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मई 22, 2016

मीना कुमारी …(गुलज़ार)

GulzarMeenaKumari-001शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लमहा-लमहा खोल रही है
पत्ता-पत्ता बीन रही है
एक-एक साँस बजाकर सुनती है सौदायन
एक-एक साँस को खोल के, अपने तन
पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की क़ैदी
रेशम की यह शायर इक दिन
अपने ही तागों में घुटकर मर जाएगी।
(गुलज़ार)

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नवम्बर 24, 2013

अंतस के परिजन: एक डॉक्टर की डायरी

antasमनुष्य जीवित है तो उसका साथ शारीरिक और मानसिक कष्टों और रोगों से होता ही रहेगा और ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सिक से दूरी तो रह नहीं सकती| किसी भी विधा में अभ्यास करता हो चिकित्सिक, चाहे वह वैध हो, हकीम हो, एलोपेथिक डॉक्टर हो या होमियोपैथी से इलाज करता हो, वह हर काल में समाज का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है|

जीने से मनुष्य का अगाध मोह है और एक ही नहीं हजारों भगवद गीता रच दी जाएँ, सामूहिक स्तर पर  मनुष्य जीवन से इस मोह को मिटाना संभव नहीं है और लाखों-करोड़ों में से कोई एक ही जीवन और शरीर के मोह से ऊपर उठ पाता है| जीने के प्रति इस गहरे भाव के कारण ही मनुष्य के लिए चिकित्सक ईश्वर का ही प्रतिनिधित्व करता है| वही है जो उसे मौत के मुँह में से भी खींच लाता है और उसकी काया से रोगों को दूर भगाने में उसकी सहायता करता है उसका पथ –प्रदर्शक बनता है| इस आदर के कारण मानव की चिकित्सिक से अपेक्षायें भी बहुत ज्यादा होती हैं| बीमारी की हालत में चिकित्सिक के वरदहस्त में पहुँचते ही रोगी को आशा बांधने लगती है कि अब शायद वह अच्छा हो जायेगा और फिर से जीवन की ओर वापस करेगा|

असल जीवन में नर्स बोलते ही मानव के मन मस्तिष्क में Florence Nightingale नाम तैरने लगता है| डा. कोटनिस एक त्यागमयी चिकित्सिक के रूप में मनुष्य को देवता स्वरूप लगते आए हैं|

साहित्य, नाटक और फ़िल्में जैसी विधाएं भी चिकित्सक के विभिन्न चरित्रों को मानव के सम्मुख प्रस्तुत करती रही हैं, उनमें से कुछ ऐसे चरित्र हैं जिनकी अच्छाइयों के कारण वे दर्शक के मनमानस में गहरे जाकर बैठ जाते हैं|

कौन भूल सकता है आनंद फिल्म के डा. भास्कर बनर्जी, जिसे अमिताभ बच्चन ने अपने बेहद अच्छे अभिनय से जीवंत किया था, को जो अपने पास आने वाले रोगियों को कभी भी गलत सलाह नहीं देता और चिकित्सीय पेशे की ईमानदारी उसके लिए खुद की कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि उसी के साथी लोगों से छल करके धनी बनते रहते हैं वह ईमानदारी का दामन पकडे रखता है| खामोशी फिल्म की नर्स राधा (वहीदा रहमान) को क्या भुलाया जा सकता है जो अपने को नर्स होने के दायित्व के प्रति इस कदर समर्पित कर देती है कि मानसिक संतुलन खो बैठती है|

भारत जैसे विकासशील देश में तो चिकित्सक वाकई ईश्वर का ही एक रूप लगता है| लोगों की भावनाएं किस तरह चिकित्सक से जुडी रहती है इसके लिए कुछ वर्ष पूर्व प्रदर्शित हुयी हिंदी फिल्म- मुन्नाभाई एम्.बी.बी.एस, याद की जा सकती है| एक महाबली, पर सह्रदय गुंडे की भावनाओं से जनता की भावनाओं का मेल ज्यादा गहरे स्तर पर होता है न कि एक कठोर ह्रदय विशेषज्ञ डॉक्टर के अनुशासन से| धोखे से मेडिकल कालेज में प्रवेश लेकर पढ़ रहे गुंडे के वचन और दयालू कर्म जनता के अंतर्मन को भिगो देते हैं और बहुत पढ़ा लिखा, बहुत बड़ा डॉक्टर जो मेडिकल कालेज का प्रिंसिपल भी है खलनायक लगने लगता है क्योंकि उसके पास भावना नाम के चीज है ही नहीं| रोगी इंसान है ही नहीं उसके लिए|

