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सितम्बर 14, 2015

हिंदी दिवस के ढकोसले को बंद कीजिये : योगेन्द्र यादव

हर साल 14 सितम्बर के दिन ऊब और अवसाद में डूब कर हिंदी की बरसी मनायी जाती है। सरकारी दफ्तर के बाबू हिन्दी की हिमायत में इसका कसीदा और स्यापा दोनों एक साथ पढ़ते हैं। हिंदी की पूजा-अर्चना और अतिशयोक्ति पूर्ण महिमामंडन के मुखौटे के पीछे हिंदी के चेहरे पर पराजयबोध साफ़ झलकता है। मानो, इस दिन दुनिया की (चीनी,स्पेनिश और अंग्रेजी के बाद ) चौथी सबसे बड़ी भाषा अपना जीवित-श्राद्ध आयोजित कर रही है |

हर साल हिंदी दिवस के इस कर्मकांड को देख मेरा खून खौलता है | पूछना चाहता हूँ कि इस देश में अंग्रेजी दिवस क्यों नहीं मनाया जाता है (बाकी 364 दिन अंग्रेजी दिवस ही तो हैं! ) सरकारी दफ्तरों के बाहर हिंदी पखवाड़े के बेनूर बैनर को देख चिढ़ होती है | उतर भारत में तमिल का पखवाड़ा मने, दिल्ली में हिंदी की सैकड़ो विलुप्त होती “बोलियों” का पखवाडा मने, तो समझ में आता है लेकिन अगर पचास करोड़ लोगो की भाषा को अपने ही देश में अपनी आकांक्षा को एक पखवाड़े भर में सिकोड़-समेट लेना पड़े तो लानत है ! हर बार यह सब देख के रधुवीर सहाय की कविता “हमारी हिंदी” याद आती है | सुहागिन होने की खुशफहमी तले दुहाजू की नई बीबी जैसी हमारी यह हिंदी सीलन और चीकट से घिरी है, दोयम दर्जे का जीवन जीने को अभिशप्त है |

हिंदी दिवस पसरते जाते हैं, हिंदी सिकुड़ती जाती है। आज इस देश में हिंदी भाषा अंग्रेजी की दासी , अन्य भारतीय भाषाओँ की सास और अपनी ही दर्जनों बोली या उप-भाषाओ की सौतेली माँ बन गई है | संघ लोक सेवा आयोग के सीसैट पर्चे की परीक्षा के विरुद्ध आन्दोलन ने एक बार फिर अंग्रेजी के बरक्स हिंदी की हैसियत का एहसास कराया है। चाहे प्रश्न-पत्र हो या सरकारी चिट्ठी, राज-काज की मूल प्रामाणिक भाषा अंग्रेजी है | रैपिड इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स के सर्वव्यापी विज्ञापन और कुकरमुत्ते की तरह उगते इंग्लिश मीडियम के स्कूल अंग्रेजी के साम्राज्य का डंका बजाते हैं | बॉस को खुश करने को लालायित जूनियर , मेहमान के सामने बच्चे को पेश करते माँ–बाप या प्रेमिका को पटाने की कोशिश में लगा लड़का…जहाँ–जहाँ अभिलाषा है वहां–वहां अंग्रेजी है| सत्ता का व्याकरण हिंदी में नही अंग्रेजी में प्रकट होता है | ऐसे में राज-भाषा का तमगा एक ढकोसला है !
दरअसल यह ढकोसला हिंदी के लिए अभिशाप बनता जा रहा है | हिंदी के पल्ले और कुछ तो है नहीं, बस राज भाषा होने का एक खोखला अहंकार है | इसके चलते हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच एक खाई बनी रहती है | हमारा संविधान कही”राष्ट्र-भाषा”का जिक्र नहीं करता लेकिन अपने गरूर में हिंदी वाले मान कर चलते हैं कि उनकी भाषा इस देश की राष्ट्र-भाषा है | वे हिन्दी को मकान मालिक समझते है, बाकी भाषाओं को किरायेदार | हर गैर हिंदीभाषी को स्कूल में हिंदी सीखनी पड़ती है लेकिन हिंदीभाषी दक्षिण या पूर्व भारत की एक भी भाषा नहीं सीखते। इसके चलते अन्य भारतीय भाषाओं के बोलने वालों को हिंदी से चिढ़ होती है |और तो और, आज हिंदी और उर्दू के बीच भी फांक बना दी गयी है। इस झगड़े का फायदा उठा कर अंग्रजी का राज बदस्तूर चलता रहता है |
हिंदी-दिवस का ढकोसला हमारी आँखों से खुद हिंदी की बनावट को ओझल करता है | यह इस गलतफहमी को पैदा करता है कि आकाशवाणी–दूरदर्शन की खड़ी बोली पचास करोड़ देशवासियों की मातृभाषा है | हम सब अब भोजपुरी,मगही,अवधी,मेवाती,बागड़ी,मारवाड़ी,भीली,हाड़ोती,मालवी,छत्तीगढ़ी,संथाली जैसी भाषाओ को महज बोली कहने लगे हैं | नतीजतन इन भाषाओँ में उपलब्ध सांस्कृतिक धरोहर और रचनात्मकता का भण्डार आज विलुप्त होने के कगार पर है | अंग्रेजी के बोझ तले दबी हिंदी खुद इन भाषाओँ को दबाने का औजार बन गई है |

अगर आज भी हिंदी में कुछ जान बची है तो इस राजभाषा के कारण नहीं | सरकारी भाषा-तंत्र के बाहर बम्बईया फिल्मों , क्रिकेट कमेंट्री और टीवी तथा अखबार ने हिंदी को आज भी जीवित रखा है | न जाने कितने गैर हिंदीभाषियों ने बम्बईया फिल्मो के माध्यम से हिंदी सीखी | पिछले बीस सालों में टीवी के अभूतपूर्व प्रसार ने हिंदी का अभूतपूर्व विस्तार किया | समकालीन हिंदी साहित्य किसी भी अन्य भाषा के श्रेष्टतम साहित्य से हल्का नहीं है | पिछले कुछ सालो से अंग्रेजीदां हिन्दुस्तानी भी हिंदी के कुछ जुमले बोलते वक्त झेंप महसूस नहीं करते| लेकिन इस सब का राजभाषा संवर्धन के सरकारी तंत्र से कोई लेना-देना नहीं है |
इसलिए, मै गुस्से या खीज में नहीं, ठंढे दिमाग से यह प्रस्ताव रखना चाहता हूँ कि हिंदी दिवस के सरकारी ढकोसले को बंद कर देना चाहिए |योजना आयोग की तरह राजभाषा प्रसार समितियों को भी भंग कर देना चाहिए। सरकार इस ढकोसले को बंद करना नहीं चाहेगी | अंग्रेजी वाले भी नहीं चाहेंगे | ऐसे में हिंदी के सच्चे प्रेमियों को हिदी दिवस का बहिष्कार करना चाहिए | इसके बदले 14 सितम्बर को भारतीय भाषा संकल्प दिवस के रूप में मनाना चाहिए | इस अवसर पर सभी भारतीय भाषाओँ को एक जुट हो कर अंग्रेजी भाषा के विरूद्ध नहीं बल्कि अंग्रेजी के वर्चस्व के विरूद्ध संघर्ष करने का संकल्प लेना चाहिए | लेकिन भाषा का संघर्ष केवल विरोध और बहिष्कार से नहीं हो सकता, इसमें नवनिर्माण सबसे जरूरी है|
इसका मतलब होगा कि हिंदी की पूजा-अर्चना छोड़ उसका इस्तेमाल करना शुरू करें | जैसे मिस्त्रियों ने हर कल पुर्जे के लिए अपनी हिंदी गढ़ ली है (पिलास, चिमटी, ठंढा/गर्म तार) उसी तरह हमें अर्थ-व्यवस्था, क़ानून, खगोलशास्त्र और डाक्टरी के लिए भी एक नई भाषा गढ़नी होगी | देश और दुनिया की तमाम भाषाओँ से शब्द उधार लेने होंगे, शब्द-मैत्री की नई रवायत बनानी होगी | गुलज़ार की तरह हर पौराणिक कहानी को बाल साहित्य में बदलना होगा | सुकुमार राय के ‘आबोल ताबोल’ की तर्ज पर बच्चो को हँसने – गुदगुदाने वाली कवितायेँ लिखनी होंगी | हैरी पॉटर का मुकाबला कर सकने वाला रहस्य और रोमांच से भरा किशोर साहित्य तैयार करना होगा | कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हर विषय की मानक पाठ्यपुस्तकें तैयार करनी होगी | अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान के असीम भण्डार का अनुवाद करना होगा | चीनी और जापानी की तरह हिंदी को भी इन्टरनेट की सहज – सुलभ भाषा बनाना होगा |इसके बिना अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध बेमानी है।
यह सब करने के लिए अन्य भारतीय भाषाओँ के साथ सास जैसा व्यवहार छोड़ कर सखा-भाव बनाना होगा | अंग्रेजी के वर्चस्व के खिलाफ लडाई तभी लड़ी जा सकती है जब तमाम भारतीय भाषाएँ एक जुट हो जाएँ | हिंदी संख्या के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी भाषा भले ही हो लेकिन न तो सबसे वरिष्ठ है और न ही सबसे समृद्ध | हिंदी को तमिल के प्राचीन ग्रन्थों, आधुनिक कन्नड़ साहित्य, मलयाली समाचार पत्रों, मराठी विचार-परंपरा, बांग्ला अकादमिक लेखन और उर्दू–फ़ारसी की कानूनी भाषा से सीखना होगा | अपनी ही बोलियों को मान–सम्मान दे कर मानक हिंदी के दरवाजे इन सब भाषाओं के लिए खोलने होंगे |अगर हिंदी की गरिमा हिन्द की गरिमा से जुडी है तो हिंदी को हिन्दवी की परंपरा से दुबारा जुड़ना होगा, हिन्द के भाषायी संसार का वाहक बनाना होगा।
हिंदी प्रमियों को गैर-हिंदी इलाकों में हिंदी के प्रचार–प्रसार-विस्तार की कोशिशों से बाज आना होगा | अगर वे हिंदीभाषी प्रदेशों में ही हिंदी को मान–सम्मान दिला पायें तो बहुत बड़ी बात होगी | हिंदी की वकालत का काम महात्मा गाँधी , डॉक्टर आंबेडकर, काका कालेलकर, और चक्रवर्ती राज गोपालाचारी जैसे गैर हिंदीभाषियों ने किया था | यह उन्ही को शोभा देता है |
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जनवरी 7, 2014

पंडित और डम्बलडोर

अवगाह लिए सब ग्रंथbeautifulmind-001

कंठस्थ हो गईं ऋचाएं

भौतिकी से आध्यात्म तक

ज्यामिती से इतिहास तक

अब तक मानव ने पाया था जो ज्ञान!

मस्तिष्क के तंतुओं का जाल

शरीर के ऊतकों का स्थान

पाकर यह सब ज्ञान

दिख पड़ता है कान्तिमान

गर्व से दपदपाता, जब-तब होता इस पर मान!

पर छटपटाया कई बरस

ज्ञान की पोथियों से शिथिल मन

न मिली कोई राह

ना बन सका कोई प्रवाह

तब एक दिन सहसा भरभरा कर गिरा वितान!

बात बस इतनी सी थी

फंतासी में सपने सी थी,

जब डम्बलडोर ने कहा भर

कहीं से सपने में आकर

सिर्फ फैसले हमारे, कराते हमारी पहचान!

Yugalsign1

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