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फ़रवरी 21, 2016

जाट आरक्षण का कड़वा सच : योगेन्द्र यादव

Yogendra Yadavपिछले दो दिनों से हरियाणा से आ रही ख़बरों से मन बहुत ख़राब है। सरकार अक्षम है, आंदोलनकारी अनुशासनहीन है और विपक्ष गैर-जिम्मेदार है। सब मिलकर सीधा-सादा सच जनता से छुपा रहे हैं। अगर राज्य को अराजकता और हिंसा से बचाना है तो शुरुआत सच बोल कर करनी होगी।

सच ये है कि सभी पार्टियां जाटों को आरक्षण का झूठा वादा करती रही हैं। इस वादे को पूरा करना किसी के बस का नहीं है। सन 2013 में हरियाणा सरकार ने और सन 2014 में केंद्र सरकार ने बिना कायदे के जाटों को आरक्षण दिया था। सबको तभी पता था की ये आदेश कोर्ट में टिकेगा नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र का आदेश रद्द कर दिया, हरियाणा सरकार से आदेश पर हाई कोर्ट ने स्टे दे रखा है। जब तक कोर्ट अपना फैसला नहीं बदलते तब तक सरकार आंदोलनकारियों को कुछ वे वादा करले, उसका कोई महत्व नहीं है। अगर सरकार आंदोलनकारियों को खुश करने के लिए अध्यादेश लाती भी है, तो वो भी कोर्ट में रुक जाएगा।

सच ये है कि मामला सिर्फ एक कोर्ट आर्डर का नहीं है। आज की कानूनी-संवैधानिक व्यवस्था में जाट और पटेल जैसी जातियों को आरक्षण देना संभव नहीं है। किसी भी जाति को ओबीसी में शामिल करने के लिए यह काफी नहीं हैं कि इसके बारे में पहले क्या धारणा थी, या की मंडल कमीशन ने क्या लिखा। अब इसका वैज्ञानिक सर्वे के आधार पर प्रमाण देना पड़ता है कि वह जाति आज शिक्षा और सरकारी नौकरी में सामान्य से बहुत पिछड़ गयी है। राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग ने यह सर्वे करवाया था, उसके मुताबिक जाट समाज की स्थिति उतनी पिछड़ी हुई नहीं है। इस प्रमाण के आधार पर आज के हालात में जाट समुदाय को ओबीसी आरक्षण जैसा कोई लाभ देना संभव नहीं है।

सच ये भी है कि साधारण जाट परिवार की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है और वह आज की व्यवस्था में अन्याय का शिकार है। अधिकांश जाट गाँव में रहते हैं और खेतिहर हैं। खेती अब घाटे का धंधा बन गयी है। खेती की लागत और किसान के खर्चे बढ़ रहे हैं लेकिन फसलों के दाम बढ़ नहीं रहे। ऊपर से मौसम और बाजार की मार। अगर बच्चे को पढ़ा-लिखा दिया तो वो न खेती के लायक बचा न ही नौकरी के काबिल बना। ऊपर से हर नौकरी में सिफारिश और रिश्वत। यानी असली समस्या खेती के संकट और शिक्षित बेरोजगारी की है। इस असली समस्या का समाधान करने को कोई तैयार नहीं है। किसी के पास न तो समझ है, न हिम्मत। आरक्षण इस समस्या का समाधान नहीं है। इससे चंद पढ़े-लिखे और कांटेक्ट वाले परिवारों का भला हो सकता है, लेकिन ज्यादातर जाट परिवारों को इससे कोई फायदा नहीं है। बस इस सवाल पर साधारण लोगों की भावनाएं भड़काना आसान है।

सच ये है की जाट आरक्षण के नाम पर यही खेल हो रहा है। कोई अपनी लीडरी चमका रहा है, कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी हिला रहा है, कोई अपनी पार्टी के वापिस आने का आधार बना रहा है। घबराई हुई सरकार अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मार रही है। सबको पता है की इससे कुछ हासिल नहीं होगा। पांच घरों के चिराग बुझ चुके हैं, और पता नहीं कितनों की बारी है। अब चुप रहने का वक्त नहीं है। कुछ लोगों को तो खुल कर सच बोलना चाहिए ताकि शांति लौट सके, सच्चे सवालों पर ध्यान दिया जा सके।

(योगेन्द्र यादव)

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फ़रवरी 25, 2015

किसान की पगड़ी बचाने का यह आखिरी मौका है…शायद ! (योगेन्द्र यादव)

बहुत दिनों बाद किसान खबरों की सुर्खियों में है. सियासी दांव पेंच, वर्ल्ड कप की हार-जीत और शेयर बाज़ार के उतार-चढ़ाव के मोहपाश में बंधे मीडिया ने मानो एक-दो दिन के लिए किसान दिवस मनाने का फैसला ले लिया है. संसद में गतिरोध,बजट का सन्दर्भ, दिल्ली की हार के बाद मोदी के पैंतरे और फिर अन्ना हजारे. इन तमाम बातों से मीडिया को किसानों का दुःख-दर्द देखने की फुर्सत मिली है.

धीरे-धीरे किसान, खेती और गाँव देश के मानस पटल से ओझल होते जा रहे हैं. देश के कर्णधार, नीतियों के सूत्रधार और बुद्धिजीवी, सब मान चुके हैं कि देश के भविष्य में किसान, खेती और गाँव का कोई भविष्य नहीं है. इसलिए हमारे भविष्य की योजनाओं में ‘स्मार्ट सिटी’ है, सूचना प्रौद्योगिकी है, फैक्ट्रियां और मॉल हैं, लेकिन गाँव-देहात नहीं है. अगर कुछ है तो बस खेती की जमीन जिससे किसान को बेदखल करके यह सब सपने साकार किए जाने हैं. किसान खेती और गाँव के लिए एक अलिखित योजना है इस देश में. गाँव या तो उजड़ेंगे या फिर शहरों के बीच दड़बों में बंद हो जायेंगे. खेती धीरे धीरे काश्तकार के हाथ से निकलकर बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथ जायेगी. किसान शहरों की ओर पलायन करेगा, दिहाड़ी का मजदूर बनेगा. इस अलिखित योजना को हर कोई समझता है, बस मुंह से बोलता नहीं. ऐसे में किसान की व्यथा की खबर बूँद बूँद रिसती रहती है, सुर्ख़ियों में नहीं अखबार के अन्दर के पन्नो में किसी हाशिये पर पडी रहती है.

ऐसी ही एक खबर पिछले हफ्ते छपी. भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि उसके लिए फसलों के दाम को किसान की लागत से ड्योढ़ा करना संभव नहीं है. किसानों की अवस्था पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए दायर एक याचिका पर सरकार ने यह जवाब दिया. सरकार ने कहा कि किसान को लागत पर 50 फ़ीसदी मुनाफा देने से खाद्यान्न बहुत मंहगे हो जायेंगे. इसे सरकार के सामान्य जवाब की तरह देख कर नज़रंदाज़ कर दिया गया. असली बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया. मीडिया ने यह नहीं बताया कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना भारतीय जनता पार्टी का चुनावी वादा था. लोक सभा चुनाव और हरियाणा विधान सभा चुनाव के घोषणापत्र में बीजेपी ने लिखकर वादा किया था कि किसानो के लिए फसल की उनकी लागत के ऊपर 50 फ़ीसदी मुनाफा जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जायेगा. बीजेपी चुनाव जीत गयी, न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा में इस वादे को भुला दिया गया और सरकार की बेशर्मी देखिए कि उसने भविष्य में भी ऐसा कुछ करने से इनकार कर दिया है. मामला किसान का है इसलिए इस इनकार की खबरों में सुर्खियां नहीं बनीं.

उधर हरियाणा सरकार ने भी गुपचुप किसानों को एक बड़ा झटका दिया, लेकिन इसकी कोई चर्चा नहीं हुई. सारे देश में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर बहस हो रही थी. अरुण जेटली कह रहे थे कि अध्यादेश में और कुछ भी बदलाव किया गया हो,कम से कम मुआवजे की रकम घटायी नहीं गयी है. लेकिन हरियाणा की बीजेपी सरकार 4 दिसंबर को अधिग्रहण का मुआवजा आधा कर चुकी थी. सन २०१३ के नए अधिग्रहण कानून में कहा गया था कि मुआवजा तय करते समय जमीन की कीमत पहले की तरह कलेक्टर रेट या पुरानी रजिस्ट्री के आधार पर आंकी जायेगी. ग्रामीण इलाकों में इस कीमत को दो से गुणा किया जा सकेगा. फिर जो राशि बनेगी उसमें उतना ही सोलेशियम जोड़ दिया जायेगा. यानि अगर जमीन का सरकारी दाम 20 लाख रुपये है तो किसान को कुल मिलाकर 80 लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन हरियाणा सरकार ने नए नियम बनाकर दाम को दुगना करने की बजाय य़थावत रखा. यानि हरियाणा में किसान को 80 लाख के बजाय 40 लाख मिलेंगे.

इतना बड़ा फैसला हो गया लेकिन कोई पूरा सच बताने को तैयार नहीं है. हरियाणा के मुख्य- मंत्री का दफ्तर कह रहा है कि यह फैसला औद्योगीकरण के लिए जरूरी था, लेकिन खुद खट्टर जी कह रहे हैं की मुआवजा कम हुआ ही नहीं! हरियाणा से चुने गए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बीरेंद्र सिंह कह रहे हैं कि उनके रहते मुआवज़े को चार गुणा से कम कोई कर ही नहीं सकता! इधर हरियाणा के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार अधिग्रहण के पुराने मामलों में भी 100 फ़ीसदी सोलेशियम देगी. लेकिन ख्ट्टर साहब की सरकार सिरसा में इसी हफ्ते होने वाले अधिग्रहण में सिर्फ 30 फीसद सोलेशियम देने का आदेश जारी कर रही है!

