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फ़रवरी 16, 2017

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे…

छोटी मगर गहरे भाव और अर्थ अपने में समाहित की हुयी कविता का उदाहरण देखना हो तो प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल की कविता “जो मेरे घर नहीं आयेंगें” तुरंत सामने आ जाती है|

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

उनके पास चला जाऊँगा

एक उफनती नदी कभी नहीं आयेगी मेरे घर

नदी जैसे लोगों  से मिलने

नदी किनारे जाऊँगा

कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टान, तालाब

असंख्य पेड़ खेत

कभी नहीं आएँगे मेरे घर

खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने

गाँव – गाँव, जंगल- गलियाँ जाऊँगा|

जो लगातार काम में लगे हैं

मैं फुरसत से नहीं

उनसे एक जरूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा

इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा|

(विनोद कुमार शुक्ल)

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अगस्त 9, 2016

रूरल डेवेलपमेंट … (महात्मा गाँधी)

“भारत गाँवों में बसता है, अगर गाँव नष्ट होते हैं तो भारत भी नष्ट हो जायेगा|

इंसान का जन्म जंगल में रहने के लिए नहीं हुआ बल्कि समाज में रहने के लिए हुआ है|

एक आदर्श समाज की आधारभूत ईकाई के रूप में हम एक ऐसे गाँव की कल्पना कर सकते हैं जो कि अपने आप में तो स्व-निर्भरता से परिपूर्ण हो, पर जहां लोग पारस्परिक निर्भरता की डोर से बंधे हुए हों| इस तरह का विचार पूरे संसार में फैले मानवों के बीच एक संबंध कायम करने की तस्वीर प्रस्तुत करता है|

ऐसा कुछ भी शहरों को उत्पादित करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए जो कि हमारे गाँव उत्पादित कर सकते हों|

स्वतंत्रता बिल्कुल नीचे के पायदान से आरम्भ होनी चाहिए|

और इसीलिए हरेक गाँव को स्व:निर्भर होना ही चाहिए और इसके पास अपने सभी मामले स्वंय ही सुलझाने की क्षमता होनी चाहिए|

गांवों की ओर लौटना ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है|

मेरा आदर्श गाँव मेरी कल्पना में वास करता है|

एक ग्रामीण को ऐसे जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए जैसे किसी मलिन अँधेरे कमरे में कोई जानवर रहता है|

मेरे आदर्श गाँव में मलेरिया, हैजा और चेचक जैसी बीमारियों के लिए कोई जगह नहीं होगी| वहाँ कोई भी सुस्ती, काहिली से घिरा और ऐश्वर्य भोगने वाला जीवन नहीं जियेगा|

मेरा स्पष्ट विचार है कि यदि भारत को सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करनी है और भारत के माध्यम से पूरे संसार को सच्ची स्वतंत्रता का स्वाद चखना है तो हमें गाँवों में झोंपडों में ही रहना होगा न कि महलों में|

गाँव की पंचायत स्थानीय सरकार चलाएगी| और इनके पास पूर्ण अधिकार होंगे| पंचायत के पास जितने ज्यादा अधिकार होंगे उतना लोगों के लिए अच्छा होगा|

पंचायतों का दायित्व होगा कि वे ईमानदारी कायम करें और उधोगों की स्थापना करें|

पंचायत का कर्तव्य होगा कि वह ग्रामीणों को सिखाये कि वे विवादों से दूर रहें और उन्हें स्थानीय स्तर पर ही सुलझा लें|

यदि हमने सच्चे रूप में पंचायती राज की स्थापना कर दी तो हम देखेंगें कि एक सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा और जहां पर कि सबसे नीची पायदान पर खड़ा भारतीय भी ऊँचे स्थानों पर बैठे शासकों के समां बर्ताव और अधिकार पायेगा|

मेरे आदर्श गाँव में परम्परागत तरीके से स्वच्छता के ऊँचे मानदंड स्थापित होंगे जहां मानव और पशु जनित कुछ भी ऐसी सामग्री व्यर्थ नहीं फेंकी जायेगी जो कि वातावरण को गंदा करे|

पांच मील के घेरे के अंतर्गत उपलब्ध सामग्री से ही ऐसे घर बनाए जायेंगें जो कि प्राकृतिक रूप से ही हवा और रोशनी से भरपूर हों| इन घरों के प्रांगणों में इतनी जगह होगी कि ग्रामीण वहाँ अपने उपयोग के लिए सब्जियां उगा सकें और अपने पशु रख सकें|

गावों की गालियाँ साफ़ सुथरी और धूल से मुक्त होंगी|  हर गाँव में पर्याप्त मात्रा में कुंएं होंगे जिन तक हर गांववासी की पहुँच होगी|

