Posts tagged ‘Hitler’

नवम्बर 4, 2015

पुस्तकों की होली…ब्रेख्त

brekht

शासन ने जब आदेश दिया कि

हानिकारक ज्ञान की पुस्तकों को

खुलेआम जला दिया जाय

और चारों तरफ होलिकाओं तक

पुस्तकों से लदी गाड़ियां खींचने के लिए

बैलों को विवश किया गया ,

देश से निर्वासित एक लेखक को,

श्रेष्ठतम में जो गिना जाता था,

जलाई गयी पुस्तकों की तालिका की बारीक जांच करने पर धक्का लगा,

क्योंकि उसकी पुस्तकों की उपेक्षा हुई थी.

क्षोभ के पंखों पर उड़ता हुआ वह लेखक अपनी मेज़ के पास पहुंचा

और सत्ताधारियों को एक पत्र लिखा :

‘मुझको जलाओ !

उड़ती हुई कलम से उसने लिखा,

मुझको जलाओ !

क्या मेरी पुस्तकों ने हमेशा सच नहीं कहा है ?

और यहाँ तुम मेरे साथ ऐसा बर्ताव करते हो , जैसे मैं झूठा हूँ!

मैं तुम्हें आदेश देता हूँ:

मुझे जलाओ !!”

बर्तोल्त ब्रेख्त : (1938)

अनुवाद : चन्द्रबली सिंह 

साभार  : जनपक्ष पत्रिका (जनवादी लेखक संघ वाराणसी की प्रस्तुती) एवं लेखक उदय प्रकाश

मई 23, 2014

गांधी Vs हिटलर

 

GandhiVsHitler-001

एक देश की करुणा संचित होती है गांधी में

एक देश का घमंड एकत्रित होता है हिटलर में

एक के उल्लेख के साथ प्रेम का आभास होता है

दूसरे के साथ घृणा की परिकाष्ठा का भय सताता है

एक आशा और प्रकाश का धोतक है

दूसरे की स्मृति अन्धेरा फैलाती है

पहला मानवता को पोषित करता है

दूसरा मानवता का विनाश करता है

पहला सदियों देश की जयजयकार करवाता है

दूसरा सदा देश को गालियाँ दिलवाता है

चुनाव सदा हाथ में है…

…[राकेश]

मई 19, 2011

बच्चा बन सोचूँ तो!

मैं सोचता हूँ कि
स्कूल न होते तो
दुनिया का क्या बिगड़ जाता।

दुनिया तब भी रहती
हम तब भी होते
हवायें तब भी चलतीं
और सूरज तब भी निकलता।

मगर तब ये किच-किच तो न होती
उठो…बस निकल जायेगी…
उठो…जल्दी उठो…
बाथरुम जाओ…
जल्दी करो…।

सुबह किसकी आँख जल्दी खुलना चाहती है?
सुबह-सुबह मुझे ऐसी नींद आती है
जैसी रात भर नहीं आयी होती।

और स्कूल जाना…
और बैग लादना…
और हर दिन न खाये जा सकने वाला टिफिन…
और वॉटर बॉटल…
और होम वर्क के बारे में सोचना…
इन तकलीफों से रोज़ मरता हूँ मैं
मगर यह सब हर दिन होता है मेरे साथ।

क्या कोई ऐसा दिन आयेगा?
कोई देगा मेरा साथ?
जब कोई बच्चों के बचपन के बारे में सोचेगा
और हिटलर की तरह ज़ारी करेगा वो फरमान
जो बच्चों को वाहियात बोझ से बचायेगा
और जब स्कूल जाना
होगा एक उत्सव!

{कृष्ण बिहारी}

Pic Courtesy : eknazar.com

जून 7, 2010

रंगमंच और जीवन

रंगमंच की दुनिया भी कैसी होती है?
वहाँ लोग उसका अभिनय करते हैं
जो वे वास्तविक जीवन में नहीं होते|


उनका अभिनय यह बताता है कि
एक मनुष्य कितने ही रूप धारण कर सकता है
या कि एक मनुष्य में कितनी संभावनाएँ हो सकती हैं|


नाटक एक कला है
जो अन्य कलाओं कि तुलना में
जीवन के ज़्यादा क़रीब है|


नाटक त्रिआयामी है अपने प्रदर्शन में
और बहुआयामी है अपने प्रभाव में|


नाटक सजीव है
और इस विद्या में सबकी भागीदारी हो सकती है|


नाटक सबके लिए है
नाटक एक खेल है
पर फिर भी जीवन से जुड़ा हुआ है
कुछ भी ना हो हमारे पास
न मंच ना परदा न साज़ न सज्जा
पर तब भी नाटक खेला जा सकता है|


नाटक विशुद्ध रचनात्मक प्रक्रिया है
नाटक विचार है
परदे के उठने और गिरने के मध्य
जो मंच पर घटता है
वह झलक दिखाता है कि
जीवन में माया का बहुत बड़ा प्रभाव हो सकता है
क्योंकि नाटक के दौरान
कुछ आभासी पहलू मिलकर
एक वास्तविकता का पुट सामने लाते हैं
नेत्र और कर्ण इंद्रियों के द्वारा सम्मोहित करके
नाटक हमें अपने कथानक के साथ बहा कर
कहीं और ले जाता है|


नाट्यशास्त्र ही बताता है कि
वास्तविक जीवन में जो दूसरों से ज़्यादा शक्ति रखते हैं
दूसरों से ज़्यादा दूर का सोच सकते हैं
वे अपने युग को प्रभावित करते हैं
और सबको अपनी विचारधारा में बहा ले जाते हैं|


यही जीवन में माया के होने का गवाह है
तब लगभग सारे लोग एक बड़े नाटक का हिस्सा बन जाते हैं
और अपना अभिनय शुरू कर देते हैं
अंतर केवल इतना होता है कि
रंगमंच की तरह यहाँ हमें अंत का पहले से पता नहीं होता|


मानव जाति का इतिहास गवाह है कि
समय समय पर ऐसे दिग्दर्शक हुए हैं
जिन्होने अपनी विचारधारा के अनुसार
जीवन के वास्तविक रंगमंच पर
बड़े बड़े नाटक रचे हैं|


हिटलर, मुसॉलिनी और स्टालिन आदि ने
विध्वंसकारी नाटकों की रचनाएँ कीं
और अपने अपने देश के समाज को
अपनी विचारधारा के साथ बहा ले गये|


गाँधी ने भी एक रचनात्मक नाटक की रूपरेखा तैयार की
और मानव जाति के इतिहास को ऊँचाईयाँ प्रदान कीं|


कहीं न कहीं रंगमंच के नाटक
हमें समझ देते हैं कि
जब भी हम वास्तविक जीवन में
किसी विशेष विचारधारा के साथ
बहने लगें तो
देख लें कि किस ओर जा रहे हैं
निर्माण की ओर या विध्वंस की ओर ?

[ राकेश ]

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