Posts tagged ‘Heart’

अगस्त 12, 2016

दूर मत जाओ, प्रिय! … (पाब्लो नेरुदा)

Pablo Nerudaतुम मुझसे दूर मत जाओ,

एक दिन के लिए भी दूर मत जाओ,

क्योंकि …

क्योंकि…,

मुझे नहीं पता कि इसे कैसे कहना होगा:

एक  दिन की अवधि बहुत लम्बी है मेरे लिए तुम्हारी जुदाई में व्यतीत करने के लिए,

मैं सारा दिन तुम्हारा इंतजार करता रहूंगा,

ऐसे जैसे एक सोता हुआ खाली स्टेशन करता है जब ट्रेनों को कहीं और खड़ा होने के लिए भेज दिया जाता है|

मुझे छोड़ कर मत जाओ,

एक घंटे के लिए भी दूर मत जाओ मुझसे, क्योंकि

तब व्यथा की छोटी-छोटी बूँदें एक साथ बहेंगीं,

धुआँ जो एक घर की तलाश में भटका करता है,

मेरी ओर मुड़ जायेगा

और मेरा टूटा हुआ ह्रदय उसकी जकड में घुट जायेगा|

ओह, काश कि तुम्हारा साया कभी भी समुद्र तट पर खोये नहीं,

काश तुम्हारी पलकें कभी शून्य में स्पंदन न करने पायें,

मुझे एक सेकेण्ड के लिए भी छोड़ कर मत जाना, मेरे प्रियतम!

क्योंकि उस एक क्षण में तुम इतनी दूर जा चुकी होओगी
और भ्रमित मैं, सारी पृथ्वी पर तुम्हे खोजता घूमूंगा,

यह पूछता हुआ,

“क्या तुम वापिस आओगी?”

क्या तुम मुझसे दूर चली जाओगी?

मुझे मरता हुआ छोड़कर!

Don’t Go Far Off (Pablo Neruda)

अनुवाद :-   …[राकेश]

जुलाई 20, 2011

प्रेम और इच्छा

प्रेम और इच्छा
एक ही बात नहीं हैं
वे तो बिल्कुल उल्टे हैं
एक दूसरे के।

प्रेम में इच्छा का कोई स्थान नहीं,
इच्छा लोभ है,
इच्छा लालच है
अभीप्सा है,
इच्छा
खाली ह्रदय का खेल है,
इच्छा अतृप्त ह्रदय की
प्रकृति है,
इच्छा भिक्षा मांगने की
प्रवृत्ति है,
इच्छा
केवल स्वहित देखने का
दृष्टिकोण है,
इच्छा केवल पाने भर की
तुच्छ आदत है,
इच्छा
निम्न श्रेणी का भाव है,
इच्छा करने वाला
अपने चारों ओर काँटे
बिखेरता रहता है।

प्रेम इसके विपरित
उच्चतम शिखर पर
बैठा होता है,
प्रेम की इच्छा नहीं की जाती,
प्रेम करने से नहीं होता,
प्रेम कोई प्रयास करके पाने की वस्तु नहीं है,
प्रेम में होने के लिये
अपने को तैयार किया जाता है,
अपने को शुद्ध किया जाता है,
अनुकूल वातावारण देख ही
प्रेम जीवन में उतरता है,
प्रेम में होने के बाद ही,
प्रेममयी ह्र्दय
लबालब भर जाता है
आनंद और देने का भाव
दोनों अंदर जीवित हो जाते हैं
प्रेम में होने वाला
अपने चारों ओर
फूल खिलाता है
सुगंध बिखेरता है।

इच्छा और प्रेम का क्या मेल?
इच्छा दर्पण पर जमी धूल है
यह वासनामयी है।
इच्छा देती प्रतीत तो होती है
पर यह वास्तव में
मानव जीवन से बहुत कुछ ले लेती है।

प्रेम
स्वच्छतम दर्पण है,
जिस पर धूल नहीं जमा करती,
जिसकी चमक कभी कम नहीं हुआ करती,
देना प्रेम का स्वभाव है।

इच्छा को पीछे छुपा कर
प्रेम के बहाने से इसकी पूर्ति
कभी प्रेम के वास्तविक स्वरुप
तक नहीं ले जा सकती,
ऐसा प्रेम अभिनय है,
नकली है,
ढ़कोसला है,
मानव की इसी कुत्सित लुपाछिपी के कारण
इच्छा का घालमेल प्रेम से कराकर
प्रेम को भ्रमित बना दिया गया है,
इसके नकली स्वरुप को असली मानकर और बनाकर
इसे इसके शिखर से नीचे गिरा दिया गया है।

…[राकेश]

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