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अक्टूबर 29, 2010

गुल्लू बाबू और स्विस बैंक में भारत का काला धन

गुल्लू बाबू अभी चौदह साल के हैं। उम्र की यह दहलीज बड़ी रोचक स्थितियाँ रचती है। बचपन तो चला जाता है इस उम्र के आने तक पर अभी किशोरवस्था जवानी की तरफ पूरी तरह से जा नहीं पाती और किशोर हार्मोंस की उठापठक के बीच जाने अन्जाने अहसासों से रुबरु होने लगते हैं। कुछ लड़कों की आवाज भर्राने लगती है तो वे थोड़े चुप हो जाते हैं और कुछ आवाज के इस परिवर्तन से या तो समझौता करके या लड़ाई करके हद दर्जे के लफ्फाज हो जाते हैं। गुल्लू बाबू दूसरी श्रेणी में आते हैं। दो-चार उनके यार दोस्त भी हैं ऐसे ही और ये लोग जहाँ भी इकट्ठे होते हैं वहीं मेले जैसा शोर-शराबा और माहौल रच देते हैं। इंटरनेट की कृपा से दुनिया भर के विषयों की जानकारी इन महानुभावों को हो गयी है और सार्थक या अनर्गल, किसी भी तरह की बहस में घिरे हुये गुल्लू बाबू और उनके गैंग को पाया जा सकता है। कभी कभी उनकी बहस खासा मनोरंजन भी उत्पन्न कर देती है।

बीते रविवार को गुल्लू एंड पार्टी नयी प्रदर्शित हुयी फिल्म Knock Out देख कर आये थे और उनकी बहस केन्द्रित हो गयी थी कथित रुप से स्विस बैंकों में रखे भारत के काले धन पर।

बहस तो उनकी लम्बी थी पर कुछ मुख्य और रोचक बातों का जिक्र किया जा सकता है। किशोर दिमाग बड़े रोचक तरीके से सोच सकते हैं और बहुत दफा अनुभवी और पके हुये दिमागों के लिये अलग ढ़ंग से सोच पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन हो जाता है।

सबसे बड़ी बात है कि भारत की किशोर पीढ़ी के बहुत सारे नुमांइदे कितने ही गम्भीर मुद्दों पर बहस करने को तैयार दिखते हैं। उनके पास सूचनाओं का भंडार है और वे आत्मविश्वास से लबरेज़ दिखते हैं।

उनकी बहस के कुछ अंश…

अरे इतना हल्ला होता रहता है भारत के काले धन और स्विस बैंको का और फिल्म ने भी दिखाया कैसे एक नेता हजारों करोड़ रुपये स्विस बैंक में जमा करता है। पर ये बात समझ में नहीं आयी कि स्विस बैंक किस करेंसी में धन जमा करके रखते हैं अपने लॉकर्स में?

क्या फर्क पड़ता है किसी भी करेंसी में रखें?

फर्क कैसे नहीं पड़ता, कोई बताओ, पौंड, डॉलर, यूरो या स्विस फ्रेंक, किस मुद्रा में पैसा रखा जाता है वहाँ?

चलो मान लो कि अमेरिकन डॉलर के रुप में रखा जाता है, पर इस बात से क्या फर्क पड़ता है?

ओ.के. मान लिया अमेरिकन डॉलर… पर अब सवाल उठता है, जैसा कि कहा जा रहा है कि भारत का ही लाखों करोड़ रुपया वहाँ जमा है। और भी देश हैं जिनका काला धन वहाँ जमा है तो क्या अमेरिका इतने विशाल धन के लिये अलग से करेंसी नोटों की व्यवस्था करता है?

अरे ये बात तो सही है- कौन सा देश इतने सारे करेंसी नोट अलग से छापता होगा स्विस बैंक के लिये?

ये भी तो हो सकता है कि धन वहाँ सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात आदि वैकल्पिक मुद्राओं के रुप में रखा जाता है।

हो सकता है पर इतने सारे लोग स्विस बैंक और काले धन के बारे में सालों से चर्चा कर रहे हैं और हमें यह भी पढ़ने को नहीं मिला कि कौन सी करेंसी वहाँ चलती है?

एक और मुद्दा है कि क्या स्विस बैंक इस धन पर ब्याज भी देते हैं जैसे कि अन्य बैंक या वे अपने यहाँ धन रखने के लिये फीस लेते हैं?

ब्याज कहाँ से देंगे, रखने के बदले पैसा लेते होंगे आखिरकार तभी बैंक इतने अमीर हैं। करोड़ों डॉलर्स की जमापूँजी पर ब्याज देने के लिये तो उन्हे बहुत सारा धन कमाना भी पड़ेगा, कहाँ से लायेंगे इतना पैसा और उनकी गतिविधियाँ तो गुप्त रहती हैं, ओपन मार्केट में तो क्या ही लगाते होंगे पैसा?

