Posts tagged ‘Hansna’

मई 18, 2014

पथहारा वक्तव्य… अशोक वाजपेयी

हमें पता थाashok vajpai-001

कि खाली हाथ और टूटे हथियार लिए

शिविर में लौटना होगा:

यह भी कि हम जैसे लोग

कभी जीत नहीं पाए-

वे या तो हारते हैं

या खेत रहते हैं-

हम सिर्फ बचे हुए हैं

इस शर्म से कि हमने चुप्पी नहीं साधी,

कि हमने मोर्चा सम्हालने से पहले या हारने के बाद

न तो समर्पण किया, न समझौता:

हम लड़े, हारे और बचे भर हैं!

यह कोई वीरगाथा नहीं है:

इतिहास विजय की कथाएं कहता है,

उसमें प्रतिरोध और पराजय के लिए जगह नहीं होती।

लोग हमारी मूढ़ता पर हंसते हैं-

हमेशा की तरह

वे विजेताओं के जुलूस में

उत्साह से शामिल हैं-

हम भी इस भ्रम से मुक्त होने की कोशिश में हैं

कि हमने अलग से कोई साहस दिखाया:

हम तो कविता और अंत:करण के पाले में रहे

जो आदिकाल से युद्धरत हैं, रहेंगे!

हम पथहारे हैं

पर पथ हमसे कहीं आगे जाता है।

 

[अशोक वाजपेयी)

 

साभार : जनसत्ता

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फ़रवरी 27, 2014

हर सुबह मौत मुझ पे हंसती है

हर शामyadein-001

उदासी भरी आस
दिल के दरवाजे तक

चली आती है यूँ ही
जैसे मौत इक इक कदम कर
और कुछ और करीब आती हो…
चलो आओ तुम अब तो…

के …
अब सहा नहीं  जाता…

इंतज़ार की लंबी रातों का दर्द…

बहुत दुखता है…

बहुत दुखता है…

हर शाम का तेरी यादों को रौशन करना

देहरी तकना…

फिर अँधेरे की चादर भिगोना…

बहुत दुखता है…

देह हर दम जैसे दर्द के बीज बोती है

और अपनी ही फसल के बोझ तले रोती है
आसमां की चादर  हर रोज मुझ पे…

कफ़न होती है …

हर सुबह मौत मुझ पे हंसती है

हर सुबह ज़िन्दगी मुझ को रोती है…

Rajnish sign

नवम्बर 11, 2013

यूँ ही हँसती रहो मुँह छिपाकर

dewflowerतुमने कभी देखा

ओस की बूंद को फूल पे?

एक छोटी सी बूँद …

बहुत नाज़ुक लेकिन कितनी जीवंत!

सारे रंग अपने में समेटे,

फूल के आगोश में लिपटी

‘बूँद’

रात भर सपना देखती है…

सुबह का,

सुबह के ताजगी भरे उजाले में

अपने प्रेमी फूल को देखने का…

उसे सहलाने का

बहुत क्षणिक  होता है ये मिलन

रात के लम्बे इंतज़ार के सामने

पर कितना सघन!

दो पल का स्पर्श…

पोर पोर सहलाना

फूल को दे जाता है

सबब

पूरे दिन महकने का…

खिले रहने का…

मुस्कराने का

और खुशिया बिखेरने का

गुदगुदाती है

उसे बूँद की याद दिन भर

और उसी के सहारे

सह लेता है फूल

दिन भर की तपन

मुस्कुराते…

manisha-001खिलखिलाते…

महकते…

महकाते…

मैं भी मुस्कुराता हूँ …

बेवज़ह भी…

कभी जब याद आता है

तुम्हारा मुंह छुपा के मुस्कुराना…

मेरे दिन रात

महक उठते हैं…

काश

तुझ फूल को हँसने

खिलने और महकने के लिए

मैं ही ओस की बूँद रूपी

बहाना बन जाऊं…

(रजनीश)

मार्च 17, 2013

तुम्हारी हँसी … Pablo Neruda

रोटी मुझसे ले लो,

अगर तुम चाहो तो,

हवा दूर ले जाओ,

लेकिन मुझसे

अपनी हँसी दूर मत ले जाना|

दूर मत ले जाना,

वो गुलाब,

वो लंबा, नुकीला फूल, जो तुमने तोड़ा है,

वो खुशी, जो जल के झरने की तरह

एकदम से फूट पड़ता है

वो चांदी जैसी चमक

जो अनायास जगमगा उठती है

तुम्हारे अंदर|

मेरा संघर्ष कठिन है,

और मैं वापस आता हूँ,

थकी आँखों के साथ,

और कभी-कभी बदलाव न ला पाने की निराशा के साथ

लेकिन जब तुम्हारी हँसी

देखता हूँ तो

यह मुझे अहसास कराती है

कि अभी आकाश की ऊँचाइया

बाकी हैं छू पाने को

तुम्हारी हँसी खोल देती है

जीवन में आशा के सब द्वार|

मेरे प्रिय!

जब तुम हंसती हो तो

जीवन के सबसे अंधकार भरे समय में

भी मुझे संबल मिलता है,

और यदि कभी अचानक तुम

देखो कि मेरा रक्त सडकों

को रंग रहा है,

तो तुम हंसना,

क्योंकि तुम्हारी हँसी

मुझे लड़ने के लिए वही ताजगी देगी

जैसे शस्त्रहीन हो चुके किसी सैनिक

को अचानक से एक नयी धारदार तलवार

मिल जाए|

पतझड़ में

तुम्हारी हँसी

समुद्र से लगातार आती झागदार लहरों को

ऊँचा उठा देती है,

और बसंत में बढ़ा देती है प्यार को,

मुझे तुम्हारी हँसी का इतंजार ऐसे ही रहता है

जैसे कि मैं इंतजार करता हूँ

खिलने का अपने पसंदीदा फूलों के,

नीले फूल,

यादों में बसे मेरे देश के गुलाब|

तुम हंसना रात पर,

दिन पर,

या चाँद पर,

हंसना

इस द्वीप की टेढी-मेढ़ी गलियों पर,

या इस अनगढ़ लड़के पर जो तुमसे प्रेम करता है,

पर जब में अपनी आँखें खोलूं

और बंद करूँ,

जब मैं जाऊं,

जब मैं वापस आऊँ,

मुझे भले ही

रोटी, हवा, प्रकाश,

बसंत,

मत देना,

पर कभी भी मुझे अपनी

हँसी देने से इनकार मत करना,

क्योंकि तुम्हारी हँसी के

लिए मैं मर सकता हूँ|

(Your LaughterPablo Neruda)

हिंदी अनुवाद – …[राकेश]

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