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जनवरी 10, 2011

शब्द … (कविता – रफत आलम)

 

ढ़ाई अक्षर का छोटा सा नाम
फैले तो सागर- सहरा बन जाये
यानि दुनिया बन जाये

सच्चा शब्द…

आसमानी किताब बन के उतरे
अवतार-पैगम्बर के होठों पर
कुरान-गीता बन जाये
किसी सोच में मग्न कलम से
कालजयी रचना बन जाये
सामवेद होकर सच्चा शब्द
सितार-वीणा बन जाये
जुल्म-अन्याय के विरुद्ध
इन्कलाब की ध्वजा बन जाये

झूठा शब्द…

अज्ञान –अधर्म का विधाता
महाभारत –कलिंग जन्माता
बारूदी ढेरों पर नाचने लगता है
मीन-काम्फ उभारने लगता है
सौ झूठ को सच बनाता है
हिरोशिमा – नागासाकी जलाता है
सूली–ज़हर-गाली-गोली
ईसा-मंसूर-सुकरात–लूथर–गाँधी
जलाये जाते किताबों के ढेर
खेली जाती आदमी के लहू से होली
खूनी इबारत बन कर झूठा शब्द
काले अल्फाजों से रौशनी मिटाता  है
मानव मन का अँधेरा बन जाता  है

समय की किताब नकल करते
एक बंजर ज़हन को कबसे
शब्द के बीज की है तलाश
अहसास की बारिश में
कभी उग आये काश !

(रफत आलम)

दिसम्बर 5, 2010

भारत तैयार है जननेता के जन्म के लिये

समय कभी-कभी विपरीत का महत्व स्पष्ट तरीके से रेखांकित करता है। कालिख के सामने उजलेपन की महत्ता ज्यादा समझ में आती है। कथा, कहानियों, नाटकों एवम फिल्मों आदि में भी जितना बड़ा खलनायक, उतना ही बड़ा नायक का कद लगने लगता है।

बुराई न हो तो भीड़ के स्तर पर अच्छाई को इतना ज्यादा महत्व शायद न मिले। बुराई की अधिकता ही अच्छाई के अस्तित्व के लिये दिलों में इच्छायें जाग्रत करती है।

पौराणिक नायकों के काल से लेकर वर्तमान समय तक जन मानस पर राज करने वाले नायक वे रहे हैं जिन्होने लोगों को गहरे स्तर तक परेशान करने वाली बुराइयों से लोहा लेकर उन्हे परास्त किया है।

सामाजिक-राजनीतिक परिपेक्ष्य में देखें तो पिछले सौ-डेढ़ सौ सालों के काल में गाँधी ऐसे जन नेता बने जिन्हे आने वाली सदियाँ माइथॉलोजिकल चरित्र में बदल देंगी। उनके सामने ब्रिटिश हुकुमत जैसी विशालकाय शक्ति खड़ी थी और उन्होने उस वक्त्त की संसार की सबसे बड़ी ताकत का मुकाबला किया। उन्होने देश के अंदर भी भारत के लोगों में व्याप्त कमजोरियों एवम बुराइयों के खिलाफ भी जंग छेड़ी। इतनी बुराइयों के खिलाफ वे न खड़े होते तो अच्छे व्यक्तियों में तो उनका बखान होता पर वे सदियों तक याद रखे जाने वाले महान इंसान की उपाधि न पा पाते और जनता उन्हे भुला बैठती। पर उनके सामने खड़े विलेन ने उन्हे बहुत बड़ा नेता बना दिया। इसमें उनकी निडरता, आत्मशक्त्ति, एवम त्याग करने की इच्छा शक्त्ति का भी भरपूर योगदान है परंतु इस बात का भी महत्व है कि उन्होने बहुत बड़ी शक्त्ति के खिलाफ संघर्ष करने की जिजीविषा दिखाई।

ऐसे समय बहुत कम होते हैं जब संभावना वाले राजनीतिज्ञ नेता बन जाने का सौभाग्य और संभावना पा पाते हैं।

आज के भारत के सामने फिर से ऐसा वक्त्त आ गया है जब नेता उत्पन्न हो सकता है। नेता के उगने के लिये भूमि एकदम तैयार है, उसकी उर्वरा क्षमता बढ़ी हुयी है।

भ्रष्टाचार का मुद्दा भारत को पिछले पैंतीस-चालीस सालों से कुछ ज्यादा ही प्रभावित करता आ रहा है पर जनता में ईमानदारी भी बची हुयी थी तो मिश्रित किस्म का माहौल था पर अब भ्रष्टाचार ने पूरे देश को अपनी जकड़न में ले लिया है और कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार ने भारत में राज कायम कर ही लिया है। आज के दौर में एक आम आदमी के लिये ईमानदार रह पाना लगभग असंभव हो गया है। उसके ईर्द-गिर्द फैली भ्रष्ट शक्तियाँ उसे जीने ही नहीं देंगी यदि वह ईमानदार रहने की जिद करेगा। रोजमर्रा के जीवन से धर्म की हानि ही नहीं बल्कि धर्म का समूचा विनाश हो चुका है।

