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दिसम्बर 15, 2016

आप मेरा क्या कर लेंगें … (भारतभूषण अग्रवाल)

एकल व्यक्ति पर सरकार का, सत्ता का, या कि समाज या परिवार का या कि किसी दूसरे का कितना नियंत्रण वाजिब है या कि तमाम तरह की बंदिशों और दिशा निर्देशों के मध्य एक अकेले व्यक्ति की कितनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है यह सदैव ही एक ज्वलंत प्रश्न रहा है| भले ही कोई लोक्तान्त्रिक देश का नागरिक हो पर सरकारें अपने नागरिकों के जीवन पर भारी  नियंत्रण रखना ही चाहती हैं| ऐसे नियंत्रण करने की कोशिशों से भरे काल में किसी समय कवि भारतभूषण अग्रवाल ने यह कविता लिखी होगी, जो कि मौजूदा समय में ज्यादा प्रासंगिक बन गई है|

आप क्या करेंगें मेरा अगर मैं,

यह जो सामने लैम्प रखा हुआ है,

इसे कह दूँ?

कि यह भारतीय गणतंत्र है?

बिना यह बताए कि यह करेंट मारता है?

तो भी आप मेरा क्या कर लेंगें?

सच, क्या कर सकते हैं आप मेरा

अगर कल मैं अचानक यह तय कर लूँ कि

मैं डी.टी.यू का इस्तेमाल नहीं करूँगा

और फिर क्यू फांदकर चलती बस में चढ़ जाऊं बताइये,

यह कैसे जरूरी है कि

आपकी योजनाओं से मुझे तकलीफ हो जब कि

मैं यूनीवर्सिटी में भर्ती होना ही नहीं चाहता?

आप चाहे मुझे फ़िल्म फेस्टीवल का निमंत्रण दें या लाटरी का इनाम?

पर आप दे ही सकते हैं|

मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते|

क्योंकि आप कितना ही परिवार नियोजन सुनाएँ

मैं विज्ञापन- कार्यक्रम पर कान लगाए रहूंगा|

आपकी मर्जी है आप छाप दें अखबार में हर सुबह

अपनी या उनकी तसवीर

मुझे आप आठ बजे उठने से नहीं रोक सकते|

आप मेरे सुख की चिंता करके मुझे तंग करने पर तुले हैं|

पर मैं ठीक जानता हूँ कि उससे मुझे कोई सरोकार नहीं|

क्योंकि अभी मेरी भाषा का विकास कहाँ हुआ है?

हो सकता है आप मुझसे सहमत न हों|

पर असहमति कोई अश्रु – गैस नहीं हैं

कि मैं भाग कर गली में छुप जाऊं|

(भारतभूषण अग्रवाल, 31.7.1969)

 

 

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नवम्बर 26, 2013

कुछ देर पुकार…चला जाऊँगा

किसने क्या कहाsilsila-001

किसने क्या सुना

तुमने ये किया

मैंने वो नहीं किया

तुम ऐसी ही हो

तुम वैसे ही हो

तुम ये हो

तुम वो हो

आज भी ये सवाल सुलझाने में

बाकी सब सिरे उलझ जाते हैं

कुछ हो न हो हम में

प्यार तो शर्तिया नहीं रहा कभी

प्यार शायद कुछ और होता होगा

जो मैंने किया…

नहीं किया…

पता नहीं…

तुमने किया…

नहीं किया…

पता नहीं…

सब कुछ ऐसे ही होना था शायद

ऐसे नहीं होना था तो फिर कैसे होना था?

और अगर ऐसे नहीं होना था

तो फिर ऐसे हुआ ही क्यूँ?

इसलिए तुम परेशान न होना मेरे लिए कभी

खुद को इलज़ाम भी न देना कोई

मेरा क्या है?

मैं चंद आवाजें और दूंगा

फिर चला जाऊंगा…

तुम्हारी इसी गली में

जहाँ मेरा चाँद उगा करता था

ये तन्हाई की रात भी गुज़ारूंगा

और निकल जाऊँगा|

आवारा भटकते हुए आ निकला था

या

यहीं आना था

तुम ले आयीं हाथ पकड़

या

मैं आया खुद

मालूम नहीं|

कहते हैं नज़रें हसीं होती है…

मैं भी कुछ लाया था

क्या लाया था…

मालूम नहीं…

हां आज भी कुछ है मेरी आँखों में

कुछ है मगर कोई शिकवा

कोई  शिकायत तो नहीं

मैं आवारा बेहिस बादल की तरह

थोडा सा बरसूँगा…

चला जाऊंगा…

तुम परेशान न होना कभी मेरे लिए….

ज़िन्दगी के सफ़र में सौ मोड़ आयें चाहे

किसी भी मोड़ पे तुम को अहसास-ऐ-तन्हाई न मिले

हर मोड़ पे किसी का साथ रहे

आज के बाद से हर तन्हा रात मेरी

मैं किसी भी तरह गुज़रता चला जाऊंगा

तुम परेशान न होना कभी मेरे लिए

खुद को इलज़ाम भी न देना कोई

मेरा क्या है…

कुछ देर पुकारूँगा…

चला जाऊँगा…

Rajnish sign

मई 30, 2011

अमृता प्रीतम का पता

रसीदी टिकट नामक आत्मकथा लिखने वाली अमृता प्रीतम संक्षिप्त में इस कविता में वह सब कह जाती हैं जिसे प्रदर्शित करने के लिये एक निबंधकार शायद कुछ हजार शब्दों का जमावड़ा कर देगा। कलाकार साधारण मानव की समझ वाली परिभाषाओं के बंधनों से परे चले जाते हैं। उन्मुक्त्त आत्मा की उदआन को दर्साती है यह कविता।

आज मैंने अपने घर का नम्बर हटाया है
और गली के माथे पर लगा
गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे जरुर पाना है
तो हर देश के
हर शहर की
हर गली का
द्वार खटखटाओ
यह एक श्राप है
एक वर है
और जहाँ भी
आज़ाद रुह की झलक पड़े
समझना वह मेरा घर है

(अमृता प्रीतम)

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