कहीं पढ़ा था कि अमेरिका 9/11 के बाद डर गया था कि कहीं ओसामा लादेन स्विस बैंकों जैसे गुप्त खाता खोलने वाले बैंको में धन जमा न कर ले।

मेरी समझ में नहीं आता कि ओसामा चाहे अरबों डॉलर्स जमा कर ले पर हथियार तो वह कहीं से खरीदता ही होगा।

सही बात है, हथियार ओसामा लादेन जैसे आतंकवादी खुद तो बना नहीं सकते। अमेरिका, रुस, फ्रांस, ब्रिटेन, इज़रायल, चीन, कोरिया, और जापान, जैसे बड़े और विकसित देश और पाकिस्तान जैसे लड़ाकू देश हथियार बेचने का धंधा दुनिया में चलाना बंद कर दें तो ओसामा का सारा धन रखा रह जायेगा।

तब तो ओसामा जैसे किसी देश में उस धन से कैसिनो या पब चलाकर जीविका कमाने के लिये विवश हो जायेंगे और चुपचाप जीवन जियेंगे। हथियार तो उन्हे यही शक्तिशाली देश ही देते हैं।

हाँ ऐसा पढ़ा था कि अमेरिका स्विस बैंकों पर प्रैशर डाल रहा है और वहाँ जमा अमेरिकी धन पर कब्जा करने के मूड में है।

पर खाली धन से तो आतंकवाद फैल नहीं सकता। खाली धन तो किसी भी काम का नहीं होता। अगर दुनिया में विनाश फैलाने वाले हथियार ही नहीं होंगे तो आतंकवादी क्या कर लेंगे। आमने सामने की कुश्ती में तो हरेक देश की जनता ही पीट पीट कर भुर्ता बना देगी इन आतंकवादियों का।

सही बात है अगर अमेरिका जैसे देश ठान लें तो आतंकवाद का नामोनिशान न रहे दुनिया में।

हथियार की बिक्री बंद कर दो जैसे कि कोई भी देश परमाणु हथियार नहीं खरीद सकता या बना नहीं सकता ऐसे ही सारे मारक हथियारों पर यू.एन से रोक लगवा दो। जो भी देश इस बात का उल्लंघन करे उसका पूरी तरह से बॉयकाट कर दे सारे देश। एक महीने में ठीक हो जायेगा बदमाशी करने वाला देश। जब कोई भी देश न कुछ खरीदेगा कोई भी चीज उस देश से न ही उसे कुछ बेचेगा तो वहाँ की जनता अपने आप अपनी सरकार पर दबाव डालेगी।

सही बात है, सब दिखावा होता है वर्ल्ड पॉलिटिक्स में। सब नाटकबाजी है।

और क्या, अगर यू.एन, अमेरिका, भारत और तमाम बड़े देश चाहते तो चीन, तिब्बत को आजद न कर देता। दुनिया भर की मैनूफैक्चरिंग इंडस्ट्री चीन में लगी हुयी हैं और अगर सारे प्रभावशाली देश चीन पर प्रैशर डाल देते या हर देश की जनता ही ऐसी घोषणा कर देती कि न तो चीनी सामान खरीदेंगे न ही किसी चीनी को कुछ बेचेंगे तो एक महीने में चीन की जनता अपने नेताओं और सेना वालों को पीट पीट कर विवश कर देती तिब्बत को आजाद करने के लिये।

सही है, इतना ज्यादा व्यापार देशों का आपस में होता है कि अगर किसी सही बात के लिये सब शक्तिशाली देश ठान लें तो उसे पूरा करने में आज के दौर में बहुत समय नहीं लग सकता।

सब ड्रामा चलता है। किसी को भी तिब्बत की आजादी से कुछ मतलब है नहीं। हम भारतीय ही कौन सा चीन को नाराज करना चाहते हैं। चीन के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते हैं हमारे नेता, सेना वाले और उधोगपति लोग। अगर भारत की जनता ही ठान ले कि चीनी सामान का बहिष्कार करेगी तो भी बड़ा फर्क पड़ेगा चीन की दादागिरी पर।

जनता तो सस्ते पर जाती है और चीनी सामान सबसे सस्ता है। कैसे बहिष्कार करेगी भारत की जनता चीनी सामान का?

