Posts tagged ‘Gagan’

मार्च 6, 2015

लीक पर वे चलें जिनके…

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं

शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
हिलती क्षितिज की झालरें
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

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दिसम्बर 24, 2013

अंत भी हो प्रकाशमान…

manbird-001उठकर

छू ले गगन

विहग के ले कर पर

भर ऊंची उड़ान

हो जा मगन!

विधाता का अंश है यात्रा

यात्रा का चरम उड़ान

मन खोजता रहेगा

गति से और गतिमान!

प्रहार कर

मन पर, तन पर

संवेगों और प्रतिक्रियाओं का पा बल

कूद पड़ समर-तम पर!

छांह की खोज

ईश्वर के उलट है

यदि है प्रकाश ही रचियता

तो अंत भी हो प्रकाशमान !

Yugalsign1

फ़रवरी 14, 2012

प्रीत

प्रीत जन्म है प्रीत मरण है प्रीत धरा है  प्रीत गगन है

प्रीत छाँव है प्रीत तपन है प्रीत मधुर वह आलिंगन है

जिसको सबने किया नमन है!

प्रीत मधुरिमा प्रीत अरुणिमा प्रीत अमावस प्रीत पूर्णिमा

प्रीत ह्रदय में सूर्य-चन्द्र सी उदय – अस्त में यही लालिमा

प्रीत-रीत से अलग खड़ी- सी हर इक मन की ही दुल्हन है!

प्रीत रुदन है प्रीत गीत है प्रीत हार है प्रीत जीत है

कहीं मुखर है कहीं मौन है प्राणों का आधार प्रीत है

देह और मन के जुड़ने से बनी धरा पर यह वंदन है!

जड़-चेतन में यही चेतना प्रीत खुशी है प्रीत वंदना

प्रीत आदि है प्रीत अंत है कहीं ऊपरी कहीं साधना

सघन वृक्ष की तरह जगत में आवारों का प्रीत भवन है!

प्रीत गंध है प्रीत डगर है प्रीत गाँव है प्रीत नगर है

यह गोरी है यह चूनर है कहीं सिंधु है कहीं लहर है

प्रीत कहीं पर धुल हो गयी कहीं माथे पर यह चंदन है!

कालिदास में यह शकुंतला मीरा में यह कहीं किशन है

ताजमहल की यही नायिका शाहजहां का एक सपन है

माने कोई बात अगर तो प्रीत ह्रदय का ही दरपन है!

प्रीत कहीं सरनाम हुयी है प्रीत कहीं बदनाम हुयी है

प्रीत कहीं गुमनाम हुयी है प्रीत कहीं नीलाम हुयी है

लेकिन इसके बावजूद भी प्रीत जगत का अंतर्मन है!

जाने कितनी भरी पोथियाँ बात प्रीत की करते-करते

जाने कितने युग बीते हैं बात प्रीत की करते-करते

मेरे तो मौलिक चिंतन में सरल-कठिन-सा यह दर्शन है!

प्रीत राधिका प्रीत भवानी घनानन्द की आम- कहानी

प्रीत शूल है प्रीत सुमन है प्रीत चैन है प्रीत चुभन है

प्रीत तपस्या प्रीत यातना यह जीवन की सरस साधना

पिघल गए पाषण जिसे सुन आहत मन का वह क्रंदन है!

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 10, 2012

तुम्ही बताओ क्या होगा?

जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

रजनी-गंधा देह तुम्हारी
मन गंगा का पानी
जी चाहे तुम पर मैं लिख दूं
कोई प्रेम कहानी |

जब ऐसा अदभुत रूप नयन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

बेले में है खुशबू तुमसे
रूप में रंग तुम्हारा
रंग और खुशबू का बोलो कैसे हो बंटवारा
जब इतनी कठिन घड़ी उपवन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

केश तुम्हारे रेशम – रेशम
भौंह लचकती डाली
मधु- प्याले से नयन तुम्हारे
ओठ उषा की लाली
जब इतनी रूप-राशि दर्पण के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

यह तो शायद तुम ही जानो कौन बसा है तुम में
तुम्हे देख कर मैं यह मानूं
अघट नशा है मुझमें
जब बारिश की दो बूँद तपन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

{ कृष्ण बिहारी }

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