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सितम्बर 24, 2015

हरामखोर! खाना दे, वरना सब चबा जाऊँगा

बेहद  भूखा  हूँ

पेट  में , शरीर  की  पूरी  परिधि  में

महसूसता  हूँ  हर  पल  ,सब  कुछ  निगल  जाने  वाली एक  भूख .

बिना बरसात के ज्यों चैत की फसलों वाली खेतों मे जल उठती है भयानक आग

ठीक वैसी  ही आग से जलता है पूरा शरीर .

महज दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिले , बस और कोई मांग नहीं है मेरी .

लोग तो न जाने क्या क्या मांग लेते हैं . वैसे सभी मांगते है

मकान गाड़ी , रूपए पैसे , कुछेक मे प्रसिद्धि का लोभ भी है

पर मेरी तो बस एक छोटी सी मांग है , भूख से जला जाता है पेट का प्रांतर

भात चाहिए , यह मेरी सीधी सरल सी मांग है , ठंडा हो या गरम

महीन हो या खासा मोटा या  राशन मे मिलने वाले लाल चावल का बना भात ,

कोई शिकायत नहीं होगी मुझे ,एक  मिटटी का  सकोरा भरा भात चाहिये मुझे .

दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिल जाये तो मैं अपनी समस्त मांगों से मुंह फ़ेर लूँगा .

अकारण मुझे किसी चीज़ का लालच  नहीं है, यहाँ तक की यौन क्षुधा भी नहीं है मुझ में

में तो नहीं चाहता नाभि के नीचे साड़ी बाधने वाली साड़ी की मालिकिन को

उसे जो चाहते है ले जाएँ , जिसे मर्ज़ी उसे दे दो .

ये जान लो कि मुझे इन सब की कोई जरुरत नहीं

पर अगर पूरी न कर सको मेरी इत्ती सी मांग

तुम्हारे पूरे मुल्क मे बवाल मच जायेगा ,

भूखे के पास नहीं होता है कुछ भला बुरा , कायदे कानून

सामने जो कुछ मिलेगा  खा जाऊँगा बिना किसी रोक टोक के

बचेगा कुछ भी नहीं , सब कुछ स्वाहा हो जायेगा निवालों के साथ

और मान लो गर पड़ जाओ तुम मेरे सामने

राक्षसी भूख के लिए परम स्वादिष्ट भोज्य बन जाओगे तुम .

सब  कुछ निगल लेने वाली महज़ भात की भूख

खतरनाक नतीजो को साथ लेकर आने को न्योतती है

दृश्य से द्रष्टा तक की प्रवहमानता को चट कर जाती है .

और अंत मे सिलसिलेवार मैं खाऊंगा पेड़ पौधें , नदी नालें

गाँव  देहात , फुटपाथ,  गंदे नाली का बहाव

सड़क पर चलते राहगीरों , नितम्बिनी नारियों

झंडा ऊंचा किये खाद्य मंत्री और मंत्री की गाड़ी

आज मेरी भूक के सामने कुछ भी न खाने लायक नहीं

भात दे हरामी , वर्ना मैं चबा जाऊँगा समूचा मानचित्र

(बांग्लादेश के कवि रफीक आज़ाद की कविता का अशोक भौमिक दवारा किया अनुवाद)

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अप्रैल 30, 2013

प्रेम में आकाश

जब हम नहीं करते थे प्रेम

तब कुछ नहीं था हमारे पास

फटी हथेलियों

और थके पैरों से

हल लगाते थे हम

कोहरे में घाम को देते थे

आवाज

हम देखते थे आकाश

जिसका मतलब

आकाश के सिवाय

कुछ नहीं था हमारे लिए

जब हम प्रेम में गिरे

हम यादों में गिरे

जब यादों में बहे

प्रेम में डूब गये हम

घाटी से चलकर

हमारे घर तक आने वाली

पगडंडी था तब आकाश

हमारे खेतों में

आँख ले रहे होते अंकुर

आकाश में हम सुनते रहते

हवा की गूँज

जो हमारी सांस थी दरअसल

प्रेम में आकाश

आकाश जितना ही दूर था

उसे ज़रा सा उठाकर

हम अपने

मवेशियों को देते थे आवाज

उसकी आँखों में

हम देखते थे अपनी दुनिया

पहाड़ों को काटकर बने घर

जो हमारे थे

हम जो रहते थे एक गाँव में

प्रेम करते हुए|

(हेमंत कुकरेती)