मनुष्य जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह चिकित्सा के क्षेत्र में भी अच्छे और बुरे दोनों किस्म के व्यक्ति मिलते हैं पर मनुष्य की चिकित्सक पर निर्भरता कुछ इस कदर गहरी है कि चिकित्सा के क्षेत्र में हम सिर्फ और सिर्फ अच्छे मनुष्यों को ही देखना चाहते हैं| प्रेमचंद की कहानी “मंत्र” का डा. चड्ढा, घमंडी और रोगी के प्रति असंवेदनशीलता से भरा हुआ होने के कारण एक खलनायक है और जब मन्त्रों से सर्पदंश का इलाज करने वाला, डा. चड्ढा की असंवेदनशीलता और दुर्व्यवहार का शिकार होकर अपने इकलौते पुत्र को खोने वाला, बूढ़ा भगत, डा. चड्ढा के पुत्र को मौत के मुँह से निकाल लाता है और डा. चड्ढा भोर की हल्की रोशनी में बूढ़े भगत को पहचान कर शर्मिन्दा होते हैं तो जीवन में केवल अच्छे चिकित्सकों से ही मिलने की आस लगाए पाठक ही नहीं विजेता महसूस करते बल्कि पूरी मानवता जीतती हुयी प्रतीत होती है|

जीवन के अन्य क्षेत्रों की भांति भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में भी ईमानदारी और मूल्यों का बहुत बड़ी मात्रा में ह्रास हुआ है| ऐसे ऐसे किस्से मिल जाते हैं पढ़ने-देखने को जहां पैसे के लिए चिकित्सिक ने अपने व्यवसाय में उतरने से पहले ली गयी कसम को तो भुलाया ही मानवता को भी भुला दिया और अपनी आँखों के सामने मरीज को मर जाने दिया पर उसका इलाज करना शुरू न किया क्योंकि मरीज के परिवार वाले उसकी फीस भरने में असमर्थ थे| ऐसे भी मामले प्रकाश में आए हैं जहां चिकित्सिक मरीज के शरीर से अंग निकाल लिए हैं किसी और धनी मरीज को जीवनदान देने के लिए और गरीब मरीज गरीबी का शाप भोगने को विवश रहकर विकलांग जीवन जीने को भी विवश हो जाता है|

हालत ऐसी हो गयी है कि बीस-बीस साल के अनुभव के बाद भी चिकित्सक कहते पाए जा सकते हैं कि उन्होंने नई “दुकान” खोली है|

दुकान!

क्लीनिक और डिस्पेंसरी अब अनुभवी चिकित्सकों तक के लिए भी दुकान बन गये हैं|

साहित्य ने मरीजों की तरफ से लिखी गयी सामग्री प्रस्तुत की है, अगर साहित्यकार खुद मरीज बन गया है तो उसने अपने व्यक्तिगत अनुभव से अच्छा साहित्य दुनिया को दिया है| रशियन

Aleksandr Solzhenitsyn ने Cancer Ward जैसे कालजयी उपन्यास की भेंट दुनिया को दी| लेखकों ने दूर से देखे या पूर्णतया कल्पित चिकित्सक चरित्रों की रचना भी की है और उनमें से बहुत से विश्वसनीय भी लगते हैं| पर तब भी उन्होंने चरित्र के उन्ही भागों का वर्णन किया है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित है और उनके व्यवसाय से सतही सामग्री ही सामने आती रही है| ऐसे में ऐसा तो लगता ही है कि अगर किसी चिकित्सक में लेखकीय गुण भी हों तो उसका लेखन बेहद विश्वसनीय तरीके से इस क्षेत्र का गहराई से वर्णन कर पायेगा|

