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जनवरी 1, 2014

सावित्री मंदिर … पुष्कर

सावित्री मंदिर की सीढ़ियों पर savitri-001

अस्ताचल को जाता सूर्य

खूब सिंदूरी हो,

सतरंगी बादलों को

नारंगी कर गया है!

घाटी की हरियाली,

पहाड़ के दोनों छोर पकड़ कर

सांवली सी हो,

मटियाली धरती को

समेट सी गई है!

मंद समीर,

हिचकोले खा- सम और विषम पर

ताल सा देता,

तीखी सी पहाड़ी को

तरंगित कर गया है!

दूर पुष्कर का नीला जल,

नारंगी, हरे और सफ़ेद रंगों के बीच

शांत सागर सा,

मेरे मन को

विश्रांत कर गया है!

रिधिम – रिधिम,

मंद – मंद थाप

पवन की, गगन की, मन की

पड़ती है इस हरी-भरी काया पर

और मेरा तन- शून्य हो गया है !

और मन –

वो उड़ा, वो उड़ा

जैसे में खुद रुई का फाहा

मंद समीर के झकोरे में

तिरता चला जाता हूँ!

परत-दर-परत

मन में शान्ति

तन में विश्रान्ति

देवताओं के द्वार के पास

शायद यही निर्वाण है कि

मैं- खो बैठा – सुध-बुध

तन की, मन की !

और,

पुष्कर के नील जल पर

सावित्री मंदिर से मैंने कहा –

– तीर्थ

दिव्य!

Yugalsign1

अप्रैल 30, 2013

प्रेम में आकाश

जब हम नहीं करते थे प्रेम

तब कुछ नहीं था हमारे पास

फटी हथेलियों

और थके पैरों से

हल लगाते थे हम

कोहरे में घाम को देते थे

आवाज

हम देखते थे आकाश

जिसका मतलब

आकाश के सिवाय

कुछ नहीं था हमारे लिए

जब हम प्रेम में गिरे

हम यादों में गिरे

जब यादों में बहे

प्रेम में डूब गये हम

घाटी से चलकर

हमारे घर तक आने वाली

पगडंडी था तब आकाश

हमारे खेतों में

आँख ले रहे होते अंकुर

आकाश में हम सुनते रहते

हवा की गूँज

जो हमारी सांस थी दरअसल

प्रेम में आकाश

आकाश जितना ही दूर था

उसे ज़रा सा उठाकर

हम अपने

मवेशियों को देते थे आवाज

उसकी आँखों में

हम देखते थे अपनी दुनिया

पहाड़ों को काटकर बने घर

जो हमारे थे

हम जो रहते थे एक गाँव में

प्रेम करते हुए|

(हेमंत कुकरेती)

अक्टूबर 7, 2011

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले

एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

प्यार से कोई मेरी ज़ुल्फ को संवार दे
बोझ सभी ज़िंदगी के प्यार से उतार दे
हाथ मेरा थामकर हर सफर में वो चले
इस चमन से जो गई वही मुझे बहार दे

प्रसून सा कहीं खिलूँ फिर कोई निहार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

मेरे नयनों में फिर सपने वो जागने लगें
तस्वीर दिल में फिर वही हम टांगने लगें
मंदिरों में, मस्जिदों में मौन होके या मुखर
साथ उम्र भर का झुके माथ मांगने लगें

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

नज़र मिला नज़र गिरा, ओट में ही मुस्करा
खुले बहुत मगर फिर भी लाज हो ज़रा-ज़रा
इस तरह लगे कि जैसे अंग-अंग भर उठे
धरा अगर लगे परी तो आसमां भरा-भरा
मन के तार छेड़ दे फिर कोई सितार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले

{कृष्ण बिहारी}

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