अगस्त 22, 2011

ख़ाली घोंसला


जब भी मन करता है देर तक पूरा चाँद देखूँ, चांदनी की शीतल चादर से लिपट कर सो जाऊँ या दूज का थोडा चाँद निरखने के बाद आकाश गंगा के धुंधलको में खो जाऊं तो मुझे गावँ का रास्ता पकडना पड़ता है। वहाँ अब भी उगते सूरज की उषा और सूर्यास्त की लाली, काले-सुरमई प्रदुषण से बीमार आकाश के दर्शनों बिना देखी जा सकती है। बरखा की फुहारों में भीग कर माटी की आदिम खुशबु सूँघते हुए इंद्र-धनुष क्षितिज के इस छोर से परले सिरे तक बिना ऊँची बहुमंजिला इमारतों की रुकावट के सराहा जा सकता हैं। वैसे भोले किसानों को विदेशी शराब, गुटखे और लंबी सिगरटों के जाल में फाँस कर भूमि कारोबारियों के दलाल बीघा के हिसाब से उसकी विरासत लूटवाने पर लगे हुए हैं, फिर भी शहरी जीवन की समस्त बुराइयों के वहाँ तक पहुँचने में अभी समय है।

नगरीकरण ने खेतों की हरियाली तो खाई ही है एक कंक्रीट जंगल भी फैला दिया है जिसमें चारों तरफ आदमियों के दड़बे नज़र आते हैं., हर इंसान अपने ही अस्तित्व की कैद में है, सभी अपनत्व और पड़ोसी होने के हकों से कटा हुआ अजीब सा जीवन जी रहा है, जहाँ कोई किसी का नहीं है

हरे पेड़, उन पर चहचहाते पक्षी, शहर के चंद उजड़ते बागों तक सीमित रह गए हैं। कोई समय था, घरेलु चिड़िया हर आँगन का आवशयक हिस्सा हुआ करती थी। बस अब सूखे ठूठों तक सिमित होकर चहचहांती है सुबह-शाम। चौराहों पर आवारा गायें और कबूतर केवल लोगों की धार्मिक प्रवृत्ति के कारण ही तादाद में नज़र आते हैं, गिद्ध विलुप्त हुए अरसा हुआ, कुछ एक चील–कौवे आकाश में ज़रूर दिखाई दे जाते हैं।

खुशनसीबी से मैं जिस स्थान पर रहता हूँ वह एक पुराना उजड़ा हुआ बाग है सो यादगार स्वरूप थोड़ा खुला मैदान और गिनती के चौबीस बड़े व कुछ एक छोटे दरख्त वहाँ अब भी मोंजूद हैं। गए वक्तों के भूले बिसरे खेल, किलोल–आँख मिचौली–गुलाम, लकड़ी आदि के गवाह और बचपन की उन मासूमियत भरी शरारतों के भी, जो बेरहम वक्त के कटाव में या तो माटी में मिल चुकीं या झुर्री भरे बदनों में चूरा हुए दिनों की गर्द बन कर जिंदा हैं।

बात चूँकि छोटे-मोटे जानवरों तथा पक्षियों की चल रही है व बुलबुल के घोंसले और बच्चों पर आकर खत्म होनी है सो बताना ज़रूरी है, बाग में पालतू बकरियों और कुत्तों के सिवा अब कोई चरिन्दा नहीं रहता। कुछ आज़ाद गिलहरियाँ व बिल्लियाँ तो हैं पर उनका क्या जिक्र! परिंदों में घरेलु चिड़िया, कबूतर, तोते, और कबूतर ये आम हैं, कभी नीलकंठ-कोयल-बुलबुल-खातीचिड़ा आदि, और दिन बहुत अच्छा हो तो मोर भी दिखाई दे जाते हैं।

अब असल बुलबुल वाली बात पर आया जाए पर तनिक तो रुकिए। जाने आप बुलबुल को क्या समझते है पर मेरे लिए तो ये दुनिया का एक मात्र वह पक्षी है जिसके काले रंग में जादुई कुरूपता सफ़ेद गुलाबी सुंदरता के साथ मौजूद है। इसकी लयभरी और सुरीली तीखी आवाज़ भोर होने से पूर्व अक्सर मेरे नींद में डूबे बदन को जागती है तो कई बार लोरी बनकर सुला भी देती है। हुआ यूँ था हम दो चार दिन के लिए गावँ गए थे, लौट कर जब घर का ताला खोला और भीतर पहुँच कर आंगन की बत्ती जलाई, फुर्र की आवाज़ के साथ संतरे के बौने पर जवान पेड़ से जैसे चिड़िया के उड़ने की आवाज़ आई।

अरे साब! ये छोटा पेड़ बोनसाई नही है, इसका जन्मदाता छिलकों के साथ गफलत में फेंका गया बीज था, जो गुलाब के गमले में जा ठहरा और ऐसा ठहरा कि गुलाब तो गुल हुआ और जड़ों का झाड़ बन यह बिराजमान है। आज आठ साल के लगभग का है मेरा बौना संतरा और पिछले साल से गिनती के तीन या चार फल भी दे रहा है।

वृतांत के बीच में बहकने से पहले मैं कह रहा था, चिड़िया के फुर्र होने के बाद पिछवाडे में जाकर देखा तो दो टहनियों के बीच बाकायदा करीने से बना घोंसला मौजूद था, जिसमें दो अदद अंडे भी सिमटे से सजे थे। इतने में चिड़िया, जो कि सुखद आश्चर्य के रूप में बुलबुल निकली और सर पर चिल्ला चिल्ला कर मंडराने लगी। तेज सीटीनुमा आवाज़ देकर उसने कही आसपास उपस्थित  चिड़े को भी पुकार लिया। हमने उस समय उन्हें उनके हाल पर छोड़ने में ही भलाई समझी।


सवेरे तक बुलबुल की समझ में आ गया था जैसे हो गुज़र यहाँ ही करनी है, सो वह अपने अंडों पर बैठी रही और थोड़ी दूर बिजली के पोल पर उसका चिड़ा पहरेदारी करता दिखा। कुछ-कुछ अंतराल से शायद जैसे ही कीड़ा-मकोड़ा या भोजन मिलता, ढूंढ कर, पकड़ कर चिड़िया को खिला जाता। कई दिन तक चौबीसो घंटे बुलबुल अंडे सहती रही और चिड़ा उसकी सेवा में लगा रहा।

यहाँ वृतांत के मूल स्वरूप से हटना फिर ज़रूरी हो गया है क्यों कि मन में इस विवरण से बिलकुल अलग हट कर यह विचार आ रहा है कि यूँ ही तो नहीं कहा गया – माँ के पैरों तले जन्नत होती है, सो देखिये ना कोई दस बारह दिन वह चिड़िया अपने अंडों पर से हिली भी नहीं। एक बात हम सभी तथा कथित पत्नी भक्त ‘’आई लव यू, किस उड़ाने वाले और बाय..बाय“ वालों के लिए लिखने को भी जी चाह रहा कि तमाम रोमांटिक कहानियों-टी.वी सीरियलों से ज्ञान लेने के बावजूद विवाह के चार सालों में मोहब्बत का जज्बा ठंडा पड़ने लगता है, फिर पत्नी सेवा अरे! कहाँ की बात कर रहे हो भारी से भारी गर्भवतियों को खाना लगा दूँ  जी की अनुमति के बाद, सरताज की थाली सजानी होती है। मुझे कई बार उस बुलबुल जोड़े से इर्ष्या सी होने लगी थी कि काश मैंने भी इनके सामान प्यार किया होता!


बुलबुल के अंडा सहजने का काल भी आखिर समाप्त हुआ। सवेरे-सवेरे हल्की चूँ…चूँ की आवाज़ से मेरा घर खबरदार हुआ कि चूजे निकल गए हैं। चूजों के निकलने के बाद बारी-बारी से माता-पिता उनके लिए भोजन की जुगाड़ में मशगूल रहते। मैं रोज देख रहा था आश्चर्यजनक रूप से बढ़ते हुये बच्चों के बदन। पर कोई छह दिवस बाद बुलबुल जोड़े को नज़र लग गयी। एक कौवे की निगाह जाने कैसे घोंसले पर पड गयी थी और उस कौवे के हमले का जिस बहादुरी के साथ चावं-चावं कर उन्होंने मुकाबला कर उसको घोंसले से दूर रखा ना भूलने काबिल मंज़र था। मेरा सारा परिवार ज़रा सी परिंदों की ची-चावं सुनता तो बुलबुल को बचाने के लिए दौड़ पड़ता।

