Posts tagged ‘Goonj’

अप्रैल 30, 2013

प्रेम में आकाश

जब हम नहीं करते थे प्रेम

तब कुछ नहीं था हमारे पास

फटी हथेलियों

और थके पैरों से

हल लगाते थे हम

कोहरे में घाम को देते थे

आवाज

हम देखते थे आकाश

जिसका मतलब

आकाश के सिवाय

कुछ नहीं था हमारे लिए

जब हम प्रेम में गिरे

हम यादों में गिरे

जब यादों में बहे

प्रेम में डूब गये हम

घाटी से चलकर

हमारे घर तक आने वाली

पगडंडी था तब आकाश

हमारे खेतों में

आँख ले रहे होते अंकुर

आकाश में हम सुनते रहते

हवा की गूँज

जो हमारी सांस थी दरअसल

प्रेम में आकाश

आकाश जितना ही दूर था

उसे ज़रा सा उठाकर

हम अपने

मवेशियों को देते थे आवाज

उसकी आँखों में

हम देखते थे अपनी दुनिया

पहाड़ों को काटकर बने घर

जो हमारे थे

हम जो रहते थे एक गाँव में

प्रेम करते हुए|

(हेमंत कुकरेती)

जुलाई 7, 2010

गूँज : केदारनाथ सिंह के जन्मदिन के अवसर पर

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि श्री केदारनाथ सिंह के ७६वें जन्मदिवस पर उन्हें बहुत बहुत बधाई और उनकी लम्बी आयु के लिए शुभकामनायें।
इस अवसर पर प्रस्तुत है उनकी एक बहुत गहरे भाव वाली कविता गूँज


यह जो मेरा घर है
जहाँ जीने के पूरे समारोह के साथ
मैं रहता हूँ बरसों से
मेरा नहीं है

हालाँकि
बाहर दरवाजे पर एक ध्वज की तरह जो
फहरा रहा है नाम
वह मेरा ही है


खुद से एक लम्बी बहस के बाद
मैंने बड़े डाकघर को
भेज दी है सूचना
कि अब से इस घर का पता
उब सबका पता हो
जिनका कोई पता नहीं


यही सूचना मै
बारिश, हवा और कबूतर के पास
भी भेजना चाहूँगा


अगर मेरा डाकघर
इसमें मेरी ज़रा भी मदद करे


इस घर में एक गूँज है
एक बरसों पुरानी थकी हुयी गूँज
जिसे छिपाने से कोई फायदा नहीं

उसके बारे में सारे वृद्धजन
और मेरी भाषा के लगभग सारे
पंचांग चुपचाप हैं
सहमत हैं कि
वह मेरे समय की बर्फ पर
किसी हिममानव के पैरों
के चलने की आवाज है

इस आवाज की ठंडक
मेरे शहर के लोगों को अच्छी लगती है


अभी पिछली ही शाम
मैंने अपनी गली के एक गीत में
उस आवाज की हल्की सी
धमक सुनी और
मेरी शिराएँ अब तक झनझना रही हैं


चकित हूँ मैं
मुझे लग गए जीवन के कितने बरस
इस सीधी सी बात तक चलकर पहुँचने में
कि मेरे समय का नायक
कोई योद्धा
या प्रेमी नहीं
एक अदृश्य
व असाध्य हिममानव है

जो अपने वजूद के
न होने के ताप से
आहिस्ता- आहिस्ता

गल रहा है

%d bloggers like this: