभग असंभव हो गया है|

मुझे लगा था कि मधुमेह के मरीज के लिए अनशन करना आत्मघाती कदम था| मैंने उनके साथ लड़ाई की पर उन्होंने मेरी एक न सुनी|

एक बार उन्होंने अपना मन बना लिया तो धरती पर कोई भी उन्हें लक्ष्य से हटने के लिए विवश नहीं  कर सकता|

लक्ष्य के प्रति उनका समर्पण, जूनून … आजकल लोग उनका उपहास करते हैं और उनकी गलतियां गिनाते हैं पर इन् लोगों ने उनका त्याग नहीं देखा है|

अगर आप देश के प्रति अरविंद की प्रतिबद्धता को समझेंगे तो आप साहस नहीं जुटा पायेंगे उनके खिलाफ कुछ भी कहने की|

जब वे अनशन कर रहे थे मैंने उन्हें बताया,” आपको क्या लगता है कोई आपके परिवार को सहयोग देगा अगर आपको कुछ हो जाता है तो?”

जब उन्होंने IRS की नौकरी छोड़ी और समाज सेवा में आए तो उनके नाते-रिश्तेदारों ने उन्हें कोसा और याद दिलाया कि उनका एक परिवार भी है|

अनशन के तीसरे दिन राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डाक्टरों ने सलाह दी कि अरविंद को अस्पताल में भर्ती कर देना चाहिए| एक डीजीपी ने हमें फोन किया और इस बाबत चेताया कि अस्पताल में भर्ती मत करना क्योंकि डाक्टर झुक जाते हैं|

मैं कठिन परिस्थिति में फंस चुका था| राम मनोहर लोहिया के वरिष्ठ डाक्टर सलाह दे रहे थे तुरंत अस्पताल में भर्ती करने की और अरविंद कह रहे थे कि वे एकदम ठीक थे|

अन्य स्वयंसेवक डाक्टर भी थे और 450 लोग अनशन कररहे थे, अरविंद, मनीष और गोपाल राय के साथ| डाक्टरों ने कहा कि कीटोन का स्तर 3+ होने के बाद अरविंद की अस्पताल में भर्ती जरूरी है|

मैंने कहा कि वे नहीं चाहते और क्लीनीकली ठीक लग रहे हैं| अरविंद प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद पर ज्यादा निर्भर करते हैं| उन्हें पूरा विश्वास था कि उन्हें कुछ नहीं होगा|

मेरे पास कोई विकल्प नहीं था| हम वहाँ केवल डाक्टर की तरह नहीं थे बल्कि अरविंद के आंदोलन को स्वयंसेवकों की तरह सहयोग देने के लिए भी थे|  एक हफ्ता और गुजरा पर मेरे ऊपर बहुत भारी समय था|

एक पत्रकार, जो आंदोलन को कवर कर रहे थे, ने कहा,” डाक्टर साहब, आप ठीक कर रहे हैं? आपका पूरा व्यावसायिक करियर दांव पर हैं, अगर अरविंद को कुछ हो गया तो आपका लाइसेंस निरस्त हो जायेगा, आपको जेल हो जायेगी क्योंकि सरकारी डाक्टर पहले ही तुरंत अस्पताल में भर्ती की बात कह चुके हैं और आपने सलाह मानी नहीं है”|

लेकिन अरविंद के साथ इतने बरसों काम करने के अनुभव ने सिखा दिया है कि हमेशा किताब में लिखी बात के साथ नहीं चला जा सकता|

शुक्रवार को दोपहर बाद मैंने अरविंद से कहा,” बहुत हो गया| सरकार तो सुन ही नहीं रही है, फिर क्या फायदा?”

अरविंद ने कहा,” कुछ गणमान्य लोगों ने पत्र लिखा है कि अब राजनीतिक विकल्प को अपनाए बिना काम नहेने चलेगा और उस पत्र की घोषणा शाम पांच बजे होगी”|

उन्होंने कहा.” हम यह बात जनता के सामने रखेंगे और लोगों को दो दिनों का समय देंगें सोचने विचारने के लिए| अगर लोग कहते हैं आंदोलन – तो हम इसे जारी रखेंगे चाहे जां चली जाए और अगर लोग कहते हैं राजनीतिक विकल्प चुनो तो हम लोग एक पार्टी बनाने पर विचार करेंगे|”

लेकिन उससे पहले ही हमें पता चला कि अन्ना ने घोषणा कर दी है| अन्ना ने गणमान्य लोगों द्वारा पत्र लिखे जाने की बात पहले ही सबके सामने कह दी|

अरविंद का सोचना अलग था| वे इस पर जनमत संग्रह करवाना चाहते थे| मंच पर बैठे प्रशांत भूषण और संजय सिंह स्तब्ध थे| और अरविंद भी विचलित नज़र आए|

जब अन्ना मंच से उतरे तो अरविंद उनसे बात करने गये| अन्ना ने पूछा,” मैंने कुछ गलत किया?”