बाहरहाल कोई नवें दिन ऐसा हादसा हुआ कि देर तक या कहूँ दिन भर मन टुटा रहा। घटना यह जब घटी, चिड़िया बच्चों के पास थी और चिड़ा सामने दीवार पर बैठा था, अचानक बिल्ली का झपट्टा, हल्की सी, ची.. की पुकार और चिड़े को मुँह में दबा कर वह यमदूत अंतर्ध्यान हो गयी थी।

इस दुर्घटना का चिड़िया के दिल दिमाग और जीवन पर पड़ने वाला असर, काश बाँटा जा सकता। मुझे जीवन की नश्वरता का बहुत गहरा आभास हुआ था उस समय। चिड़िया का दर्द और उसकी भाषा तो मुझे मालूम नहीं पर चूजों के लिए चुग्गा वह अकेली लाती रही। चूजे लगभग किशोर हो चले थे। कोई तेरहवें दिन शिकारी कौवों के जाने के समय पश्चात बुलबुल ने उन्हें आकाश दिखाने का समय चुना।

इस बात पर भी गौर कीजिये कि एक जानवर, जिसे हम अक्ल के दुश्मन मानव बुद्धिहीन कहते है, ने कितनी चतुराई से धुँधलके का वह समय चुना था जिसमें उसके बच्चो को सबसे कम ख़तरा था। उस ढलती शाम के वक्त, अचानक बुलबुल ने किसी गीत के बोल से गाये और फुर्र की आवाज़ के साथ अधिक स्वस्थ बच्चे के साथ उड़ गयी, सामने नीम के दरख्त की और कुछ समय बाद वही तरीका उसने दूसरे बच्चे के साथ अपनाया।

बुलबुल के बच्चों ने शक्तिशाली परों के सहारे नीले-नभ पर उड़ान भरी या किसी शिकारी का ग्रास बने, मालूम नहीं। श्यामल चिड़िया किस झुंड में जा खोई यह भी पता नहीं।

उसके जीवन-सफर का एक पड़ाव, वह खाली घोंसला, मेरे मिनी संतरे के पेड़ में अभी भी झूल रहा है। शायद किसी तेज बरसात या पवन के झोंके के साथ तिनका–तिनका बिखरने के इन्तज़ार में!

(रफत आलम)

अगस्त 8, 2011

अदभुत चाँद

बाईस नवम्बर उन्नीस सौ निन्यानवे का चाँद
अभी-अभी देखकर लौटा हूँ
शेरटन होटल के सामने से
दिन बुधवार
शाम के साढ़े सात बजे हैं।
अंतरिक्ष का भेद बताने वालों ने बताया था पहले से कि
यह चाँद अब तक दिखने वाले चाँदों में
सबसे बड़ा दिखेगा।

पूरा चाँद
एक थाल…नहीं,
एक परात बराबर
लगा कि मेरी दादी ने उसे
राख से माँज दिया हो।
मैंने अपनी दादी को नहीं देखा
मगर आज चाँद को देखकर लगा कि
दादी को देख लिया।
माँ कहती है कि
मेरे जन्म के तीन महीने बाद ही दादी गुजर गई।
लेकिन आज चाँद को देखते ही
वह सब याद आया जो दादियाँ सुनाती आयी हैं।

चाँद की सीमाओं में धान कूटती बुढ़िया
चूल्हे के पास से परथन के बराबर पड़े गुंथे आटे में
दाँत मारती चुहिया
सुना हुआ सब कुछ मुझे आज के चाँद में दिखा।
सुना हुआ न दिखता तो कितना विकृत और विद्रूप लगता
सुने हुए में कल्पना समाहित होती है।
आज का परात बराबर चाँद
मैंने बचपन में अपने गाँव की
बहन-बेटियों की शादी में देखा था
उसमें रखकर सब्जियाँ और पूरियाँ परोसते थे लोग
आज लगा कि उसी परात को दादी ने
राख से माँज दिया है।
यह बाईस नवम्बर उन्नीस सौ निन्यानवे का चाँद है
रोज से बड़ा और रोज से साफ।

{कृष्ण बिहारी}

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