Posts tagged ‘Hatheli’

फ़रवरी 21, 2017

अमृता शेरगिल के चित्र को देख कर …

amritashergil1अंधी रात का तुम्हारा तन :

दाहिने हाथ की उठी हथेली ;

नग्न कच्चे कुचों –

कटी के मध्य देश- –

लौह की जाँघों से

आंतरिक अरुणोदय की झलक मारता है

ओ चित्र में अंकित युवती:

तुम सुंदर हो!

मौन खड़ी भी तुम विद्रोही शक्ति हो!

(केदारनाथ अग्रवाल – ०९ अक्टूबर १९६०)

 

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सितम्बर 13, 2013

आओ हम तुम चन्दा देखें

Moon

लहरों के इन हिचकोलों पर

आज नाव में संग बैठकर

साथी हसीं रात में गाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

नर्म हथेली को सहलाएं

भावों में शबनम पिघलाएं

जल में अपने पाँव हिलाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

धडकन जब लहरों पर धडके

अधरों पर बिजली सी तड़के

कोई भारी कसम उठाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

चन्दन के पेड़ों से लिपटकर

खुशबू के घेरे में सिमटकर

करते कभी महकती बातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

देखो रात जा रही है घर से

कोई गज़ल गा रही स्वर से

दामन में ले सुर-सौगातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

{कृष्ण बिहारी}

अप्रैल 30, 2013

प्रेम में आकाश

जब हम नहीं करते थे प्रेम

तब कुछ नहीं था हमारे पास

फटी हथेलियों

और थके पैरों से

हल लगाते थे हम

कोहरे में घाम को देते थे

आवाज

हम देखते थे आकाश

जिसका मतलब

आकाश के सिवाय

कुछ नहीं था हमारे लिए

जब हम प्रेम में गिरे

हम यादों में गिरे

जब यादों में बहे

प्रेम में डूब गये हम

घाटी से चलकर

हमारे घर तक आने वाली

पगडंडी था तब आकाश

हमारे खेतों में

आँख ले रहे होते अंकुर

आकाश में हम सुनते रहते

हवा की गूँज

जो हमारी सांस थी दरअसल

प्रेम में आकाश

आकाश जितना ही दूर था

उसे ज़रा सा उठाकर

हम अपने

मवेशियों को देते थे आवाज

उसकी आँखों में

हम देखते थे अपनी दुनिया

पहाड़ों को काटकर बने घर

जो हमारे थे

हम जो रहते थे एक गाँव में

प्रेम करते हुए|

(हेमंत कुकरेती)

मई 26, 2011

कुचली स्मृतियाँ

मेरे दोस्त कहते हैं –
यह एक कुहासा है
हर ज़िंदगी में आता है
तुम्हे निराश नहीं होना चाहिये
दूसरा बीज बोना चाहिये।

मगर मैं जानता हूँ
कि जो फसल मैंने
तुम्हारी हथेली पर उगायी थी
उसमें अपनी समूची ज़िंदगी लगायी थी
अब मैं अपनी वह ज़िंदगी
कहाँ से लाऊँ,
वैसी ही दूसरी फसल
कैसे उगाऊँ?

और इसका भी क्या भरोसा
कि तुम
उतनी ही उर्वरा होगी।

यदि ऐसा नहीं होता
या सब कुछ पहले जैसा होता
तो फिर मैं एक बार
साधिकार
तुम्हारी नरम हथेलियों को पढ़ता
उनके साथ जीता
मरता।

या फिर
किन्ही दूसरी हथेलियों की ओर बढ़ता
एक नया प्रयोग जरुर करता।

क्योंकि हारना या हार मान लेना
समूची ज़िंदगी गवाँ बैठने से
कुछ ज्यादा ही गवाँ बैठना है।

मेरे इस सवाल का जवाब कि
आदमी के पास आखिर
ज़िंदगी से भी ज्यादा कीमती क्या है?
कि जिसके खो जाने की आशंका मात्र से ही
एक अज्ञान भय भर जाता है
और आदमी जीते जी मर जाता है।

तुम बता नहीं सकते
तुम्हारे भीतर ज़िंदगी ही नहीं
जीते रहने का एहसास भी मर चुका है
तुम्हारी स्मृतियों पर
भारी-भरकम
रोड रोलर गुजर चुका है।

{कृष्ण बिहारी}

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