यही किसान-राजनीति की त्रासदी है. किसान की खबर हाशिये पर दबी है, किसान की विचारधारा टुकड़ों में बंटी है, किसान आन्दोलन खंड- खंड में बिखरा हुआ है| इसलिए, किसान की राजनीति ऐसे चौधरियों के कब्जे में है जो उसका वोट डकारकर सत्ता पर काबिज हो जाते हैं लेकिन किसान-हित की जगह बिल्डरों, उद्योग और व्यापारियों के हित में काम करते हैं|

आज देश को एक नई किसान-राजनीति की जरूरत है| आज किसानी घाटे का धंधा बन चुकी है| किसान के पास न तो आमदनी है, न ही अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के साधन| ले दे कर उसके उसके पास तीन ही चीजें बची हैं- पाँव के नीचे जमीं का टुकड़ा, उंगली में वोट देने की ताकत और सर पर बेवजह शान की प्रतीक पगड़ी| अपनी पगड़ी की आन को बनाये रखने के लिए किसान को वोट की ताकत का इस्तेमाल कर अपनी जमीं बचानी होगी| इसलिए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ चल रहा आन्दोलन किसान राजनीति को बदलने का बहुत बड़ा मौका है| यह मौका है किसान आन्दोलन को पुराने चौधरियों की गिरफ्त से बाहर निकाल कर भविष्य के सवालों से जोड़ने का, एक नया नेतृत्व और एक नई दिशा देने का|

हां, शायद यह आखिरी मौका है|

(योगेन्द्र यादव)

साभार : एक्सप्रेस टुडे

फ़रवरी 19, 2015

हरियाणा में भूमि-अधिग्रहण मुआवजे पर “आम आदमी पार्टी” का आंदोलन शुरू

श्री मनोहर लाल खट्टर 19 फरवरी, 2015
मुख्यमंत्री, हरियाणा
चंडीगढ़

विषय: हरियाणा सरकार द्वारा भूमि-अधिग्रहण का मुवावज़ा आधे से कम करने का आदेश.

आदरणीय श्री मनोहर लाल खट्टर जी,

आपके मुख्यमंत्री का पदभार संभालने के बाद पहली बार आपसे संवाद का अवसर मिल रहा है. इसलिए मैं अपने, अपने साथियों और अपने संगठन की ओर से आपको शुभकामनाएं देता हूँ. आशा करता हूँ कि आपके नेतृत्व में हरियाणा सरकार उन उम्मीदों पर खरी उतरेगी जिनके आधार पर हरियाणा की जनता ने आपकी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिया है.

1. मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आपकी सरकार के हाल के निर्णयों और बयानों से उन आशाओं को धक्का लगा है. हरियाणा के किसान और ग्रामवासी आम तौर पर भारतीय जनता पार्टी को शक की निगाह से देखते थे. लेकिन इस बार के विधान-सभा चुनाव में उन्होंने अपने पुराने पूर्वाग्रह छोड़कर खुले दिल से भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया. इस समर्थन के पीछे वे तमाम वादे थे जो आपकी पार्टी ने किसानों से किये थे. आपकी पार्टी के विधान-सभा चुनाव घोषणा-पत्र में आपने “दूसरी हरित-क्रांति” लाने का वादा किया था. आपने किसानों के साथ वादा किया था कि “किसानों के फसलों के दाम लागत-मूल्य पर 50% लाभ निर्धारित करके निर्धारित किये जाने की पद्धति अपनाई जाएगी. समय समय पर बढ़ने वाली महंगाई के अनुरूप किसानों के उत्पाद/फसलों के दाम भी बढ़ाये जायेंगे.” आपने यह वादा भी किया था कि “कृषि भूमि को कॉर्पोरेट घरानों को नहीं बेचा जायेगा और अगर अधिग्रहण किया तो किसान के शेयर का प्रावधान रखा जायेगा.”

2. लेकिन जब से आपकी सरकार आई है तब से किसान अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है. पिछली सरकारों के राज में पनपी किसानों की दुःख-तकलीफ का निवारण करने के बजाय भाजपा की केंद्र और राज्य सरकार ने एक के बाद एक किसानों के साथ धक्का किया है. सरकारी बद-इंतज़ामी के कारण किसान यूरिया खाद के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा है. किसान को वादा हुआ था 24 घंटे की बिजली का लेकिन उसकी बिजली 14 घंटे से घटाकर 11 घंटे कर दी गयी है. लागत से 50% लाभ देना तो दूर, सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को महंगाई दर के हिसाब से भी नहीं बढाया है. फसलों के दाम गिर रहे हैं लेकिन सरकारी मूल्य पर भी खरीद नहीं हो रही है. और ऊपर से भूमि-अधिग्रहण कानून में संशोधन करके किसान की ज़मीन छीनने की तैयारी चल रही है.
3. इस पत्र के माध्यम से मैं आपका ध्यान एक विशेष मुद्दे की ओर खींचना चाहता हूँ. यह मामला पूरी तरह से आपके राज्य सरकार के अधीन है. आपकी सरकार ने किसानों को भूमि-अधिग्रहण पर मिलने वाले मुवावज़े को एक ही झटके में आधे से भी कम कर दिया. मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपकी सरकार किसानों के साथ इतना बड़ा धोखा कैसे कर सकती है.

3.1 जैसा की आपको ज्ञात है संसद द्वारा पारित नए भूमि-अधिग्रहण कानून (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act) 2013 के अनुसार भू-स्वामियों को मुवावज़ा नए तरीके से तय होना है. इस कानून के शेड्यूल 1 के मुताबिक ज़मीन के सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य को किसी गुणांक या फैक्टर से गुणा किया जायेगा. इस गुणन-फल से प्राप्त राशि में उतना ही सोलेशियम जोड़ दिया जायेगा. यह गुणांक कितना होगा इसका फैसला राज्य सरकार को करना होता है. केन्द्रीय कानून के मुताबिक़ यह गुणांक शहरी इलाकों में 1.0 रहेगा लेकिन गाँव में राज्य सरकार 2.0 तक कोई भी गुणांक तय कर सकती है. केन्द्रीय कानून कहता है कि यह फैसला लेते वक़्त शहरी क्षेत्रों से दूरी को ध्यान में रखा जायेगा. अगर राज्य सरकार चाहे तो कलेक्टर रेट से दो गुना तक मुवावजा और उतना ही सोलाशियम यानि कुल मिलकर चार गुना मुआवजा राशि दे सकती है.

3.2 नया कानून बनने के बाद आपकी पूर्ववर्ती सरकार ने मुवावज़ा तय करते वक़्त 2.0 का फैक्टर लगाया था. दिनांक 22 अगस्त 2014 को महेंद्रगढ़ जिले की नारनौल तहसील के शिवनाथपुरा गाँव के भूमि-अधिग्रहण आदेश में सरकार ने कीमत को दुगना करके मुवावज़ा तय किया था.

3.3 लेकिन आपकी सरकार ने केन्द्रीय कानून की भावना, किसानों की आकांक्षा और पिछली सरकार के निर्णय के उलट जाते हुए किसान को कम से कम मुवावज़ा देने की नीति अपनाई है. चार दिसम्बर 2014 को जारी सर्कुलर (संख्या 2331-R-5-2014/16094) के जरिये आपने पूरे ग्रामीण हरियाणा में मुवावज़े के फैक्टर को घटाकर 1.0 कर दिया है. इसका मतलब यह होगा कि भू-स्वामी को मिलने वाला मुवावज़ा आधा हो जायेगा. उदाहरणार्थ अगर कलेक्टर रेट 20 लाख रूपये एकड़ है तो 2.0 फैक्टर के हिसाब से कुल 80 लाख रुपया मुवावज़ा मिलता (20×2.0 = 40 लाख मुवावज़ा + 40 लाख सोलेशियम = 80 लाख) लेकिन इस फैक्टर को 1.0 करने के कारण कुल मुवावज़ा राशि 40 लाख रह जाएगी. ( 20×1.0 = 20 लाख मुवावज़ा + 20 लाख सोलेशियम = 40 लाख) कुल मुवावज़ा राशि आधी कर देने वाला यह नियम अब हरियाणा में हर भूमि-अधिग्रहण पर लागू होगा.

3.4 यही नहीं, आपकी सरकार द्वारा बनाये नए नियमों (दिनांक 28 अक्टूबर 2014) के अनुसार भूमि के मूल्य निर्धारण में भी किसान को भारी घाटा होगा. हरियाणा सरकार की पुरानी अधिग्रहण नीति (9 नवम्बर 2010 को अधिसूचित) के तहत सरकार ने एक न्यूनतम “फ्लोर रेट” तय कर दिया था ताकि जिन इलाकों में ज़मीन के दाम बहुत कम चल रहे हैं वहाँ भी किसान को वाजिब मुवावज़ा मिले. नए नियमों में इस प्रावधान को हटा दिया गया है. पुरानी रजिस्ट्री के हिसाब से मूल्य निर्धारण में भी किसान को कम से कम दाम देने की नीयत झलकती है. पिछले तीन सालों की रजिस्ट्री को देखते वक़्त साल को “कैलेण्डर वर्ष” की तरह परिभाषित किया गया है. इसके चलते वर्तमान वर्ष की नवीनतम रजिस्ट्री का संज्ञान भी नहीं लिया जायेगा. अगर एक एकड़ से कम की कोई रजिस्ट्री हुई है तो उसका भी संज्ञान नहीं लिया जायेगा. यानी कि हर कदम पर सरकार की नीयत यह है कि किसान के मुवावज़े में जितनी कटौती की जा सके उतनी की जाए.
3.5 केन्द्रीय कानून के मुताबिक़ ज़मीन के सरकारी दाम का सरकार द्वरा तय किये फैक्टर से गुना करने पर जो राशि बनती है उसपर सौ फ़ीसदी सोलेशियम देना होगा. लेकिन बावल, जिला रेवाड़ी के 16 गाँव का अधिग्रहण आदेश (संख्या 13/R दिनांक 4 दिसम्बर 2014) जारी करते समय सरकार ने सोलेशियम को घटाकर 30% कर दिया. यह तो बिलकुल ग़ैर-कानूनी है. क्या हरियाणा सरकार भूमि-अधिग्रहण में आगे भी सोलेशियम को 30% की दर से निर्धारित करेगी?