डा. भवान महाजन की स्व:अर्जित अनुभवों से सम्पन्न मराठी पुस्तक – मैत्र-जिवाचे, उस ओर एक कदम है|

अशोक बिंदल, जो अपनी तरह के एक अलग ही कला -दीवाने, कवि एवं लेखक हैं, ने मराठी मूल की पुस्तक को हिंदी में इस तरह प्रस्तुत किया है कि “अंतस के परिजन” कहीं से भी अनुवादित किताब होने का आभास नहीं देती|

मरीज, उनके नाते-रिश्तेदार, चिकित्सक का त्रिकोण रोगी और चिकित्सा के हर मामले से सम्बंधित पाया जाता है और “अंतस के परिजनतीनों प्रकार के चरित्रों को पाठक के सम्मुख लाती है|

एक उम्र होती है जब पाठक हर किस्म की पुस्तक पढ़ने के लिए लालायित रहता है क्योंकि उसमें नये से नया पढ़ने की भूख होती है और उतना पढ़ने की ऊर्जा और समय भी| उम्र के साथ पाठक चुनींदा साहित्य ही पढ़ने लग जाते हैं क्योंकि समय अन्य कामों में भी लगने लगता है, ऊर्जा में कमतरी होने लगती है| ऐसे में जब तक कोई बहुत ही किसी पुस्तक की चर्चा न करे, ऐसा संदेह रहता है कि हर पाठक हर किस्म की पुस्तक अपने आप पढ़ ही लेगा|

“अंतस के परिजन की चर्चा किसी तक न पहुंचे तो ऐसा नहीं कि पाठक दरिद्र रह जाएगा पर अगर वह इसे पढ़ ले तो जीवन में सवेदनशीलता के थोड़ा और नजदीक आएगा|

हरेक व्यक्ति कभी न कभी या तो स्वयं बीमार पड़ता है या किसी नजदीकी व्यक्ति की तीमारदारी करता है और इस नाते उसका पाला चिकित्सक से पड़ता ही पड़ता है और लगभग हरेक व्यक्ति को चिकित्सक से मुठभेड़ का कोई न कोई अनुभव जरुर ही होता है| अब यह अनुभव खट्टा भी हो सकता है, मीठा भी और कड़वा भी|

“अंतस के परिजन सब तरह के अनुभवों को समेटती है|

ये डा. भवान महाजन के चिकित्सीय जीवन के संस्मरण हैं जहां देहात के इलाकों में वे भिन्न-भिन्न किस्म के मरीजों से मिले, उनके नाते-रिश्तेदारों से मिले अलग अलग किस्म के रोगों से सीमित साधनों के बावजूद जूझे|

एक सरल, और सहज भाषा में अशोक बिंदल ने डा. महाजन के संस्मरण हिंदी में प्रस्तुत किये हैं| डा. महाजन ने न केवल मोती-माणिक सरीखे मरीजों का वर्णन किया है जिनसे मिलकर कोई भी अंदर से अच्छा महसूस करेगा बल्कि ऐसे मरीजों और उनके रिश्तेदारों का भी वर्णन किया है जो किसी भी चिकित्सक को भलमनसाहत का रास्ता छोड़ देने पर विवश कर दें| ऐसे चिकित्सक भी इस पुस्तक में हैं जो चिकित्सा के क्षेत्र की दैवीय छवि को दीमक की तरह से नष्ट कर रहे हैं और जो इस बात का लिहाज भी नहीं करते कि उनका मरीज उनके ही हमपेशा चिकित्सक का करीबी है| वे प्रेमचंद द्वारा रचित डा चड्ढा के आधुनिक अवतार ही लगते हैं, जिनके लिए उनके सुख और ऐश्वर्य मरीज के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाते हैं|

पुस्तक में शामिल संस्मरण पाठक को अंदर तक छू जाते हैं|

ऐसी पुस्तक को कम से कम छोटे परदे पर एक धारावाहिक के रूप में जरुर अवतरित होना चाहिए|

पुस्तक के बारे में अधिक जानकारी यहाँ प्राप्त की जा सकती है|

एक संस्मरण भोर को यहाँ पढ़ा जा सकता है|

अंतस के परिजन” के बारे में कुछ लेखों एवं कवियों के वचन|

गुलज़ार लिखते हैं –

अशोक बिन्दल ने कमाल किया। पढ़ कर ये नहीं लगता कि ये किसी और का अनुभव है जो वो अपनी ज़बान में बता रहे हैं।