ऐसे ही समय के लिये गीता में श्री कृष्ण ने वचन कहे हैं।

हर बात का एक वृत होता है और पूरा चक्कर लगाने के बाद जब वापस मूल बिंदु के करीब यात्रा आने लगती है तो यही समय परिवर्तन का होता है। भ्रषटाचार भी अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है और अब ईमानदारी के उजलेपन की गैर-मौजूदगी खलने लगी है।

अब वह समय करीब आता जा रहा है जब ईमानदारी का राज्य फिर से देश में कायम हो सकता है।

देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के माहौल को देखते हुये कहा जा सकता है कि भारत एक ऐसा देश बन चुका है जहाँ जीवन के हर क्षेत्र में कीचड़ ही कीचड़ फैली हुयी है। चाहे राजनीतिक क्षेत्र की बात करें, या सामाजिक, आर्थिक या धार्मिक क्षेत्र की, हरेक क्षेत्र सड़ चुका है। भ्रष्टाचार की अधिकता से जीवनदायी तत्व समाप्त हो चुके हैं इसलिये हर क्षेत्र सड़ांध मार रहा है और हरेक दिशा में बदबू फैला रहा है।

पर कीचड़ में भी कमल खिल जाता है।

वृत के पूरा होने पर विपरीत की पुनर्स्थापना होने और करने का वक्त्त भी सामने आने लगता है।

एकल व्यक्ति में तो जागरण की संभावना हरेक दौर में रहती है पर अब वक्त्त आ गया है जब सर्वव्यापी स्तर पर भारत में ईमानदारी और धर्म का राज्य स्थापित हो सकता है।

पर दिखावा नहीं चलेगा, कभी नहीं चला है। नकली लोग अभिनय के क्षेत्र में हाथ आजमा सकते हैं वहाँ अभिनय करने के बदले पैसा मिलता है, वास्तविक जीवन में अभिनय करने से धोखाधड़ी फैलती है जो पिछले कई दशकों से भारत में फैली हुयी है। बहुमत ऐसे लोगों का है जो सही नहीं हैं उस क्षेत्र के लिये जहाँ वे कार्य कर रहे हैं अतः वे अभिनय किये चले जाते हैं।

वर्तमान दौर के राजनीतिज्ञ तो मौका खो रहे हैं अपने कदों को बढ़ाने का। वे भ्रष्टाचार की शक्ति से डरे हुये लोगों की जमात हैं। अगर वे साहस करें तो अपने कदों में इजाफा करके अपने खाते में कुछ पुण्य कमा कर रख सकते हैं।

ईमानदारी की पुनर्स्थापना के लिये भरपूर ईमानदार, चेतन और जाग्रत विवेक वाला व्यक्तित्व ही चाहिये होता है।

भारत की प्रयोगधर्मी भूमि एक बार फिर से जननेता नेता को उत्पन्न करने के लिये तैयार है।

 

…[राकेश]

मई 31, 2010

श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते

श्याम, कान्हा, कृष्ण… कुछ भी कह लो उन्हे, वे जीवन के मनुष्य रुप में जन्मे विराटतम स्वरुप हैं। ऐसा प्रतीत नहीं होता कि मनुष्य रुप में जीवन इससे बड़ा हो सकता है या इससे ऊपर जा सकता है। कृष्ण जीवन का उल्लास हैं, उत्सव हैं। उन्होने सिर्फ सैधान्तिक रुप में ही जीवनदर्शन नहीं उच्चारित किया वरन हरेक बात को खुद जीकर दिखाया। गीता तो एक बहुत छोटी सी कुंजी है उस विशालतम व्यक्तित्व द्वारा दिखायी लीला के दर्शन की।

मन में गहराई से भक्तिभाव से भरे एक आस्तिक को ऐसा बता दिया जाये कि ईश्वर नहीं है तो उस “विशेष” के न होने की कल्पनामात्र से ही उसका सारा अस्तित्व काँपने लगेगा। वह अपने को इतना निरीह पायेगा जितना उसने अपने को पहले कभी नहीं पाया था। जो उसके पास था सदा, जो उसकी पूँजी था, जिसके कारण उसे ऊर्जा मिलती थी आज वह नहीं है का अहसास किसी को भी हिला कर रख देगा।