3.6 मुवावज़े की दर को घटाने का यह आदेश जिस जल्दबाजी और गुपचुप तरीके से हुआ वह सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा करता है. नियमों में संशोधन करने का ड्राफ्ट सरकार ने २७ नवम्बर 2014 को अधिसूचित किया (संख्या 2249-R-2014/15792). जनता को इसकी सूचना 29 नवम्बर को मिली और आपात्ति दर्ज़ करने के लिए मात्र 3 दिसंबर तक का समय मिला. फिर भी प्रभावित किसानों ने 1 दिसंबर को विस्तृत आपत्तियां दर्ज करवाई. आपकी सरकार ने इन सब वाजिब आपत्तियों को दरकिनार करते हुए प्रस्तावित ड्राफ्ट को हुबहू 4 दिसंबर को अधिसूचित कर दिया. प्रदेश के किसानों के भविष्य पर इतना दूरगामी असर डालने वाले इस फैसले में इतनी जल्दबाजी क्यूँ की गयी? आपके अफसर कह रहे हैं की यह फैसला किसी कमेटी की सफ़ारिश पर लिया गया. क्या सरकार उस कमेटीकी रिपोर्ट को सार्वजनिक करेगी?

3.7 इन सब तथ्यों का अवलोकन करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि आपकी सरकार किसी भी तरह से किसानों का मुवावज़ा कम से कम करने पर आमादा है. ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी सरकार किसान के हित में नहीं बल्कि उसकी ज़मीन पर नज़र गड़ाये बिल्डरों और उद्योगपतियों के हित में काम कर रही है. इस मुद्दे पर मीडिया से बात करते हुए आपके प्रतीनिधियों ने कहा है कि यदि किसान को ज्यादा मुवावज़ा दे दिया तो इस ज़मीन पर लगने वाले प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाएगी. यह तो कुतर्क है. एक तो किसी भी उद्योग में ज़मीन की लागत उसका एक छोटा हिस्सा होती है. दूसरा, अगर सरकार को इन प्रोजेक्ट्स की लागत कम करनी है तो सरकार अपनी जेब से इन्हें सब्सिडी क्यूँ नहीं दे देती. यह रियायत किसान से छीन कर क्यूँ दी जा रही है. असली सवाल यह है कि आपकी सरकार की पहली चिंता किसान की आजीविका है या कि बिल्डर और उद्योगपतियों का मुनाफा?

4. इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप
(क) नए भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश के अंतर्गत बनाये गए इन नियमों के तहत अधिग्रहण को ततकाल प्रभाव से रोक दें.
(ख) इन नियमों की समीक्षा कर इनमें तमाम किसान-विरोधी प्रावधानों को हटाया जाए.
(ग) मुवावज़े के लिए ग्रामीण क्षेत्रों के गुणन फैक्टर को 1.0 की बजाय 2.0 किया जाय.
(घ) यह स्पष्ट किया जाय कि सरकार 30% की बजाय 100% सोलेशियम देगी.

आम आदमी पार्टी इस मुद्दे और किसानों के साथ हो रहे चौतरफा धक्के के खिलाफ 21 तारीख से प्रदेश भर में जय-किसान अभियान शुरू कर रही है. संविधान की भावना के अनुरूप और लोकतांत्रिक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए आम आदमी पार्टी ऐसे सभी किसान-विरोधी नीतियों और निर्णयों के विरुद्ध संघर्ष करेगी. जब तक इन किसान-विरोधी प्रावधानों को बदला नहीं जाता तब तक आम आदमी पार्टी हरियाणा प्रदेश में कहीं भी भूमि-अधिग्रहण नहीं होने देगी.

आशा है कि प्रदेश के किसानों की हितरक्षा के अपने दायित्व को देखते हुए आप इन मांगो को स्वीकार कर लेंगे और किसानो और सरकार के बीच किसी भी टकराहट की नौबत नहीं आने देंगे.

सादर,
आपका
योगेन्द्र यादव
हरियाणा राज्य प्रभारी और मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता, आम आदमी पार्टी

मई 30, 2014

योगेन्द्र यादव : 21वीं सदी में नहीं चल सकती 20वीं सदी की राजनीति

Yogendra Yadav‘प्रभात खबर’ के रंजन राजन ने राजनीतिक विश्‍लेषक व ‘आप’ नेता योगेंद्र यादव से लंबी बातचीत की|

रंजन – 2014 के जनादेश को आप कैसे देखते हैं? क्या इसे आप ‘मोदी लहर’ का परिणाम मानते हैं?

योगेन्द्र – ‘चुनावी लहर’ का मतलब है चुनाव क्षेत्रों और राज्यों की सीमाओं को लांघ कर देश के बड़े इलाके में एक जैसा रुझान दिखना. नतीजे में जब भी ऐसी स्थिति दिखे, तो उसे हम ‘चुनावी लहर’ का नाम दे सकते हैं. जैसे 1971 में हुआ, 1977 में हुआ, 1984 में हुआ. इस लिहाज से 2014 के जनादेश को ‘चुनावी लहर’ कहना बिल्कुल सही होगा. यह सही है कि इस लहर में नरेंद्र मोदी की भी भूमिका है, लेकिन इसे ‘मोदी लहर’ मान लेना या ‘मोदी लहर’ की संज्ञा देना, इस चुनावी लहर के चरित्र को समझने में चूक होगी|
दरअसल, 2014 की ‘चुनावी लहर’ के तीन प्रमुख कारक हैं. पहला, जो शायद सबसे बड़ा कारक था, यूपीए-2 के राज ने देश में एक तरह का नैतिक और राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया था. इसलिए जनता के मन में असंतोष नहीं, बल्कि गुस्सा घर कर गया था. लोग कह रहे थे कि यूपीए को छोड़ कर जो मर्जी सत्ता में आ जाये. दूसरा, इस गुस्से में लोग एक पुख्ता और जाना-पहचाना विकल्प भी ढूंढ रहे थे. इस लिहाज से भारतीय जनता पार्टी एक जानी-पहचानी पार्टी थी, पायदार दिखाई दे रही थी और लोगों को भरोसा था कि यह पार्टी देशभर में जीत हासिल कर सकती है, 272 के आंकड़े को छू सकती है, केंद्र में सरकार बना सकती है|

नरेंद्र मोदी इस चुनावी लहर के तीसरे कारक थे. उनका योगदान यह था कि उन्हें देश में एक मजबूत नेता के रूप में पेश किया गया. ऐसे में मोदी की छवि ने चुनावी रुझान को एक लहर में तब्दील कर दिया. मोदी की छवि में लोगों को वह शून्य भरने की संभावना दिखाई देने लगी. मनमोहन सिंह के लचर एवं कमजोर व्यक्तित्व के सामने लोग अगर एक मजबूत एवं निर्णायक व्यक्तित्व देखना चाह रहे थे, तो नरेंद्र मोदी की छवि ने उस कमी को पूरा किया. मोदी की छवि में लोगों को भविष्य के लिए आशा दिखाई दी. जिन-जिन बातों को लेकर लोगों के मन में एक कसक थी, वह पूरी होती दिखायी दी. ऐसा अकसर होता है कि इस तरह की किसी छवि में जो कोई व्यक्ति जो कुछ भी ढूंढ़ना चाहता है, ढूंढ़ लेता है|

रंजन – नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जो वादे किये हैं, उसके आधार पर बहुत से लोगों को लग रहा है कि देश में ‘अच्छे दिन’ बस आने ही वाले हैं. आप कितने आशान्वित हैं?

योगेन्द्र – सपने देखना अच्छी बात है. जब कोई समूह या देश सपने देखता है, तो उससे उसका मनोबल बढ़ता है. उसकी ऊर्जा बढ़ती है. उसका मन बड़ा होता है. इसलिए अगर आज देश के एक बड़े वर्ग में आशा है, तो मैं न तो उस आशा से झगड़ना चाहूंगा और न ही उस आशा को पंचर करना चाहूंगा. अगर आज इस देश के लोगों को नरेंद्र मोदी में आस्था है, तो जनता में आस्था रखने के नाते मुङो उन लोगों का सम्मान करना सीखना चाहिए. हालांकि मुङो यह डर भी है कि लोगों की आशाएं कहीं खोखली न साबित हो. मुङो डर है कि कहीं नरेंद्र मोदी के कई दावे महज लफ्फाजी न साबित हों. हालांकि मैं चाहूंगा कि मैं इसमें गलत साबित होऊं|

मैं समझता हूं कि देश में अगर अच्छे दिन आ सकते हैं और हमारी पार्टी उसकी वाहक नहीं बनती है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है. जो भी पार्टी वाहक बने, देश का भला हो यह बड़ी बात है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी एवं अप्रत्याशित पराजय के प्रमुख कारक क्या-क्या रहे?