सभी ग्रामीण बिना किसी भेदभाव और भय के पूजा अर्चना कर सकें ऐसे पूजा स्थल होंगें| सभी लोगों के उठने बैठने के लिए एक सार्वजनिक स्थान होगा| पशुओं के चारा चरने के लिए मैदान होंगे| सहकारी डेरी होगी| प्राथमिक और सेकेंडरी स्कूल होंगे जहां व्यावहारिक क्राफ्ट्स और ग्राम-उधोगों की पढ़ाई मुख्य होगी| गाँव की अपनी एक पंचायत होगी जो इसके सभी मामले सुलझाएगी| हरेक गानव अपने उपयोग के लिए दूध, अनाज, सब्जियों, फलों और खाड़ी एवं सूती वस्त्रों का उत्पादन करेगा|

सबको इस बात में गर्व महसूस करना चाहिए कि वे कहीं भी और कभी भी उन उपलध वस्तुओं का प्रयोग करते है जो गाँवों में निर्मित की गयी हैं| अगर ठीक ढंग से प्रबंधन किया जाए तो गाँव हमारी जरुरत की सभी वस्तुएं हमें बना कर दे सकते हैं| अगर हम एक बार गानव को अपने दिल और दिमाग में स्थान दे देंगें तो हम पश्चिम का अंधा अनुकरण नहीं करेंगें और मशीनी औधोगीकरण की ओर अंधे बन कर नहीं भागेंगें|”

 

अगस्त 8, 2011

अदभुत चाँद

बाईस नवम्बर उन्नीस सौ निन्यानवे का चाँद
अभी-अभी देखकर लौटा हूँ
शेरटन होटल के सामने से
दिन बुधवार
शाम के साढ़े सात बजे हैं।
अंतरिक्ष का भेद बताने वालों ने बताया था पहले से कि
यह चाँद अब तक दिखने वाले चाँदों में
सबसे बड़ा दिखेगा।

पूरा चाँद
एक थाल…नहीं,
एक परात बराबर
लगा कि मेरी दादी ने उसे
राख से माँज दिया हो।
मैंने अपनी दादी को नहीं देखा
मगर आज चाँद को देखकर लगा कि
दादी को देख लिया।
माँ कहती है कि
मेरे जन्म के तीन महीने बाद ही दादी गुजर गई।
लेकिन आज चाँद को देखते ही
वह सब याद आया जो दादियाँ सुनाती आयी हैं।

चाँद की सीमाओं में धान कूटती बुढ़िया
चूल्हे के पास से परथन के बराबर पड़े गुंथे आटे में
दाँत मारती चुहिया
सुना हुआ सब कुछ मुझे आज के चाँद में दिखा।
सुना हुआ न दिखता तो कितना विकृत और विद्रूप लगता
सुने हुए में कल्पना समाहित होती है।
आज का परात बराबर चाँद
मैंने बचपन में अपने गाँव की
बहन-बेटियों की शादी में देखा था
उसमें रखकर सब्जियाँ और पूरियाँ परोसते थे लोग
आज लगा कि उसी परात को दादी ने
राख से माँज दिया है।
यह बाईस नवम्बर उन्नीस सौ निन्यानवे का चाँद है
रोज से बड़ा और रोज से साफ।

{कृष्ण बिहारी}

मई 10, 2011

नीम की छांव

लोग जिसका नाम बेच रहे हैं खुली दुकानों में
कहते हैं उसका घर है दूर कहीं आसमानों में

मुझे कब से है तलाश कहीं उसका पता मिले
मंदिर की झाँकी में के मस्जिद की अजानों में

हकीकत की सख्त ज़मीन पर सब बिखर गए
हवा-महलों से निकला करते थे सपने उड़ानों में

कंक्रीट के दडबों से तंग आओ तो कभी लौटना
नीम की छांव आज भी है गावं के मकानों में

गौर से देखो तो सभी के चेहरे खून से रंगे हैं
इतिहास ने लिखे हैं जितने भी नाम महानों में

किसने कहा पत्थर के सीने में दिल नहीं होता
चोट खा के दरारें पड जाती हैं सख्त चट्टानों में

हर कहीं देख लो मासूम इश्क का वही अंजाम
यार खोये हो कहाँ लैला मजनूँ की दास्तानों में

गया वक्त रोता फिर रहा है सन्नाटों के साथ
वहाँ भी सकून नहीं है जाके देख लो वीरानों में

शर्मदार की मौत को चुल्लू भर पानी है काफी
छली गयी उमंगें ही डूबी आलम शराबखानों में

(रफत आलम)

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