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दिसम्बर 15, 2013

कौन समझेगा तेरे सिवा?

इस घर की हरेक दीवार पे home-001

तेरी ही उँगलियों के निशां चस्पा हैं

हरेक ईंट में सिहरन है अभी भी

तेरे छूने की…

तेरी ही रिहायश से मकां घर हुआ

दिल तो वैसे मेरा

कुछ क़तरा खूँ ‘औ

कुछ वज़न ग़ोश्त

ही ठहरा

तेरे रहने फकत ने इसे इस काबिल किया

कायनात समेटे फिरता हूँ मैं

कई तूफ़ान

कई समंदर

कई साहिल

बस एक तेरे रहने से

कौन समझेगा तेरे सिवा?

Rajnish sign

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