योगेन्द्र – इस बार के जनादेश को सिर्फ कांग्रेस की हार कहना अपर्याप्त होगा. उसकी यह हार अप्रत्याशित और बहुत गहरी ही नहीं थी, बल्कि साथ-ही-साथ यह दीर्घ काल में कांग्रेस के पतन का संकेत देती है. यूपीए की सरकार को दो मौके मिले. चूकि उसकी पहली बार की जीत भी अप्रत्याशित थी, इसलिए उस सरकार के विरुद्ध असंतोष उभरते-उभरते भी समय लगा. चूंकि यूपीए-1 की जीत अप्रत्याशित थी, इसलिए उसका आशा-निराशा का चक्र सामान्य सरकार की तरह नहीं चला. उस सरकार से आशा बंधनी देर से शुरू हुई और यूपीए की पहली सरकार खत्म होने तक भी आशा का माहौल बना ही रहा. लेकिन यूपीए-2 की शुरुआत होते ही निराशा आरंभ हो गयी. यह निराशा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चलते चरम सीमा पर पहुंची और 2014 का चुनाव आते-आते नैराश्य में बदल गया|

जनता कांग्रेस से निराश ही नहीं थी, जनता को कांग्रेस से असंतोष ही नहीं था, बल्कि उसमें गुस्सा घर कर गया था. लोग किसी भी सूरत में कांग्रेस से छुटकारा पाना चाह रहे थे. सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की ईमानदारी की चमक उतर चुकी थी. लोग इन्हें एक भ्रष्ट सरकार के मुखौटे के रूप में देखने लगे थे. राजनीतिक रूप से इस सरकार में किसी दिशा बोध का सर्वथा अभाव था. वह चाहे कश्मीर का मसला हो या तेलंगाना का, कांग्रेस सरकार एक के बाद एक आत्मघाती कदम उठाती चली गयी. सरकारी कामकाज के मामले में भी सबकुछ ठहर गया था. एक तरफ आम आदमी परेशान था, तो दूसरी तरफ उद्योगपति और पूंजीपति भी निराश हो गये थे. ऐसे में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार अप्रत्याशित नहीं थी. लेकिन कांग्रेस का आंकड़ा 50 से भी नीचे गिर जायेगा, इसकी कल्पना मैंने भी नहीं की थी|

कांग्रेस की यह अभूतपूर्व हार एक सामान्य चुनावी हार नहीं है, कि पार्टी इससे पांच साल में उबर जायेगी. यह कांग्रेस के पतन का एक नया दौर हो सकता है. 1989-91 के दौरान कांग्रेस इस देश में राजनीति की धुरी की जगह कई राष्ट्रीय पार्टियों में से एक पार्टी बन गयी थी. उसके बाद से जिस-जिस राज्य में कांग्रेस एक बार बैठ गयी, वहां वापस खड़ी नहीं हो पायी. उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु इसके बड़े उदाहरण हैं. मुङो लगता है कि इस चुनाव के बाद देश की जो मध्य पट्टी है, कांग्रेस उसमें बहुत बड़े संकट में आ सकती है. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा में कांग्रेस बीते 15 साल से विपक्ष में रही है, लेकिन किसी भी तरह का विपक्ष देने में असमर्थ रही है. इस बार कांग्रेस का इस सारी पट्टी से सफाया होने के बाद संभव है कि कांग्रेस इस इलाके में बैठ जाये और फिर कभी उबर नहीं पाये. यही दिल्ली और हरियाणा में भी संभव है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस विपक्ष में तो है, लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ सड़क पर विपक्ष की भूमिका निभा पायेगी, इसमें मुङो संदेह है. और अगर ऐसा हुआ तो राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के अप्रासंगिक होने की संभावना पैदा हो गयी है|

रंजन – कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि ‘आप’ के चुनाव मैदान में उतरने से भाजपा विरोधी मतों का बिखराव बढ़ा, जिससे भाजपा को बहुमत पाने में सुविधा हुई. दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि आप ने कांग्रेस के मुसलिम वोट बैंक में सेंध लगायी, जिससे उसकी सबसे बड़ी हार हुई. आप इन विचारों को कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – यह बहुत ही सतही समझ है. कौन किसके वोट काट रहा है, यह समझने के लिए हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि उस वोटर ने पिछले चुनावों में किसे वोट दिया था. हमें यह प्रश्न पूछना चाहिए कि वह वोटर अगर आम आदमी पार्टी मैदान में नहीं होती तो किसे वोट देता. यह कांग्रेस की खुशफहमी है कि जिन लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया, वे ‘आप’ के नहीं रहने पर कांग्रेस को वोट देते. हकीकत यह है कि उनमें से काफी लोगों ने पिछली बार कांग्रेस को भले ही वोट दिया हो, लेकिन उनमें से एक बड़ा वर्ग इस बार के चुनाव में कोई विकल्प नहीं होने पर झक मार कर भाजपा को ही वोट देता. इसीलिए आम आदमी पार्टी से भाजपा जितनी बौखलायी हुई थी, उतनी तो कांग्रेस भी नहीं बौखलायी थी|

दिल्ली विधानसभा चुनाव पर गौर करें. अगर उसमें आम आदमी पार्टी चुनाव नहीं लड़ती, तो जाहिर है भाजपा को बहुत बड़ी सफलता मिलती. अब तो दिल्ली का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल गया है और कम-से-कम दिल्ली के बारे में तो हमें यही कहना चाहिए कि वहां कांग्रेस ही आम आदमी पार्टी के वोट काट रही है. अगर कांग्रेस ने एक-दो संसदीय क्षेत्रों में वोट न काटा होता, तो शायद लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली में ‘आप’ को एक-दो सीटें मिल जाती. लेकिन राजनीति का गुणा-भाग केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता. मैं समझता हूं कि अगर आम आदमी पार्टी चुनाव में नहीं होती, तो देश के लिए, देश के भविष्य की दिशा ढूंढनेवाले काफी लोगों का मन नैराश्य में डूब जाता. नरेंद्र मोदी में देश का भविष्य न देखनेवाले लोगों को इस चुनाव में देश के भविष्य के लिहाज से कुछ नजर ही नहीं आता. आम आदमी पार्टी ने इस देश के आदर्शवादियों, और खास कर देश के युवाओं, के मन में देश के भविष्य के प्रति एक उम्मीद जगायी है. यह किसी भी चुनावी गणित से बड़ी बात है|

रंजन – इस बार के जनादेश में वामपंथी दलों की जमीन और खिसकी है. अब वाम दलों की राजनीति की दशा-दिशा और भविष्य की चुनौतियों को आप कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – पिछले दो-तीन दशकों से लेफ्ट की राजनीति धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है. लेफ्ट राष्ट्रीय ताकत की जगह पर एक क्षेत्रीय ताकत में तो पहले ही बदल चुका था, अब उन क्षेत्रों से भी धीरे-धीरे फेल होता जा रहा है. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट खत्म भले ही न हो रहा हो, लेकिन ममता बनर्जी से हार के बाद पहले जैसा दबदबा कायम नहीं कर सकता. केरल में तो एलडीएफ एक वामपंथी शक्ति बचा ही नहीं. उधर, मानिक सरकार पुरानी राजनीतिक पूंजी और अपने व्यक्तिगत प्रताप से चुनाव जीत रहे हैं|

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जनाभिमुखी और गरीब व्यक्ति के सपनों की राजनीति की जगह नहीं बची है. मैं मानता हूं कि ऐसी राजनीति भारत के लोकतंत्र के केंद्र में है और रहेगी. लेकिन मैं मानता हूं कि लेफ्ट की ‘ऑर्थोडॉक्स राजनीति’ आज जन आकांक्षाओं का वाहक नहीं बन पा रही है. जनता की आकांक्षाओं को एक नयी राजनीति की तलाश है. पिछले दो-तीन दशकों के जनांदोलन इसी तलाश का परिणाम हैं. और मैं चाहता हूं कि आम आदमी पार्टी भी इसी तलाश का वाहक बने|

रंजन – आप विकल्प की बात करते हैं, तो आपकी आर्थिक नीतियां कांग्रेस और भाजपा से किस तरह अलग हैं? क्या इस चुनाव में वामपंथी दलों की ओर से खाली हुई राजनीतिक जमीन को भरने की दिशा में आपकी पार्टी बढ़ेगी?

योगेन्द्र – किसी भी नयी राजनीति की यह नियति होती है कि उसे शुरुआत में पुराने चश्मे से ही देखा जाता है. हमारे साथ भी यही हो रहा है. हम स्थापित राजनीतिक खांचों के बाहर अपनी राजनीति स्थापित कर रहे हैं, लेकिन हमारे हर कदम को अब भी उन्हीं पुराने राजनीतिक खांचों में फिट करने की कोशिश की जाती है. मैंने बार-बार कहा है कि हमारी राजनीति न तो लेफ्ट की है, न ही राइट की|

आर्थिक नीतियों को लेकर इस देश में जो जड़ता आयी है, आर्थिक नीतियों के बारे में सोच जिस तरह से दो खांचों में बंध गयी है, हम उससे बाहर निकलना चाहते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि हम सामाजिक न्याय या आर्थिक समता के विरुद्ध हैं. इस देश का संविधान समता, न्याय और बंधुत्व की बुनियाद पर ही खड़ा है. लेकिन हम अंतिम व्यक्ति की भलाई को किसी पुराने वैचारिक खांचे से बांध कर नहीं देखते. हमारा साध्य है अंतिम व्यक्ति के हाथ में संसाधन पहुंचना, लेकिन हमारे साधन और औजार किसी बने-बनाये मॉडल से नहीं आते. अंतिम इनसान की खुशहाली अगर सरकार के दखल देने से बेहतर होती है, तो हम दखल के पक्ष में हैं और अगर सरकार के हाथ खींचने से बेहतर होती है, तो हम हाथ खींचने के पक्ष में हैं|

कुछ सेक्टर हैं- जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य-जहां हम सरकार की पहले से ज्यादा दखल चाहते हैं, लेकिन व्यापार और उद्योग में हम चाहेंगे कि सरकार कुछ न्यूनतम नियमन के अलावा बहुत ज्यादा दखलंदाजी न करे. यह बात चूंकि नयी है, इसलिए लोगों को अटपटी लगती है और वे कहते हैं कि हमारे विचार स्पष्ट नहीं हैं. लेफ्ट के साथी सोचते हैं कि हम अभी उनकी तरह हो नहीं पाये हैं. सच यह है कि हम उस तरह के वैचारिक ढांचे से बंधना ही नहीं चाहते. बीसवीं सदी की विचारधाराओं के गिरफ्त से मुक्त हुए बिना इक्कीसवीं सदी के विचारों को, इक्कीसवीं सदी की राजनीति को स्थापित नहीं किया जा सकता|

रंजन – इस जनादेश के बाद विरोध की राजनीति को आप गैर-कांग्रेसवाद से गैर-भाजपावाद में शिफ्ट होते देख रहे हैं? क्या विरोध की राजनीति को दिशा देने के लिए आम आदमी पार्टी अन्य दलों के बीच तालमेल का प्रयास करेगी, या चुनाव से पहले की एकला चलो की नीति पर ही चलती रहेगी?

योगेन्द्र – नरेंद्र मोदी की राजनीति के विरोध के दो अलग-अलग स्वरूप होंगे और इसकी दो अलग-अलग जमीन होगी. इसमें कोई शक नहीं है कि संसद के भीतर गैर-भाजपाई ताकतें किसी न किसी किस्म का गैर-भाजपावाद चलाने की कोशिश करेंगी. यह कोई नयी चीज नहीं है. पिछले तीस साल में कांग्रेस, वामपंथी दलों और कुछ अन्य संगठनों ने मिल कर इस तरह की कोशिशें कई बार की है|

लेकिन इसके अनुभव ने हमें सिखाया है कि भाजपा के विरोध के लिए मतलबी गंठजोड़ बनाने से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि इससे भाजपा और ज्यादा मजबूत होती है. इस प्रयोग ने यह भी सिखाया है कि भाजपा विरोध के नाम पर सेक्युलर खेमा बनाने की कोशिश भी एक ढकोसला बन कर रह जाती है. कांग्रेस, राजद, सपा सरीखे पार्टियों का सेक्युलरिज्म मुसलमानों को बंधक बनाये रखने का षड्यंत्र है. जनता इसे खारिज कर चुकी है. मुङो नहीं लगता कि इस तरह के किसी प्रयास से भाजपा का विकल्प बनाने में कोई मदद मिलेगी. संसद के भीतर एकाध बार कुछ छोटी सफलता मिल सकती है, लेकिन इससे भाजपा की राजनीति का मुकाबला करने की ऊर्जा खड़ी नहीं हो सकती|

आम आदमी पार्टी कांग्रेस विरोध या भाजपा विरोध के नाम पर अवसरवादी गंठबंधनों के खिलाफ रही है. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब संसद में भाजपा के खिलाफ कभी-कभार बोल देना या उसके कुछ कानूनों का विरोध करना भर नहीं होगा. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब होगा उस तरह की राजनीति का विरोध करना, जिसकी प्रतीक आज भाजपा है. हमारे लिए भाजपा के विरोध का मतलब होगा हर किस्म के भ्रष्टाचार का विरोध करना, हर किस्म की सांप्रदायिकता का विरोध करना, देश में लोकतंत्र के हनन का विरोध करना और एक नंगे किस्म के पूंजीवाद का विरोध करना. आज भाजपा इन खतरों का प्रतीक है, लेकिन सिर्फ भाजपा इस अपराध की दोषी नहीं है|

इसमें देश का पूरा सत्ता प्रतिष्ठान शामिल रहता है. इसलिए विपक्ष की राजनीति हमारे लिए ऐसी राजनीति नहीं हो सकती कि हम सिर्फ भाजपा के भ्रष्टाचार के बारे में बोलें, और कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर चुप हो जायें. सिर्फ भाजपा की सांप्रदायिकता के बारे में बोलें और सपा या एमआइएम (मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन) की सांप्रदायिकता पर मौन साध लें. विपक्ष की राजनीति हमारे लिए केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगी. मैं समझता हूं कि अगले पांच साल तक मोदीमय भाजपा के विरोध का असली मंच संसद नहीं होगा, बल्कि इस लड़ाई को सड़क और मैदान पर लड़ना होगा. मुङो नहीं लगता कि यह कांग्रेस के बस की बात है|

इसलिए आम आदमी पार्टी को यह बीड़ा उठाना पड़ेगा. संसद में भले ही हम एक छोटी विपक्षी पार्टी के रूप में गिने जायेंगे, लेकिन अगले पांच साल में आम आदमी पार्टी जमीन पर इस देश की प्रमुख विपक्षी ताकत के रूप में उभरेगी. जहां तक दूसरी पार्टियों के बीच तालमेल का सवाल है, मेरे अब तक के जवाब में ही इसका उत्तर अंतर्निहित है, यानी कि भाजपा विरोध के नाम पर भानुमति का कुनबा जोड़ने की राजनीति में हमारा विश्वास नहीं है|

रंजन – भाजपा के कुछ नेताओं ने कहा है कि इस वक्त भाजपा विरोध की बात करना 2014 के जनादेश का अपमान होगा?

योगेन्द्र – मैं समझता हूं कि लोकतंत्र में यह कहना ही लोकतंत्र का अपमान है, कि किसी भी दल का विरोध करना जनादेश का अपमान होगा. मैं समझता हूं कि अगर कोई पार्टी इतना बड़ा जनादेश लेकर सत्ता में पहुंची है, तो उसे स्वयं इस बात की चिंता होनी चाहिए कि उसके किसी गलत कदम का अच्छा विरोध हो पायेगा या नहीं. विपक्ष तो लोकतंत्र की आत्मा है. उससे डरना लोकतंत्र से डरना होगा|

रंजन – यह भी कहा जा रहा है कि इस बार के जनादेश में यूथ फैक्टर काफी अहम रहा है. देश के करोड़ों युवा मतदाताओं की आकांक्षाएं अलग तरह की हैं और उनमें बड़ी उम्मीद है नरेंद्र मोदी को लेकर, इसलिए उन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठ कर विकास के नाम पर, मोदी सरकार बनाने के लिए मतदान किया है. इस संबंध में आपकी क्या राय है?

योगेन्द्र – मैंने इस बार के चुनाव के आंकड़े ठीक से देखे नहीं हैं, क्योंकि मैं किसी भी सव्रेक्षण की टीम में शामिल नहीं था. इसलिए मैं प्रमाण के साथ तो नहीं कह पाऊंगा, लेकिन मुङो इस तरह के दावों में अतिशयोक्ति नजर आती है. इसमें कोई शक नहीं कि भारत में युवाओं और युवा मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. और इसमें भी कोई शक नहीं कि बाकी मतदाता-समूहों की तुलना में युवाओं में भाजपा के लिए आकर्षण अपेक्षाकृत ज्यादा है, लेकिन इतना भर से युवा वोट या युवा शक्ति का भाजपामय हो जाना जैसे निष्कर्षो पर हम नहीं पहुंच सकते. हमें अभी देखना है कि युवाओं का यह रुझान झणिक है या दीर्घकालिक. इसके बाद ही किसी बड़े निष्कर्ष पर हम पहुंच सकते हैं|

रंजन – पहले माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का जाति आधारित मजबूत जनाधार है, लेकिन अब कहा जा रहा है कि खासकर हिंदी पट्टी में यूथ फैक्टर इतना कारगर रहा कि क्षेत्रीय दलों के किले ध्वस्त हो गये. इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों का जनाधार क्यों खिसक गया और इसके बाद क्षेत्रीय दलों की राजनीति के समक्ष क्या प्रमुख चुनौतियां हैं?

योगेन्द्र – इस चुनावी लहर में भाजपा या भाजपा समर्थक दलों को छोड़ कर बाकी ज्यादातर दलों को भारी नुकसान हुआ है. खास कर उत्तर भारत के क्षेत्रीय दल इसी का शिकार हुए हैं. हालांकि यह बात दक्षिण और पूर्वी भारत के क्षेत्रीय दलों पर पूरी तरह लागू नहीं होती है. अन्ना द्रमुक, द्रमुक, वाइएसआर की पार्टी, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति, बीजेडी और ममता बनर्जी की पार्टी को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. अगर नुकसान हुआ तो मुख्यत: उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा के क्षेत्रीय दलों को. इसलिए यहां उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्रीय दलों की हार पर अलग से गौर करना बेहतर होगा|

मैं समझता हूं कि इन दोनों राज्यों में मंडलीकरण के बाद की जातीय राजनीति अपने एक चरम बिंदु पर पहुंच कर अप्रासंगिक होने लगी थी. जातिगत राजनीति की यही नियति है कि एक जाति आधारित वोट बैंक मजबूत होते-होते एक ऐसे बिंदु तक पहुंच जाती है, जहां राजनीतिक जड़ता आ जाती है और जहां लोगों को समझ आने लगता है कि इस जड़ता से बाहर निकलने की जरूरत है. खासकर उत्तर प्रदेश में लोगों ने पिछले दस-पंद्रह वर्षो में सभी मुमकिन राजनीतिक समीकरण इस्तेमाल कर लिये थे- अगड़ों का, पिछड़ों का, दलित, यादव, मुसलिम आदि सभी इस्तेमाल हो चुके थे. और यह यात्रा एक ठहराव के बिंदु पर पहुंच गयी थी|

इस बार भाजपा की बड़ी विजय उसके परंपरागत सामाजिक समीकरण की विजय नहीं है. वह सभी जाति-समुदायों के एक बड़े हिस्से को जोड़ कर बेहतर सरकार बनाने की राजनीति की विजय है. इस लिहाज से नरेंद्र मोदी की विजय में कहीं जातिवादी राजनीति से मुक्त होकर एक बेहतर सरकार और बेहतर राजकाज की इच्छा शामिल थी. मुङो नहीं लगता कि भाजपा या नरेंद्र मोदी वास्तव में इस इच्छा को पूरा कर पायेंगे, लेकिन इस इच्छा का होना दोनों राज्यों में, खास तौर पर उत्तर प्रदेश में एक सार्थक राजनीतिक संभावना की ओर इशारा कर रहा है|

रंजन – यदि जातीय राजनीति अप्रासंगिक हो जायेगी, तो कई क्षेत्रीय दलों का ‘वोट बैंक’ ही खत्म हो जायेगा. ऐसे में इस जनादेश के बाद क्षेत्रीय दलों को अपनी राजनीति को किस तरह से आगे बढ़ाना होगा?

