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मार्च 17, 2011

ज़िंदगी फकत एक लहर लम्हों की (रफत आलम)

कौन रोया किसकी आँख पानी हुई
दीवाना मर गया खत्म कहानी हुई

जिंदगी क्या थी वक्त के समंदर में
एक लहर लम्हों की आनी जानी हुई

अपने आप झुकने लगे बाप के कंधे
घर में बिटिया जब कोई सयानी हुई

ईमानदारी का सबक सुन के बाप से
आज के बच्चों को बहुत हैरानी हुई

रसूख का पैमाना है घूस या घोटाला
चोरी हुई साहब ये के हुक्मरानी हुई

बेगुनाह प्यार को बेसबूत जला दिया
झुकने नहीं दी गाँव ने मूँछ तानी हुई

मज़हब कई थे पर मज़हबी कोई नहीं
बंदगी हुई हमसे या जाने शैतानी हुई

अहसास के आंसू हैं ये अर्थहीन शब्द
आलम हमसे कब गज़ल-ख्वानी हुई

(रफत आलम)

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