मैं विज्ञान का विधार्थी हूँ और मैंने कभी ईश्वर के सामने हाथ नहीं जोड़े| मैं नास्तिक रहा हूँ|

मैं अरविंद के साथ झुग्गियों में भी गया हूँ| मैंने उनके रिश्तेदारों को उन्हें जलील करते देखा है| मैंने उनके जीवन को देखा है और उस समय राजनीति उनके दिमाग में बिल्कुल नहीं थी|

उनके बारे में कुछ बातें समझनी बेहद जरूरी हैं| मैंने अरविंद के  त्याग बहुत करीब से देखे हैं| मुझे पता है वे किसा तरह के विचार रखते हैं और कैसे सोचते हैं| मुझे उन पर पूरा भरोसा है| उन्होंने अपने लिए कभी कोई चीज नहीं चाही|

जो उन्हें नहीं जानते वे कैसे भी विचार उनके बारे में रख सकते हैं|

मैं उनका कटु-आलोचक भी हूँ|

उनका विवाह तब हो गया था जब वे नागपुर में IRS की ट्रेनिंग ले रहे थे| वहीं उनके एक सहयोगी उनकी और भाभी की बातें सुनकर कहते थे कि दोनों एक तरह से सोचते हो|

2011 के अगस्त में आंदोलन के समय भाभी का ट्रांसफर कर दिया गया और जो मकान उन्हें मिला हुआ था वह खाली करना था| मैं अरविंद के माता-पिता के साथ दस दिनों तक कौशाम्बी में भटका पर माहौल को देखकर लोग उन्हें किराए पर घर देने के लिए तैयार नहीं थे|

जब “आप” का गठन हुआ तो कोई भी दफ्तर खोलने के लिए जगह देने के लिए तैयार नहीं था और हमारे पास पैसे भी नहीं थे| मेरे पास एक खाली फ़्लैट था जो मैंने उन्हें दिया|

हम डाक्टरों को लोग हमारे व्यवसाय की वजह से सम्मान देते हैं| हमारे काम को पुण्य का काम कहा जाता है| पर सच यह है कि हम लोग आजीविका कमा रहे हैं| इसके साइड इफेक्ट के रूप में हम अच्छा काम भी कर जाते हैं पर हम यहाँ पुण्य करने नहीं बिल्कुल नहीं आते|

अरविंद की वजह से मैंने वह पाया है जो मैं अपने व्यवसाय से बिल्कुल नहीं पा सकता था| मैंने अन्य डाक्टरों की तरह से व्यवसाय नहीं किया शायद यही वजह होगी कि मैं अरविंद के करीब पहुँच सका|

इस आंदोलन ने मुझे बहुत कुछ दिया है जीवन में|

नोट: मूल अंग्रेजी में रेडिफ़ पर छपा है

Rediff link

अप्रैल 19, 2011

बगुलाभगत आये रे!

वो जो बेचते थे
जहर अब तक,
सुना है
पहने झक सफेद कपड़े
डाले गले में आला
महामारी भगाने की
अपनी क्षमता का
विज्ञापन करते
घूम रहे हैं।

भटका दिये गये थे
बहुरुपिये के स्वर्ण मृग रुपी कौशल से राम
हर ली गयी थी
साधु वेश में आये रावण के छल से सीता
दौ सौ साल लूटा
दास बनाकर भारत को
झुककर व्यापार करने की
इजाज़त लेने आये लूटेरों ने।

विदेशी लूटेरे चले गये
विशालकाय तिजोरियाँ खाली छोड़कर
पर उन पर जल्द कब्जे हो गये
वे फिर से भरी रहने लगीं
देश फिर से लूटा जाने लगा,
लूटा जाता रहा है दशकों से।

डाकुओं के खिलाफ आवाज़ें उठी
तो
छलिये रुप बदल सामने आ गये हैं
जो कहते न थकते थे
“पैसा खुदा तो नहीं
पर खुदा की कसम
खुदा से कम भी नहीं”
वे कस्में खा रहे हैं
रुखी सूखी खायेंगे
पानी पीकर
देश का स्वास्थ्य ठीक करेंगे,
भ्रष्ट हो गया है
यह देश
इसे ठीक करेंगे!

होशियार
सियार हैं ये
शेर की खाल ओढ़े हुये
सामने से नहीं
आदतन फिर से
लोगों की
पीठ में ही खंजर भोकेंगे
लोगों की
मिट्टी की
गुल्लकें
ले भागेंगे
हजारों मील दूर रखी
अपनी तिजोरियाँ भरने के लिये।

जाग जाओ
वरना ये फिर ठगेंगे
इंतजार बेकार है
किसी भगीरथ का
जो लाकर दे पावन गंगा
अब तो हरेक को
अपने ही अंदर एक भगीरथ
जन्माना होगा
जो खुद को भी श्वेत धवल बनाये
और आसपास की गंदगी भी
दूर बहा दे।

पहचान लो इस बात को
डर गये हैं कुटिल भ्रष्टाचारी
धूर्तता दिखा रहे हैं
इनके झांसे में न आ जाना
इनका सिर्फ ऊपरी चोला ही सफेद है
ये हंस नहीं
जो दूध और पानी को अलग कर दें
बल्कि ये तो बगुलेभगत हैं
जो गिद्ध दृष्टि गड़ाये हुये हैं
देश की विरासत पर।

सावधान ये करेंगे
हर संभव प्रयास
जनता को बरगलाने का
ताकि बनी रहे इनकी सत्ता
आने वाले कई दशकों तक
दबा-कुचला रहे
आम आदमी इनकी
जूतियों तले
साँस भी ले
तो इनके रहमोकरम
का शुक्रिया अदा करके।

वक्त्त आ गया है जब
इन्हे जाल में फँसा कर
सीमित करनी होगी इनकी उड़ान
तभी लौट पायेगा
इस देश का आत्म सम्मान
असमंजस की घड़ियाँ गिनने का वक्त चला गया
यह अवसर है
धर्म युद्ध में हिस्सा लेने का
जीत हासिल कर
एक नये युग का सूत्रपात करने का।

…[राकेश]

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