योगेन्द्र – इस विषय में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय, सभी सभी दलों को विचार करने की जरूरत है. खास कर उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति एक खास दौर से गुजर चुकी है. सामाजिक न्याय के नारे के तहत हुई राजनीति के इस दौर में लोगों के जीवन के, रोजमर्रा के, मुद्दों में बेहतरी के सवाल गौण हो गये थे. मोदी की जीत इस ओर इशारा करती है कि इन सवालों को दबाया नहीं जा सकता. यानी क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय, सभी दलों को खुद को आम लोगों की जिंदगी में खुशहाली के सपने से जोड़ना होगा. मैं नहीं मानता कि नरेंद्र मोदी इस काम को पूरा कर पायेंगे. हालांकि वे इस सपने के वाहक बनते हुए दिखाई दे रहे हैं, इस बात से मैं इनकार नहीं कर सकता|

रंजन – क्षेत्रीय दलों की ओर से सामाजिक न्याय का नारा भी तो इसी तर्क के साथ दिया जाता है कि संसाधनों के बंटवारे में जो लोग अपना हिस्सा पाने से वंचित रह गये हैं, उन्हें उनका हक दिलायेंगे. तो इस जनादेश से क्षेत्रीय दलों को क्या सबक लेने की जरूरत है|

योगेन्द्र – सामाजिक न्याय की राजनीति ने इस प्रकार के नारे तो दिये, लेकिन व्यवहार में वह राजनीति केवल प्रतीकात्मक हिस्सेदारी की राजनीति बन गयी. इसमें चेहरों में तो हिस्सेदारी हुई, यानी कितने एमएलए किस समुदाय के बनेंगे, कितने मिनिस्टर किसके बनेंगे; लेकिन विकास के फल में हिस्सेदारी का माहौल नहीं बन पाया|

मैं समझता हूं कि बिहार में शुरू में यह सबक नीतीश कुमार सरकार ने सीखा, कि लोगों को सिर्फ सामाजिक न्याय का नारा नहीं चाहिए, उसे सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, रोजगार आदि में हिस्सेदारी भी चाहिए, हालांकि बाद में वे भी इस पर पूरी तरह कायम नहीं रह पाये. मुङो लगता है कि इस बार के जनादेश से खास कर उत्तर प्रदेश में सपा एवं बसपा और बिहार में राजद को यह सबक सीखना होगा कि जब तक वे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के सवालों पर कुछ करेंगे नहीं, तब तक सिर्फ प्रतीकात्मक सामाजिक न्याय की बात करने से उनकी राजनीति बहुत दिन तक टिकनेवाली नहीं है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद से काफी कम क्यों रहा?

योगेन्द्र – आम आदमी पार्टी के लिए यह जनादेश न तो निराशाजनक रहा है और न ही बहुत अप्रत्याशित. संभव है कि हमारे कुछ समर्थकों, शुभचिंतकों के मन में बड़ी उम्मीदें बंध गयी थीं. लेकिन दरअसल अपने पहले लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी से इससे ज्यादा अपेक्षा करनी ही नहीं चाहिए. पिछले तीस-चालीस साल में केवल दो नयी राष्ट्रीय पार्टियां इस देश में स्थापित हुईं- भाजपा और बसपा. उन दोनों पार्टियों के पहले लोकसभा चुनाव पर आप गौर कीजिए. 1984 में भाजपा ने अपना पहला राष्ट्रीय चुनाव लड़ा था, उसे सिर्फ दो सीटें आयी थीं. लेकिन चूंकि उसमें एक पुरानी पार्टी का अंश शामिल था, इसलिए उसे सात फीसदी वोट हासिल हो गये थे. 1989 में बसपा ने पहली बार राष्ट्रीय चुनाव लड़ा, उसे दो सीटें आयीं और दो प्रतिशत वोट हासिल हुए. इस तरह पहले चुनाव के लिहाज से हमारा प्रदर्शन बुरा नहीं है|

हां, हमें दिल्ली में निराशा जरूर हुई. दिल्ली में हमारा वोट प्रतिशत भले ही बढ़ा हो, लेकिन हमें कोई सीट नहीं मिली और भाजपा का फासला हमसे बढ़ा. हमें वाराणसी में भी निराशा हुई. मैंने सोचा था कि दिल्ली के बाद हमें हरियाणा में एक नयी शुरुआत मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. लेकिन इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को जो हासिल हुआ है, वह कम नहीं है. चार सीटें अपने-आप में कम जरूर लगती हैं, लेकिन दिल्ली से बाहर एक नये राज्य-पंजाब-में हमें कामयाबी मिली है|

रंजन – इस चुनाव में ‘आप’ को उम्मीद से काफी कम सीटें मिलने पर कुछ विश्लेषक दो बड़े कारण गिना रहे हैं. पहला, दिल्ली में 49 दिनों में ही सरकार चलाने से इनकार कर देना और दूसरा, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव तथा ज्यादातर फैसले अरविंद केजरीवाल एवं मनीष सिसोदिया जैसे कुछेक नेताओं द्वारा मनमाने तरीके से लिया जाना. आप क्या कहेंगे?

योगेन्द्र – जहां तक दिल्ली सरकार के इस्तीफा देने का सवाल है, इसमें कोई शक नहीं कि इस्तीफा देने से दिल्ली में भी और दिल्ली के बाहर भी बड़े तबके को धक्का लगा. उन्हें लगा कि कोई सरकार, जो उनके लिए बहुत सारे काम कर सकती थी, अचानक चली गयी. और पूरे चुनाव में यह बात हमें हर जगह और बार-बार सुनने को मिली. हम पर भगोड़े का आरोप कहीं चिपक गया. हम तर्क देते रह गये, लेकिन जनता हमारी बात को नहीं मानी. राजनीति का काम है जनता से सबक लेना. और मैं समझता हूं कि यह एक सबक हमारे लिए है कि हमें दिल्ली सरकार को छोड़ने का फैसला भी हमें जनता के साथ किसी राय-मशविरे के बाद लेना चाहिए था, जैसा कि हमने सरकार बनाने के वक्त किया था. और अगर जनता कहती कि छोड़ना नहीं चाहिए, तो हमें जनता की बात माननी चाहिए थी. उसमें हमारी राजनीतिक समझ की एक चूक हुई, यह मानने में हमें कोई संकोच नहीं है|

रही बात पार्टी की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया की, तो मैं समझता हूं कि आम आदमी पार्टी देश की अन्य पार्टियों की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक है और पूरी तरह से लोकतांत्रिक बनना अपने आप में एक प्रक्रिया है, जिसमें तमाम उतार-चढ़ाव आते हैं. और मुङो यकीन है कि स्वराज के जिस विचार को लेकर यह पार्टी बनी है, उसे यह अपनी कार्यप्रणाली में भी समाहित कर पायेगी|

रंजन – इस जनादेश के बाद आपलोगों ने इस पर मंथन किया होगा. आम आदमी पार्टी ने इस जनादेश से क्या-क्या प्रमुख सबक लिये हैं और उनके आधार पर पार्टी आगे अपनी रणनीति में किस तरह की तब्दीली करने जा रही है?

योगेन्द्र – अभी हमारी बैठकों का सिलसिला पूरा नहीं हुआ है और हमारी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होनी अभी बाकी है. इसलिए मैं अपनी समझ के बारे में ज्यादा कह पाऊंगा, पार्टी की सामूहिक समझ के बारे में अभी ज्यादा नहीं कह पाऊंगा|

मुङो लगता है कि हमारे लिए बड़ा सबक यह है कि लोग हमारी ईमानदारी पर तो भरोसा करते हैं, लेकिन हमारी समझदारी के बारे में अभी आश्वस्त नहीं हैं. हमें लोगों के बीच यह साबित करना है कि हम सरकार बनाने और चलाने के बारे में गंभीर हैं. हममें सरकार चलाने की काबिलियत है और हम रोजमर्रा के मुद्दों को हल करने के लिए धैर्य के साथ काम कर सकते हैं|

दूसरा सबक यह है कि पोलिंग बूथ के स्तर पर संगठन बना कर पोलिंग बूथ मैनेजमेंट किये बिना बड़ी पार्टियों के मुकाबले में चुनाव लड़ना और जीतना संभव नहीं है|

तीसरा सबक कह लीजिये या चुनौती, बड़े मीडिया और बड़ी पूंजी का जो सम्मिलित हमला है, उसके सामने टिकना आसान काम नहीं है. इस बार के चुनाव में जिस तरह से इस देश का बड़ा पूंजीपति वर्ग और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा नरेंद्र मोदी के प्रचार-प्रसार में लग गया, उसके सामने खड़ा होने की रणनीति अभी हमारे पास नहीं है. इसकी रणनीति हमें बनानी पड़ेगी|

इसका मतलब है कि आम आदमी के लिए आगे का रास्ता है संगठन का निर्माण करना. हमें नीचे से ऊपर तक, यानी पोलिंग बूथों से लेकर संसदीय क्षेत्रों तक, राज्यों से राष्ट्र स्तर तक अपना संगठन बनाना होगा और आनेवाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से जनता को समझाना होगा कि हम गंभीर और सफल सरकार बनाने में सक्षम हैं. यह काम असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए बहुत धीरज की जरूरत है|

रंजन – एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक से एक संसद सदस्य बनने की दिशा में आपके द्वारा उठाये गये कदम का एक उम्मीदवार के रूप में व्यक्तिगत अनुभव कैसा रहा और इससे आपको क्या-क्या नयी चीजें सीखने को मिलीं?

योगेन्द्र – मेरे लिए पूर्णकालिक राजनीति में आना उतना बड़ा बदलाव नहीं था, जितना बाहर से दिखाई दे रहा था. पिछले तीन दशकों से मैं देश के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ा रहा हूं, देश भर की खाक छानता रहा हूं, तमाम जनांदोलनों का हमसफर रहा हूं. इसलिए मेरे लिए राजनीति में या जमीन पर काम करना उतनी नयी चीज नहीं थी. लेकिन फिर भी बदलाव तो था और बहुत बड़ा बदलाव था. खास तौर पर जमीन पर चुनाव लड़ना और जीतने के इरादे से चुनाव लड़ना एकदम नया अनुभव था. इसने मुङो बहुत कुछ सिखाया. पहला तो यह सीखा कि मैं राजनीति के बारे में कितना कम जानता हूं. दुनिया मुङो विशेषज्ञ होने का तगमा जरूर देती रही है, लेकिन सच बात यह है कि राजनीति का वह किताबी ज्ञान धरातल पर चुनाव लड़ने के वक्त बहुत काम नहीं आया|

दूसरा यह कि जिस इलाके को मैं अपनी मातृभूमि और कर्मभूमि मानता रहा हूं, उस इलाके को भी मैं कितना कम जानता हूं. मेरे लोकसभा क्षेत्र के कितने गांव, इलाके, क्षेत्र ऐसे थे, जिन्हें मैंने कभी देखा भी नहीं था, जिनके दुख-तकलीफ को मैं समझता भी नहीं था. इसलिए चुनाव में असफल होने पर पहला विचार मेरे मन में यही आया कि शायद अभी मैं इसके काबिल ही नहीं था. मुङो तो अभी अपने इलाके के बारे में बहुत कुछ जानना है, समझना है|

तीसरा, कुछ खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए. कुछ इस किस्म के अनर्गल और व्यक्तिगत आरोप लगे, जो तीखे तो थे ही, बहुत छिछले भी थे और मेरी चमड़ी अभी इतनी मोटी नहीं है कि इन बातों का कोई असर नहीं पड़े. जाहिर है, दिल को चोट भी पहुंची और मैं अभी समझ नहीं पाया हूं कि उस किस्म की घटिया हरकतों से कैसे निपटा जाये, जिससे मानसिक द्वेष न हो|

लेकिन सबसे बड़ा अनुभव यह रहा कि आम लोगों का इतना प्यार मिला, जितना पहले न तो कभी मुङो मिला था और न ही जिसके मैं काबिल हूं. केवल अपने गांव के इर्द-गिर्द नहीं, केवल स्वजातीय लोगों में नहीं, बल्कि तमाम इलाकों में वोट मिला या न मिला हो, लेकिन मुङो लोगों का भरपूर स्नेह मिला. क्षेत्र के भीतर से और बाहर से इतने सारे कार्यकर्ताओं ने खुद आकर धन दिया, ऊर्जा दी और इस चुनाव अभियान को अपना अभियान बना दिया|

अप्रैल 23, 2014

अरविंद केजरीवाल : हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के शातिराना खेल का हिस्सा है मीडिया

Arvindbenaras15 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल बनारस पहुंचे भारत के चुनाव की सबसे बड़ी जंग में भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद मोदी को चुनौती देने के लिए| बनारस पहुँचते ही वे सड़क पर निकल पड़े और पहुँच गये एक ऐसे परिवार के घर जिनका एकमात्र कमाऊ सदस्य दुर्भाग्य से मेनहोल में घुसकर सीवर की सफाई करने के दौरान मृत्यु को प्राप्त हो गया था| शोकग्रस्त परिवार से मिलने के बाद उन्होंने एक संवाद कार्यक्रम में शिरकत की जहां लोगों ने उनसे विभिन्न तरह के सवाल पूछे| 

अगले दिन वे रोहिण्या, जो कि काशी देहात का क्षेत्र है, में पहुँच गये और गाँवों में रैलियां और सभाएं करते रहे और बीच में अपने रास्ते में अपने प्रशंसकों से रुक कर मिलते रहे| एजाज़ अशरफ कपारफोड़वा गाँव में अरविंद केजरीवाल के वाहन पर सवार हो गये और हर्सोस गाँव आने तक जहां एक और रैली थी, २०-२५ मिनट अरविंद केजरीवाल से सवाल पूछते रहे|

जब आप कुछ दिन पहले वाराणसी आए थे तो आप पर अंडे और स्याही फेंके गये थे| तब से आप पर कई बार हमले किये ज चुके हैं| आप पर इन हमलों का क्या असर पड़ा है? 

ये हमले वाराणसी में शुरू नहीं हुए|  कब शुरू हुए ये हमले? ये शुरू हुए जब मैंने मार्च की शुरुआत में गुजरात की यात्रा की| क्या यह केवल एक संयोग है या इससे अधिक कुछ है? मैं वास्तव में नहीं जानता| हम बहुत बड़े लोगों का विरोध कर रहे हैं और जाहिर सी बात है कि वे लोग चुप तो बैठेंगे नहीं| वे हम पर हमले करेंगे|

 इन हमलों ने व्यक्तिगत रूप से आप पर क्या प्रभाव डाले हैं|

ऐसे  हमलों से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ था क्योंकि ये तो अपेक्षित थे| मुझे ऐसा भी लगता है कि चुनाव होने तक ये हमले हल्के रहेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि मुझ पर घातक हमला करने से चुनाव में उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है|  पर चुनाव के बाद, मुझे लगता है वे मुझे छोड़ेंगे नहीं| वे लोग कुछ करेंगे| मोदी और अंबानी जैसे लोग … मुझे बताया गया है कि उधोगपतियों को धमकाया गया है, संपादकों को धमकाया गया है|  उन्हें कहा गया है कि मोदी सत्ता में आ रहे हैं और मोदी किसी को नहीं छोड़ते और वे बदला हमेशा लेते हैं| तो वे मुझसे भी बदला लेंगे…पर मैं तैयार हूँ किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए|

आपका परिवार कैसे लेता है इन सब बातों को?

वे नर्वस हैं| मैं उन्हें शांत करने की कोशिश करता हूँ| मुझे लगता है उनके पास अब कोई विकल्प भी नहीं है (हँसते हुए)

आप मार्च में भी वाराणसी आए थे| तब और अब के बीच आपके चुनाव प्रचार ने किसी प्रगति की है?

यह केवल मेरा चुनाव प्रचार नहीं है| यह तो जनता का चुनाव प्रचार है| यदि यह मेरा चुनाव प्रचार होता तो अलग बात होती और मैं आपके सवाल का जवाब दे सकता था| सांसद बन्ना मेरा लक्ष्य नहीं  है| मेरा लक्ष्य लोगों को जागरूक बनाना है| उन्हें बदलाव के लिए तैयार करना है| यदि वे इस बार जाग जाते हैं अच्छा है अन्यथा अगले चुनाव में सही| मेरी लड़ाई जारी रहेगी|

“आप” के उम्मीदवार पर नालंदा, बिहार में भी  हमला किया गया था|  कुछ उम्मीदवारों ने अपना नामांकन वापिस ले लिया| क्या ये दूसरों द्वारा डाले दबाव के कारण है…? T

दबाव एक कारण हो सकता है| कुछ उम्मीदवारों ने नामांकन वापिस लिए हैं क्योंकि हमारी पार्टी के पास उन्हें देने के लिए पैसे नहीं थे और उनके पाने पास भी पैसे नहीं थे| तो उन्होंने अपने नाम वापिस ले लिए यह कह कर कि किसी और उम्मीदवार को टिकट दे दिया जाए|  उन्होंने चुनाव से भले ही नाम वापिस ले लिए हों पर वे पार्टी के साथ खड़े हैं| दबाव भी एक कारण हो सकता है पर मेरे पास इस बात का कोई सुबूत नहीं है| नालंदा से हमारे उम्मीदवार पर किया हमला बताता है कि आज की राजनीति कितने एअमान्वीय हो चुकी है|

AK banaras1आप वाराणसी में मुस्लिम समुदाय से भी मिले हैं| आपको कैसी प्रतिक्रया मिली उनसे? 

स्पष्टत: मुस्लिम मोदी को हराना चाहते हैं| लेकिन हम इसे दूसरी तरह से देख रहे हैं| यदि इस बार ऐसा संभव हो कि हिंदू और मुसलमान मिल कर वोट दें बिना किसे प्रकार के ध्रुवीकरण का शिकार हुए हुए… आपको पता ही है कि मोदी की राजनीति ध्रुवीकरण वाली राजनीति है| क्या हम सभी संप्रदायों और जातियों के लोगों को एक साथ ला सकते हैं चुनाव लड़ने के लिए?  मुख्य प्रश्न यह है हमारे सामने| और यही हमारा ध्येय भी है|

मूलत: हमारी जंग तो सच्चाई और ईमानदारी के लिए है| ये तो सार्वभौमिक मूल्य हैं चाहे हिंदुत्व के एबात करें या इस्लाम की, या सिख धर्म की बात करें या जैन धर्म की| ये मूल्य हरेक धर्म में उपस्थित हैं| हमारी लड़ाई समाज में प्रेम और इंसानियत को कायम रखने की है|  उनकी राजनीति नफ़रत भरी है जबकि हम प्रेममयी राजनीति करना चाहते हैं|  उनकी राजनीति भ्रष्टाचार की पोषक भी है जबकि हम ईमानदारी की स्थापना राजनीति में करना चाहते हैं| यह अनिवार्य हो गया है कि सभी लोग एक साथ आएं और इस लक्ष्यपूर्ति में सहयोग दें|  I

तो एक तरह से वाराणसी उस राजनीतिक बदलाव की राजधानी बन सकता है जो आप और आपकी पार्टी दोनों देखना चाहते हैं?

ईश्वर ने वाराणसी और अमेठी के लोगों के हाथ में देश की राजनीति बदलने की कुंजी दे दी है| यदि लोग बाहर निकलते हैं और मोदी को वाराणसी में और राहुल गांधी को अमेठी में हरा देते हैं तो भारत की राजनीति में भूचाल आ जायेगा| कांग्रेस और भाजपा दोनों खत्म हो जायंगे| एक साल बाद फिर से चुनाव होगा और आप देखेंगे कि नये किस्म के लोग राजनीति में शामिल होंगे|

मुख्तार अंसारी ने चुनाव से अपनी उम्मीदवारी वापिस ले ली है| लोग इस बात को कई तरीकों से देख रहे हैं| (2009 में, मुख़्तार अंसारी, एक कथित माफिया, बसपा के टिकट पर वाराणसी से लड़ा था और भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से  करीब 17000 वोटों से हार गया था) )

मुख्तार अंसारी इस देश का एक नागरिक है और यह उसकी स्वतंत्रता है कि वह चुनाव लड़े या अपना नाम वापिस ले ले| यह उस पर निर्भर करता है| लेकिन हम उसके संपर्क में नहीं हैं|

क्या आपने एक बार भी वाराणसी से हार जाने के बारे में सोचा है? क्या आपको हार का भय नहीं है?

जीत हो या हार, मैं इन् बातों की चिंता नहीं करता|  जीत या हार कुछ भी मेरी नहीं होगी| यह लोगों की जीत या हार होगी| मेरा लक्ष्य लोगों को यह समझाना है| मेरे हाथ में सिर्फ कर्म करना है फल तो ईश्वर के हाथ में है|

क्या आपको लगता है कि मीडिया के साथ आपके संबंधों में सुधार आ रहा है?

निश्चित रूप से नहीं! यह फेज तो बहुत महत्वपूर्ण है उनके लिए|  बहुत बड़ी मात्रा में धन निवेश  किया गया है मीडिया में और मीडिया-मालिकों और संपादकों को धमकियां दी गई हैं| मैं कुछ ऐसे रिपोर्टर्स को जानता हूँ जिनके बीट को केवल इसलिए बदल दिया गया क्योंकि उन्होंने हमारे पक्ष में साधारण से ट्वीट कर दिए|

क्या “आप” ने Times Now का बहिष्कार किया हुआ है? “आप” के प्रतिनिधि उस चैनल पर दिखाई नहीं देते| 

 हाँ, हम लोग कुछ टीवी चैनल्स से दूरी बना कर चल रहे हैं| क्योंकि हमने देखा कि वे हमारे खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे थे और गलत तरीकों से भाजपा को प्रचारित करने के लिए हमें निशाना बना रहे थे|  

तो हमने निर्णय लिया कि ऐसे चैनल्स के साथ बातचीत का कोई फायदा नहीं है| क्योंकि जो भी हम बोलेंगे वे लोग उसे तोडमरोड कर ही प्रस्तुत करेंगे|  तो हमने तय किया कि वे जो चाहें वो दिखाएँ हमारे बारे में अगर उनको अपनी ही मर्जी से ही तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना है तो उनसे बात करके भी क्या लाभ होगा? हम लोग बहुत छोटे हैं वे बहुत बड़े हैं, बहुत शक्तिशाली हैं Times Now, India TV, India News, Dainik Jagran.

वाराणसी में आपका पहला पड़ाव एक दलित बस्ती में था और वहाँ का एक आदमी मेनहोल में सफाई करते हुए मारा गया था| पर टीवी आपकी काजी से मुलाकत को ही दिखाता रहा|

मीडिया पक्षपाती है| It यह भी हिंदू-मुस्लिम का ध्रुवीकरण काने वाले तंत्र का एक हिस्सा है| मीडिया स्वतंत्र नहीं है| सारे मीडिया के बारे में ऐसा नहीं कहूँगा| कुछ मीडिया अच्छा भी है| कुछ रिपोर्टर अच्छे हैं|  कुछ मीडिया के मालिक भ्रष्ट हो चुके हैं| पत्रकार मालिकों के दबाव के सम्मुख टिक नहीं पाते| उन्हें नौकरी की रक्षा करनी पड़ती है|

15 अप्रैल को वाराणसी के प्रभावशाली व्यापारियों के साथ आपकी भेंट हुयी| मैंने उनमें से कुछ के साथ बात की और मुझे लगा कि उनमें से बड़ी उम्र के लोग “आप” से भयभीत थे| 

वे “आप” से क्यों भयभीत हैं? भेंट में उन्होंने हमारी अर्थनीति के सन्दर्भ में कुछ शंकाएं व्यक्त कीं| मैंने उनके सभी शंकाओं का निवारण किया और मुझे लगा जी वे लोग बेहद प्रसन्न थे| |मैंने सुबूतों  के साथ उनसे स्पष्ट कहा और मैंने उन्हें अपने पुराने भाषण दिखाए कि मैं कोई अभी कहानियां नहीं बना रहा उनके सामने, बल्कि हमारी अर्थनीति में एक निरंतरता बनी रही है| उन्होंने इस बात को सराहा| मैंने उनसे कहा कि सबसे बड़ा सुबूत तों आँखों देखे अपने अनुभव का है|  मैंने उन्हें बताया कि दिल्ली में  49 दिनों की सरकार के दौरान मैंने दिल्ली के व्यापारियों और उधोगपतियों के साथ भेंट की और हमने कानूनों को आसान बनाने की चेष्टा की| वैट को आसान बनाया| हमने उधोगपतियों के लिए कुछ सार्थक करने की कोशिश की|   मैंने उन्हें बताया कि वे मेरे कहे पर न जाकर मेरे कहे की खुद ही जांच कर लें|  मुझे तों कहीं से नहीं लगा कि वे हमसे भयभीत थे|

(कार रुकती है, लोगों का झुण्ड उनसे बाहर निकलने के लिए अनुरोध करता है| लोग उन्हें माला पहनाते हैं और उनके समर्थन में नारे लगाते हैं| थोड़ी देर में वे वाहन में वापिस आ जाते हैं| मैं पूछता हूँ- कितना थकान भरा है यह सब संभालना?)

चुनाव प्रचार बेहद थकान वाला काम है| आपको पता है उनमें से एक ने मुझसे कहा कि एक आदमी के दो जगहों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए| उसने कहा कि उसे भी दो क्षेत्रों से वोट देने की सुविधा मिलनी चाहिए क्योंकि नेता तों दो जगह से चुनाव लड़ लेते हैं|   गाँव वालों के पास बहुत विचार हैं|

मुझे यह भी बताया गया कि व्यापारियों के समूह में युवावर्ग “आप” के प्रति ज्यादा उत्सुक और खुला हुआ था|

हाँ मुझे भी ऐसा महसूस हुआ|लेकिन वास्तव में किसी व्यापारी को “आप” से डरने की जरुरत नहीं  है|

आपको भारत  की संसदीय प्रतिनिधि  प्रणाली में क्या कमियां लगती हैं?

हमारे लोकतंत्र में कुछ समस्याएं हैं| जैसे लोकसभा सीट के क्षेत्र बहुत बड़े बड़े हैं और एक प्रतिनिधि लगभग 20-25 लाख लोगों का अप्रतिनिधित्व करता है| बड़े लोकसभा क्षेत्रों को बांटने की जरुरत है|  और सांसद और विधायकों के पास वास्तव में कोई शक्ति नही हैं जबकि लोगों की उनसे अपेक्षायें बहुत होती हैं|  शक्तियां ब्यूरोक्रेट्स को दी गई हैं जो कि जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं| उन्हें मुख्या धारा में लाये जाने की जरुरत है| (गवर्नेंस तंत्र विकसित करने की जरुरत है)

आपकी पंजाब यात्रा कैसी थी?

बहुत अच्छी, देवीय, बहुत ही अच्छी| मुझे इतने बढ़िया रेस्पोंस की अपेक्षा नहीं थी| मैंने इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में लोगों को सड़कों पर आते हुए नहीं देखा|  हमें पंजाब में अच्छा प्रदर्शन करना चाहिए|

AK nominationतो लोकसभा चुनाव में कितनी सीटें “आप” को मिल जायेंगीं?

(हँसते हुए) आपको सच बताऊँ तो मुझे इन सब बातों की चिंता नहीं है, कभी नहीं रही| मेरा मानना रहा है कि – कर्म करते रहो ईश्वर अपने आप फल देगा|

“आप” की क्या भूमिका संसद में रहेगी?

(हँसते हुए) अगर हमें बहुमत मिलता है तो हम सरकार चलायेंगे…

अरे बहुमत नहीं…

अन्यथा विपक्ष में बैठेंगे|

किसी के साथ गठबंधन नहीं?

नहीं!

वाराणसी में 12 मई को चुनाव के बाद आपकी क्या योजना है?

मैं जयपुर जाउंगा विपस्सना करने| मतगणना वाले दिन भी मैं ध्यान में रहूंगा| मैं वहाँ  20 मई तक रहूंगा|

अगर “आप” चौंकाने वाले परिणाम लेकर आती है और आपकी जरुरत हो सरकार बनाने की प्रक्रिया में?

और लोग निर्णय लेंगें| पार्टी सिर्फ अरविंद केजरीवाल तों है नहीं|

क्या आप हरियाणा और बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ेंगे?

हम लोग लोकसभा चुनाव के नाद तैयारी शुरू कर देंगे|

आपको फंड कहाँ से मिलेगा?

जनता  के पास से फंड आएगा| यह उनका चुनाव है| 

By Ajaz Ashraf
मूल साक्षात्कार अंग्रेजी में – Arvind Kejriwal interview

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