Posts tagged ‘Heera’

अक्टूबर 5, 2011

झुकी मूँछ

मुझमें पत्थर पड़े हैं क्या
लोग हीरे के बने हैं क्या

अँधे, बहरे और बस चुप
ये हादसों के बचे हैं क्या

फुटपाथ पर बड़ी है भीड़
कहीं झोपड़े जले हैं क्या

आपको भाती है जिंदगी
हवा महल में बसे हैं क्या

नमक क्यों लाए हो यार
घाव अब भी हरे हैं क्या

जिंदगी-मौत, धुंआ–खुशबु
ये किसी के सगे हैं क्या

माहौल काला सा क्यों है
बस्ती में पेड़ कटे हैं क्या

हाथों के पत्थर किसलिए
शहर में शीशे बचे हैं क्या

भला लगने की बात जुदा
लोग सच में भले हैं क्या

इन्साफ का पता पूछते हैं
आप शहर में नए हैं क्या

मूँछ झुकी कैसे है आलम
बेटी  के बाप बने हैं क्या

(रफत आलम)

Advertisements
अप्रैल 27, 2011

पत्थर नहीं हीरा बन

जिंदगी की ठोकरों से
घबरा कर
पत्थर न बन यार!

तेरे भीतर छिपा है हीरा
तलाश उसे
तराश उसे।

माना बहुत लंबा है
सडक पर लुढ़कते फिरने से
मुकुट की शोभा बनने तक का सफर।

बुद्धि और बदन को कठोर कर
हाथ की लकीरों को रोने वाले
उठा हाथ में
कलम हो के कुदाल
पसीने की नदी में बहकर ही
सफलता के सागर की मिलती है थाह।

याद रखना
बिना तपे
सोना निखरता कब है
भीतरी आग अगर नहीं होती
सूरज रात बना रहता।

कटने-छटने-सँवरने की पीड़ा में ही
छिपा है
पत्थर से हीरा बनने का राज़
जिसकी  कुंजी
तेरी पहुँच से दूर नहीं!

(रफत आलम)

फ़रवरी 11, 2011

साज़ जिंदगी का

 

अंतहीन आसमान
हाथ कब आता है
अंधेरे की कोख से
किन्तु
उजाला उगाता है

बड़ा है समुद्र
बहुत खारा है
तूफ़ान उठता है
किश्तियाँ भी चलाता है

ज़रा सी बूँद है मोती
आंसू का कतरा भी
छोटा सा हीरा कीमती
विषैला भी

छोटे-बड़े का पैमाना
अक्ल का फेर
गलत-सही का ज़िक्र बेमानी
पुण्य क्या पाप क्या
बस फितरत-ए-इंसानी

वक्त एक किस्सा
दुनिया एक कहानी
दिन रात के चक्कर में
जिंदगी है
सांसों की धुन पर बजता
एक अबूझा साज़

(रफत आलम)

%d bloggers like this: