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जुलाई 28, 2011

चिंता जहर, चिंतन संजीवनी (संत सिद्धार्थ)

मित्रों, आज कुछ देर बात हो जाये चिंता पर। चिंता दीमक समान है जीवन के लिये और यह धीरे-धीरे मानव की चेतना को खाकर जीवन को पूर्णतया नष्ट कर देती है। आप गौर से अपने स्वभाव को देखना, अपने आसपास के लोगों के स्वभाव को देखना, चिंता करना धीरे-धीरे एक आदत बन जाती है।

चिंता उपजती है भय से। भय कि कल क्या होगा। चिंता उपजती है अहंकार से जन्मी निराशा से कि जीवन की बागडोर हाथ से निकल रही है… जैसे कि जगत में सब कुछ मानव की इच्छा से हो रहा है! क्या मानव हर बात को नियंत्रित कर सकता है?

आज में न जीकर, अभी न जीकर जब लोग भविष्य में जीना शुरु कर देते हैं, भूत काल के भूतों के साथ रहना शुरु कर देते हैं तब चिंता को उनके अंदर वास करने का मौका मिल जाता है। कभी किसी जानवर को चिंता करते देखा है? अगर कोई खतरा आन पड़ा है तो वे वे बस क्षण में निर्णय लेते हैं। उस खतरे के पूर्वाभास में चिंता में नहीं गले रहते।

एक और बात स्पष्ट कर लें। चिंता और चिंतन एक ही बात नहीं है। चिंता निराशाजनक है…प्राणघातक है, भय में इसका मूल छिपा होता है। चिंता ऋणात्मक भाव है। चिंता सुप्त मस्तिष्क का भाव है। चिंता ऐसे सारी ऊर्जा सोख लेती है जैसे कि बहुत से पेड़ और लतायें भू-जल सोख कर आसपास की जमीन की उर्वरा क्षमता को भी खा जाती हैं। चिंता से होकर जाने वाला रास्ता चिता की ओर ले जाता है। चिंता करने की आदत वाला व्यक्त्ति जीवन में परेशानियों का सामना नहीं करता बल्कि उनके बारे में सोचता रहता है। वह नदी किनारे बैठा रहता है कि अगर पानी में उतर गया तो गीला हो जायेगा, ठण्ड लग जायेगी, बीमार पड़ जायेगा। वह कभी नदी के उस पार नहीं जा पाता और वहाँ क्या क्या बसा है इसे देखने, जाने और समझने से वंचित ही रह जाता है। चिंता करने वाला व्यक्त्ति जीवन के बहुत सारे पहलुओं से अनभिज्ञ ही रह जाता है।

चिंतन के साथ ऐसा कोई ऋणात्मक वातावरण नहीं उपजता। चिंतन का मूल साहस में छिपा होता है। चिंतन चेतन मस्तिष्क की उपज है। कुछ परेशानी आये जीवन में तो चिंतन करने वाला व्यक्त्ति रास्ता खोजता है आगे बढ़ने का। चिंतन करने वाला व्यक्त्ति प्रबंधन करने में कुशल होता जाता है। वह जीना सीख लेता है। वह हर पल भय में नहीं जीता कि कल क्या होगा। वह अपने को तैयार करता रहता है, गुणों से भरता रहता है ताकि जीवन में किसी भी परिस्थिति में वह और उसका मस्तिष्क तत्परता से सक्रियता दिखा सके। हार-जीत, सफलता-असफलता से परे वह जीने में विश्वास करने लगता है।

ऐसा नहीं कि चिंतन करने वाला व्यक्त्ति भविष्य के प्रति उदासीन रहेगा। पर वह चिंता करने वाले की भांति भविष्य का भय वर्तमान पर लाद कर आज और अभी के पलों को नष्ट नहीं करेगा।

चिंता करते वक्त्त मस्तिष्क में बेकार के विचार ही घूमते रहते हैं। मस्तिष्क कोई भी उपयोगी विचार उत्पन्न नहीं कर पाता और चिंतित व्यक्त्ति अंत में हार मानकर बैठ जाता है कि अब उससे कुछ न हो सकेगा।

बहुत से व्यक्त्ति ऐसे भी हैं जो इसलिये चिंता को अपना लेते हैं क्योंकि उन्हे लगता है कि अगर वे चिंता न करें तो वे सक्रिय नहीं रह पायेंगे और चिंता उन्हे हमेशा कुछ न कुछ करने की ओर धकेलती है और वे वे बुरे से बुरे विचार सोचते रहते हैं और फिर चिंता की वर्तुलाकार गति में उलझे रह जाते हैं।

चिंता जीवन में जो कुछ भी अच्छा है उस सबकी ओर से व्यक्त्ति की आँखें बंद करवा देती है। धीरे-धीरे चिंता व्यक्त्ति को अवसाद, उदासी, और तनाव से भरे ऋणात्मक वातावरण में ले जाती है और वह नींद और सुख-चैन से हाथ धो बैठता है। और किस कारण यह सब? सिर्फ मस्तिष्क में ऊट-पटांग सोचते रहने के कारण। चिंता करने की आदत रखने वाला हर बात में चिंता करने की गुंजाइश खोज लेता है। वह हरेक बात से परेशान रहता है।

अगर आपके साथ भी ऐसा होता है। भले ही कभी कभी ही सही तो जागरुक होने की आवश्यकता है। चिंता को चिंतन में बदलने का प्रयास करें। समझ कर प्रयास करेंगे तो धीरे-धीरे ही सही पर आप चिंता से दूर होकर चिंतन की ओर बढ़ना शुरु कर देंगे और जीवन जीना शुरु कर देंगे।

चाहे तो इसे इस तरह से मान लें कि चिंता के साथ हर तरह की हानि आती है जीवन में और चिंतन के साथ लाभ आते हैं। कोई क्यों हानि भरा जीवन जीना चाहेगा?

जगत से भयभीत न हों। जीवन से भय न रखें। जीवन के उतार-चढ़ावों से न घबरावें। जीवन में मौसम के बदलाव से चिंतित न हों। जीवन की अनिश्चितता से भयभीत होकर जीवन में घुन न लगा लें।

जब एक घंटे का या कुछ घंटों का खेल खेलते हो तो क्या इस बात से भयभीत होकर मैदान से बाहर ही बैठे रहते हो कि हार जाओगे? या हे भगवान चोट लग जायेगी या कैसे सब कुछ होगा।

नहीं आप मैदान में उतरते हो…खेल खेलते हो और जैसी परिस्थितियाँ खेल के दौरान सामने आती हैं उसी के अनुरुप प्रदर्शन करने की कोशिश करते हो। बस यही जीवन का भी खेल है।

जैसे खेल के लिये अपने को गुणी बनाते हो, तैयार करते हो, वैसे ही जीवन में भी करने की जरुरत है।

गौर से देखना आप विचारों को रोक सकते हो, उनकी दिशा बदल सकते हो। जब तक आप रेडियो ऑन नहीं करते तब तक कोई स्टेशन नहीं लगता और यह आपके हाथ में है किस स्टेशन को आप सुनना चाहें, कहीं गीत आ रहे हैं, कही वार्ता चल रही है, कहीं नाटक चल रहा है। आप जो चाहते हो सुनते हो। मानव मस्तिष्क भी कुछ कुछ ऐसा ही है। हजारों-लाखों तरह के स्टेशन रुपी विचार तैर रहे हैं और मानव मस्तिष्क उन्हे पकड़ लेता है। अभ्यास से अपने मस्तिष्क को ऐसा बनायें कि यह उपयोगी बातें विचारने लगे।

विचार को रोकना या बदलना सीखें। जब आपको लगे कि चिंता आपको ग्रसित कर रही है। कुछ शारीरिक काम ही करने लग जायें, या कुछ भी और करें… ध्यान बँट जायेगा…विचार दूसरी ओर केंद्रित हो जायेंगे। ऊर्जा सही रुप में उपयोग होने लगेगी। धीरे-धीरे आपको विचारों पर नियंत्रण करना आ जायेगा।

ध्यान रखें हमेशा कि जीवन तो चुनौतियाँ देता रहेगा। और यह मानव को सोचना है कि वह क्या करना चाहता है नयी परिस्थितियों के साथ?

अगर जीना है तो उसे कमर कसनी होगी कि रास्ते खोजे आगे बढ़ने के और मस्तिष्क का सही प्रयोग करेगा तो रास्ते मिल ही जायेंगे।

जीवन को चिंता से दूर ले जाकर चिंतन की ओर मोड़ें। यही एकमात्र वास्तविक प्रबंधन है जीवन में।

जुलाई 20, 2011

प्रेम और इच्छा

प्रेम और इच्छा
एक ही बात नहीं हैं
वे तो बिल्कुल उल्टे हैं
एक दूसरे के।

प्रेम में इच्छा का कोई स्थान नहीं,
इच्छा लोभ है,
इच्छा लालच है
अभीप्सा है,
इच्छा
खाली ह्रदय का खेल है,
इच्छा अतृप्त ह्रदय की
प्रकृति है,
इच्छा भिक्षा मांगने की
प्रवृत्ति है,
इच्छा
केवल स्वहित देखने का
दृष्टिकोण है,
इच्छा केवल पाने भर की
तुच्छ आदत है,
इच्छा
निम्न श्रेणी का भाव है,
इच्छा करने वाला
अपने चारों ओर काँटे
बिखेरता रहता है।

प्रेम इसके विपरित
उच्चतम शिखर पर
बैठा होता है,
प्रेम की इच्छा नहीं की जाती,
प्रेम करने से नहीं होता,
प्रेम कोई प्रयास करके पाने की वस्तु नहीं है,
प्रेम में होने के लिये
अपने को तैयार किया जाता है,
अपने को शुद्ध किया जाता है,
अनुकूल वातावारण देख ही
प्रेम जीवन में उतरता है,
प्रेम में होने के बाद ही,
प्रेममयी ह्र्दय
लबालब भर जाता है
आनंद और देने का भाव
दोनों अंदर जीवित हो जाते हैं
प्रेम में होने वाला
अपने चारों ओर
फूल खिलाता है
सुगंध बिखेरता है।

इच्छा और प्रेम का क्या मेल?
इच्छा दर्पण पर जमी धूल है
यह वासनामयी है।
इच्छा देती प्रतीत तो होती है
पर यह वास्तव में
मानव जीवन से बहुत कुछ ले लेती है।

प्रेम
स्वच्छतम दर्पण है,
जिस पर धूल नहीं जमा करती,
जिसकी चमक कभी कम नहीं हुआ करती,
देना प्रेम का स्वभाव है।

इच्छा को पीछे छुपा कर
प्रेम के बहाने से इसकी पूर्ति
कभी प्रेम के वास्तविक स्वरुप
तक नहीं ले जा सकती,
ऐसा प्रेम अभिनय है,
नकली है,
ढ़कोसला है,
मानव की इसी कुत्सित लुपाछिपी के कारण
इच्छा का घालमेल प्रेम से कराकर
प्रेम को भ्रमित बना दिया गया है,
इसके नकली स्वरुप को असली मानकर और बनाकर
इसे इसके शिखर से नीचे गिरा दिया गया है।

…[राकेश]

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