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नवम्बर 1, 2013

निर्माण कृति का

क्यों निर्माण करना चाहता हूँ

उस कृति का

जो मुस्कुराये खिलखिलाये

प्रकृति के साथ

हर कदम हो पूर्ण यौवन का कदम

चले तो द्वार खुलें प्रगति के

रुकना भी हो एक विशेष

अनुभूति से परिपूर्ण

मैं जानता हूँ

मजबूर कर दिया जाऊँगा

इन्ही कुंठाओं में जीने के लिये

जो मैने खुद बुनी हैं।

ढ़केल दिया जाऊँगा उधर

जहाँ न कृति है

न मुस्कुराना है

न खिलखिलाना है

हूँ तो सिर्फ मैं

और मेरी कुंठा

फिर भी करना चाहता हूँ

निर्माण

उसी कृति का

क्योंकि मैं वह हूँ

जिसे आशा में जीना आता है।

 

( रजनीश )

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अप्रैल 7, 2013

मैं फिर भी उठ खड़ी होऊँगी – MAYA ANGELOU

तुम मुझे पराजित हुआ
साबित कर सकते हो इतिहास के पन्नों में
अपनी कड़वाहट और तोड़े मरोड़े झूठों के जरिये
तुम मुझे धूल -धूसरित कर सकते हो
पर मैं तब भी धूल की तरह ही उठ जाउंगी|

क्या मेरी जीवंतता तुम्हे विचलित करती है?
तुम निराशा के गर्त में क्यों गिरे हुए हो?
क्योंकि मैं ऐसे चलती हूँ
मानों मेरे पास तेल के कुएँ हों,
जो मेरे ड्राइंगरूम में तेल उगलते हैं,
चाँद और सूरज की तरह,
ज्वार की निश्चितता के साथ,
जैसे आशाओं का बसंत खिल आया हो,
मैं फिर भी उठ जाऊँगी|

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे?
झुके हुए सिर और नीची निगाहों के साथ खड़ा हुआ?
कंधे ऐसे गिरे हुए जैसे आंसूं की बूँदें,
ह्रदयविदारक विलाप से कमजोर हुयी?
क्या मेरे गर्वीले दावे तुम्हे अपमानजनक लगते हैं?
क्या तुम्हे घोर परेशानी नहीं होती मेरे वजूद को स्वीकार करने में,
क्योंकि मैं ऐसे हँसती हूँ
मानो मेरे पास सोने की खाने हों,
मेरे घर के पिछवाड़े में|

तुम मुझे अपने शब्दों से मार सकते हो,
तुम मुझे अपनी आँखों से काट सकते हो,
तुम मुझे अपनी घृणा से मार सकते हो,
पर तब भी, हवा की तरह, मैं फिर से उठ जाऊँगी |

क्या मेरा आकर्षक और कामुक व्यक्तित्व तुम्हे
विचलित करता है,
क्या यह एक आश्चर्य के रूप में तुम्हारे सम्मुख आता है
कि मैं ऐसे नृत्य करती हूँ
मानों मेरे पास हीरे हैं,
मेरी जंघाओं के मिलने की जगह पर|

मैं इतिहास की लज्जाजनक झोंपडियों से
उठ जाऊँगी,
मैं दुख से भरे बीते समय से
उठ जाऊँगी,
मैं एक काला महासागर हूँ,
चौड़ा और ऊँची उछाल लगाता हुआ,
ज्वार से उत्पन्न थपेडों को सहन करता हुआ|

मैं आतंक और भय की रातों को पीछे छोड़कर
उठ जाऊँगी
आश्चर्यजनक रूप से चमचमाते दिवस के रूप में
मैं उठ जाउंगी
अपने पूर्वजों द्वारा दिए गये उपहारों को लिए हुए
मैं गुलाम का स्वप्न हूँ,
उसकी आशा हूँ,
मैं उठ जाऊँगी
मैं उठ जाऊँगी
मैं उठ जाऊँगी

[ Still I Rise by Maya Angelou ]

 

अप्रैल 22, 2010

आशा

मैं निराशा को स्वीकार नहीं कर सकता,

चिंता को अंगीकार नहीं कर सकता,

क्योंकि चिंता चिता के समान होती है

और मैं चिंता करके

खुद को पल पल मार नहीं सकता

क्योंकि वह भी आत्महत्या का ही एक रूप है

आत्मा परमात्मा का अंश है अगर,

तो कैसे परमात्मा को कष्ट दूँ?

…[राकेश]

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