विश्वनाथ सचदेव कहते हैं |

अनुवाद सृजन से कम महत्वपूर्ण और कम मुश्किल नहीं होता | पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे अशोक बिंदल ने काम बड़ी आसानी से किया है | मराठी में इस पुस्तक की काफी प्रशंसा हुई है | मुझे विश्वास है हिंदी-जगत में ही वैसा ही स्नेह सम्मान मिलेगा…

बालकवि बैरागी लिखते हैं|

‘अंतस के परिजन’ मैं पढ़ गया | अच्छे संस्मरण यदि ऐसी सलिल भाषा में मिल जाएं तो मन भीग ही जाता है | डा. श्री भवान महाजन ने अशोक बिंदल के माध्यम से प्रभावित किया…

कवि नईम लिखते हैं|

अंतस के कई परिजनों ने रुला दिया | उनसे एक उनसियत हो गई जैसी डा. भवान महाजन को उनसे थी | लेखक की आत्मीयता के ये पात्र हैं बल्कि लेखक इतना आत्मीय अंतस का नहीं होता, तो इन्हें पुनर्जीवित नहीं कर सकता था| कमोबेश उसी भावावेश में हिचकोले खाते हुए अशोक ने भावानुवाद किया है…..

…[राकेश]

मई 30, 2010

गुलजार साब ने चेतन भगत को सीख दी

लेखक चेतन भगत को वर्तमान समय के उन भाग्यशाली सितारों में गिना जा सकता है जिन्हे कला के क्षेत्र में उनकी योग्यता से कहीं ज्यादा सफलता मिल जाती है। फिल्मी दुनिया में ऐसा हमेशा से होता रहा है परन्तु गाहे बेगाहे लेखन की दुनिया में भी ऐसा देखने को मिल जाता है। उनके लेखन पर फिल्मों का असर बहुत ज्यादा है और वे इसी विचारधारा के साथ लिखते भी दिखाई देते हैं कि उनके लिखे हुये पर फिल्म बनेगी। अपने लिखे में विजुअल्स के तत्व का मुलम्मा चढ़ाने में कोई बुराई नहीं है। पर वे ऐसा कतई नहीं लिखते या अब तक ऐसा कतई नहीं लिख पाये हैं जिससे कि उन्हे मिली केवल आर्थिक सफलता और प्रसिद्धि के आधार पर ही अच्छे लेखकों और कवियों की जमात में शामिल कर लिया जाये।

ऊँट कभी कभी पहाड़ के नीचे आ भी/ही जाता है और ऐसा ही चेतन के साथ हो गया। आजकल कुछ भी कहीं भी कभी भी बोलने का फैशन हो गया है और चेतन को तो शशि थरुर जैसे लेखकों की संगत में भी देखा जा सकता है सो उन्हे इस बात की गलतफहमी हो जाना स्वाभाविक है कि वे विद्वान भी उच्च कोटि के हैं और अब वे कुछ भी कहीं भी और कभी भी कह सकते हैं और दुनिया उन्हे मौन होकर सुनेगी।

चेतन की प्रसिद्धि के कारण उन्हे आजकल कई कार्यक्रमों में देखा जाने लगा है। इस बार गलती से वे गुलजार साब को छेड़ बैठे। एक कार्यक्रम में चेतन गुलजार साब के बारे में बोलते हुये  कह गये,” मुझे गुलजार साब द्वारा लिखा गया गाना कजरारे कजरारे बहुत पसंद है, क्या पोएट्री है उसमें“।