चलो हम तुम ही बहिष्कार कर दें चीनी सामान का।

तिब्बत छोड़ो, हमारे तुम्हारे चार लोगों के करने से क्या होगा? अगर जाकर देखोगे तो प्रधानमंत्री के दफ्तर में भी मेड इन चाइना सील वाला सामान लगा हुया होगा।

आज चार हैं बाद में बढ़ भी जायेंगे। शुरुआत तो करनी चाहिये।

चलो फिर आज से ही चीनी सामान पर पाबंदी। स्कूल में कल से ही प्रचार शुरु।

स्विस बैंक से कहाँ भटक गये तुम लोग? स्विस बैंक में जमा कालाधन भारत के लिये बहुत महत्वपूर्ण विषय है।

कहते हैं कि भारत का इतना धन वहाँ जमा है कि अगर सारा वापस आ जाये तो भारत का सारा विदेशी कर्ज चुकता हो जाये और तब भी बहुत सारा धन बचा रहेगा।

गजब के करप्ट रहे होंगे भारत के नेता और बाकी दलाल किस्म के लोग जिन्होने वहाँ लाखों करोड़ रुपया जमा करा दिया।

मैं ने भी पढ़ा था कहीं इंटरनेट पर कि काला धन वापस लाने से भारत ऊर्जा के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर हो जायेगा।

अरे कैसी वाहियात बात कर रहे हो, धन लाने से कैसे भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जायेगा?

ये भी न ऐसी ऐसी दूर की कौड़ी सामने लाता है। अरे भाई, क्या खाली धन भारत में ऊर्जा के लिये वैज्ञानिक शोध को टॉप गियर में डाल देगा। वैज्ञानिक रातों रात कुछ खोज देंगे क्या?

मेरे भइया एक दिन बता रहे थे कि ज्यादातर तो बाहर की रिसर्च को देख कर ही भारत में रिसर्च होती है। 95% लोगों की कोशिश यही होती है कि किसी तरह से रिसर्च पेपर छप जाये किसी बाहर से छपने वाले जर्नल में। अब उनकी रिसर्च देश के काम आनी है या नहीं इस बात से उन्हे कोई मतलब नहीं होता। सी.वी पर पेपर्स की संख्या बढ़ाते रहते हैं। भइया के एक दोस्त तो कह रहे थे कि बड़े नामी इंस्टीट्यूशन्स के भी यही हाल हैं।

सही बात है, इतने तीरंदाज होते भारत के वैज्ञानिक तो आज देश में न पोल्यूशन इतना न होता और न ही ऊर्जा के क्षेत्र में देश इतना कमजोर होता। पानी साफ करने तक की टैक्नोलॉजी है नहीं अपने देश के पास। देश के काम आने वाली टैक्निक डेवेलप की होतीं अगर हमारे साइंटिस्टों ने तो आज देश की तस्वीर ही और होती, किसान और गरीब आत्महत्यायें न कर रहे होते।

किसी को पी.आई.एल करनी चाहिये या फिर आर.टी.आई पोलिसी के अंदर जाँच करवानी चाहिये देश की सभी शिक्षण और शोध संस्थानों के पिछले साठ सालों के क्रियाकलापों के सही मूल्यांकन के लिये। तभी दूध का दूध और पानी का पाने हो पायेगा। आखिर जनता का ही पैसा तो है जो खर्च होता है।

तुम लोग फिर भटक गये। स्विस बैंक से वापस मिले धन से विकसित देशों से तकनीक खरीदी जा सकती हैं। कितना इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा जा सकता है, कितना नया खड़ा किया जा सकता है। देश एकदम धनी हो जायेगा।

जितने काम पैसे से हो सकते हैं उतने तो हो जायेंगे पर विकसित होने की मानसिकता तो नहीं आ जायेगी रातोंरात। अगर कोई रॉ-मेटीरियल नहीं है हमारे देश के पास या कोई तकनीक नहीं हैं तब पैसे उसे विकसित तो नहीं कर देंगे। उसके लिये तो क्षमता विकसित करनी पड़ेगी और उसके लिये टाइम, लगन और बुद्धि चाहिये।

सही बात है, सब कुछ सिर्फ पैसे से नहीं हो जायेगा। बुद्धि और देश के प्रति निष्ठा की जरुरत है। पर देश को नियंत्रण करने वाले नेता, इंडस्ट्रियेलिस्ट्स और बड़े लोग जब देश हित में निर्णय लेंगे तभी ऐसा हो सकता है। वे तो देश के रिसोर्सेज के खनन करने का ठेक भी विदेशी कमपनियों को दे रहे हैं। भला कौन सी ऐसी कम्पनी है दुनिया की जो अपना हित छोड़कर भारत का हित देखेगी?

हाँ उन्हे हमारे एनवारयन्मेंट से क्या मतलब, चाहे यहाँ सूखा पड़े या बाढ़ आये, उन्हे तो रॉ-मेटीरियल चाहिये और प्रोफिट चाहिये, वो उन्हे हमारे यहाँ के भ्रष्ट नेता और कर्मचारी दिलवा ही देंगे

उनकी बातों का सिलसिला लम्बा खिंचा पर बहस का बाकी हिस्सा किसी और दिन। क्या पता उससे पहले ही गुल्लू और मित्र लोग किसी अन्य मुद्दे पर इससे भी रोचक बहस छेड़ दें।

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