जब विराट व्यक्तित्व पास में हो, सदा सुलभ हो, सहज ही जिस तक पहुँच हो तब उस विशाल उपस्थिति से भी कुछ शिकायतें हो जाना स्वाभाविक है। मानव का स्वभाव ही कुछ ऐसा है पर अगर वही विशाल अस्तित्व यकायक जीवन का भौतिक रुप छोड़ दे और शून्य में विलीन हो जाये तो उसके आसपास रहने वालों के जीवन में एकदम से शून्य आ जाता है। उनके प्रिय की अनुपस्थिति उन्हे उनकी निर्बलता का अहसास कराने लगती है। सारे गिले शिकवे एकदम से गायब हो जाते हैं और बस एक इच्छा सारे समय चीत्कार करने लगती है कि एक बार बस एक बार उससे मिलना हो जाये।
यह कह लूँ
वह कह लूँ
गले लग जाऊँ
पैर पकड़ माफी माँग लूँ
बस एक बार और मिल जाऊँ।

उस अभाव में आँसू थमते नहीं। ऐसा तो साधारण मनुष्य के जाने से भी हो जाता है और अगर बात कृष्ण जैसे व्यक्तित्व के धरा से विलीन होने की हो तो उनके पीछे रह जाने वाले उनके प्रिय जनों की स्थितियों का सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।

गुजराती साहित्यकार दिनकर जोशी जी ने अपने अदभुत उपन्यास “श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते” में कृष्ण के न रहने की इसी पर्वत सी ऊँची पीड़ा को दर्शाने का कठिन काम साधा है।

कृष्ण के पीछे छूट जाने वाले चरित्रों के दुख को, उनकी पुकार को शब्द देता है यह उपन्यास। अर्जुन, द्रौपदी, राधा, अश्वत्थामा, अक्रूर आदि व्यक्तियों की मनोदशा का जीवंत वर्णन करता है यह उपन्यास। यह उपन्यास पाठक को रुह की गहरायी तक भिगो जाता है।

एक अच्छी पुस्तक में उस देश में रची सब अच्छी रचनाओं का स्वाद आ जाता है। ऐसा अपने आप हो जाता है।

स्व. धर्मवीर भारती जी की कालजयी रचना अंधायुग में एक प्रसंग है जहाँ गांधारी कृष्ण को शाप देती है।

गांधारी :

तो सुनो कृष्ण
प्रभू हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक दूसरे को फाड़ खायेगा
तुम खुद उनका विनाश करके कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभू हो पर मारे जाओगे एक पशु की तरह

…………
कृष्ण :

माता!
प्रभू हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम माता हो
…..
अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं वरन मैं ही मरा हूँ करोड़ों बार
……..
जीवन हूँ मैं तो मृत्यू भी तो मैं ही हूँ माँ
शाप तुम्हारा स्वीकार है।

एक असहनीय दुख है उपरोक्त गांधारी कृष्ण संवाद में। दुख और क्रोध से भरी गांधारी कृष्ण को शाप तो दे देती हैं परन्तु कृष्ण के इस प्रकार शाप को स्वीकार करने से स्थितियाँ एकदम से बदल जाती हैं उनके लिये और गांधारी रोने लगती हैं।

गांधारी:

यह क्या किया तुमने
रोई नहीं मैं अपने सौ पुत्रों के लिये
लेकिन कृष्ण तुम पर
मेरी ममता अगाध है
कर देते तुम शाप यह मेरा अस्वीकार
तो क्या मुझे दुख होता?
मैं थी निराश, मैं कटु थी
पुत्रहीना थी।

 

कृष्ण:

ऐसा मत कहो
माता!
जब तक मैं जीवित हूँ
पुत्रहीन नहीं हो तुम।
प्रभू हूँ या परात्पर
पुत्र हूँ तुम्हारा
तुम माता हो ।

जो दुख, जो भाव अंधायुग से लिये गये उपरोक्त प्रंसंग में है उसमें अगर ऐसा भी जोड़ दिया जाये कि कृष्ण वहाँ नहीं हैं और गांधारी को बाद में अपराध बोध होता है अपने द्वारा दिये गये शाप के कारण तो कृष्ण की अनुपस्थिति में गांधारी को हुयी छटपटाहट का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। गांधारी को तो साक्षात कृष्ण द्वारा ही संबल मिल गया पर बाकी चरित्र तो कृष्ण के बिना उनसे एक बार और मिलने के लिये छटपटाकर रह गये। और दिनकर जोशी जी की पुस्तक कृष्ण के पीछे छूट गये चरित्रों की विवशता का ही वर्णन करती है।

भावों को महत्व देने वाले जिस किसी भी भारतीय साहित्य प्रेमी ने इस पुस्तक को न पढ़ा हो उसके लिये इसका न पढ़ा जाना ऐसे ही है जैसे कि कोई बहुत मूल्यवान चीज थी हमारे आस पास और हम चूक गये उसके दर्शन करने से।

…[राकेश]

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