उन्होने तो यह ऐसा दिखाने के लिये किया होगा कि वे पोएट्री की समझ रखते हैं या आजकल जैसा कि लोग एक दूसरे की तारीफ करके सम्बंध मधुर बनाने के प्रयत्न में लगे रहते हैं और सोचते हैं कि ऐसा करके वे अपने लेखन आदि की स्वीकृति भी सबसे ले लेंगे, ऐसा ही कुछ उन्होने भी किया होगा। उन्होने सोचा होगा कि शशि थरुर आदि लेखकों को जीतने के बाद अब वे गुलजार साब के किले में भी प्रवेश कर सकते हैं। परन्तु उनका मिठास भरा प्रयास गुलजार साब को हत्थे से उखाड़ गया और नाराज होकर उन्होने माइक्रोफोन मांगा और उसी समय कहा,”चेतन मुझे खुशी है कि आपके जैसे लेखक को गाना पसंद आया पर मुझे नहीं लगता कि उसमें उपस्थित कवित्त भाव को आप समझ पाये हैं जैसा कि आप यहाँ सबके सामने दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं। पर अगर आप जोर देंगे तो मैं आपको उस गाने की दो पक्त्तियाँ सुनाता हूँ और आप मुझे उनका मतलब बता दें“।

तेरी बातों में किमाम की खुशबू है
तेरा आना भी गरमियों की लू है
“।

चेतन हक्के बक्के रह गये गुलजार साब की ऐसी स्पष्टवादिता का स्वाद चखकर। गुलजार साब ने आगे उनसे अनुरोध किया।
कृपया उसके बारे में बोलें जिसके बारे में आपको जानकारी है। जिस बात के बारे में आपको जानकारी नहीं है उसके बारे में बोलने का प्रयत्न न करें“।

आजकल हर बात मैनेजमेंट के अंतर्गत मानी जानी लगी है और ऐसा माना जाने लगा है कि सब चलता है और सब कुछ अपने प्रबंधन से मैनेज किया जा सकता है और कला का क्षेत्र भी इस बीमारी से अछूता नहीं रह पाया है।

आधी अधूरी जानकारी और कला के क्षेत्र में थोड़ी बहुत दखलअंदाजी के बलबूते लोग दुनिया इस आधार पर फ़तेह करने निकल पड़े हैं कि वे अपनी व्यवहारकुशलता और सामने वाले की तारीफ करके सब सम्भाल लेंगे।

ऐसा भी संभव है कि ज्यादातर लोग गुलजार साब को ही दोषी ठहरायें और कहें कि कि ऐसे चेतन भगत को टोका जाना गलत था पर उनका भड़क जाना एक सूक्ष्म किस्म के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक प्रयास है

कोई दो तीन साल पहले लेखक निर्देशक अनुराग कश्यप ने अपने एक ब्लॉग में गुलजार साब से जुड़ी एक रोचक घटना का जिक्र किया था।

सत्या बनाये जाते समय निर्देशक राम गोपाल वर्मा और उनकी टीम, जिसमें अनुराग कश्यप और सौरभ शुक्ला आदि भी शामिल थे, ने महसूस किया कि गुलजार साब द्वारा लिखे गये एक गाने के दो प्रकारों में से पहले वाला ज्यादा उपयुक्त्त लगता है।

गुलजार साब ने पहले लिखा था “ग़म के नीचे बम लगा के ग़म उड़ा दे” और बाद में उन्हे लगा कि “गोली मार भेजे में” ज्यादा अच्छा है।

तय किया गया कि अनुराग ही गुलज़ार साब को यह बताने की जहमत उठायेंगें कि “ग़म के नीचे बम” वाला गीत ज्यादा अच्छा है।

अपनी नादानी में जैसे ही अनुराग ने कहा कि ” सर गम काम नहीं करता “ गुलजार साब ने उन्हे टोक दिया,” बरखुरदार पहले ग़म को ढ़ंग से बोलना तो सीख लो“।

अनुराग लिखते हैं कि बस मैं तो विचार विमर्श से एकदम बाहर ही हो गया उसके बाद। वे आगे लिखते हैं,” शुक्र है भगवान का कि उन्होने गोली मार भेजे वाले संस्करण पर जोर दिया। क्या गाना बना था वो“।

आशा है अनुराग कश्यप की तरह चेतन भी इस घटना को इसके सही परिपेक्षय में लेंगे और इसे अपनी मानहानि का मुद्दा न बना कर इससे कुछ सीखने की कोशिश करेंगे।

डिस्क्लेमर : गुलजार साब और चेतन भगत वाले मामले को छ्पी रिपोर्टस के आधार पर कोट किया गया है।

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