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दिसम्बर 11, 2013

जो हो रहा है वह रुकता नहीं, हो ही जाता है : ओशो

Osho-Mahaveer
ओशो सदेह उपस्थित होते तो आज 11 दिसम्बर को अपनी आयु के 82 साल पूरे कर रहे होते| उनकी सदेह उपस्थिति के समय भी कुछ हजारों को छोड़ बाकी संसार का उनसे मिलना उनकी किताबों, ऑडियो टेपों और वीडियो टेपों के द्वारा ही होता था सो उस लिहाज से उनके देह त्याग का उनकी सार्थकता पर कोई असर नहीं पड़ा है और उनकी सार्थकता बढ़ती ही जा रही है| उनसे परिचय न हो तो आदमी केवल नाम और उस नाम की छवि के बारे में प्रचलित धारणाओं से प्राभावित हो कैसे भी विचार उनके बारे में बनाए रख सकता है और रखता है पर देर सिर्फ उनसे एक मुलाक़ात की होती है फिर हरेक व्यक्ति का जीवन दो खण्डों में बंटता है, ओशो से मिलने से पहले ओशो से मिलने के बाद| कोई स्वीकार न करे यह अलग बात है पर ओशो उसे प्रभावित न करें ऐसा संभव है नहीं|

ओशो ने धरती पर मानव जीवन में जो भी और किसी भी काल में श्रेष्ठ घटा या उत्पन्न हुआ उसे समय की गर्त से निकाल आधुनिक मानव के समक्ष आज की समझदारी के हिसाब से रखा और आज की जरुरत के अनुसार अपने अस्तित्व के अंदर से नया भी जन्माया|

जो कार्य शुरू हो गया वह रुकता कभी नहीं| वह क्रिया अपनी पूर्णता को अवश्य ही प्राप्त करती है भले ही शुरू करने वाला व्यक्ति परिदृश्य से अनुपस्थित हो जाए|

एक अन्य महत्वपूर्ण बात वे ज्योतिष को समझाते हुए कहते हैं कि जो हमें अभी दिख रहा है या जैसा हमने विगत में घाटे के अनुसार समझा है केवल वही सत्य नहीं है सत्य तभी पूर्ण होता है जब वह भूत,वर्तमान और भविष्य के तीनों कालखंडों में पूर्ण आकार के साथ देख लिया जाए| भविष्य हमसे अज्ञात है इसलिए हमें पूर्ण सत्य के दर्शन होने बहुत मुश्किल होते हैं| भूत ने ही नहीं वर्तमान को रचा है बल्कि भविष्य में से भी कुछ है जो बात को, घटना को एक निश्चित आकार दे रहा है|

जीवन में बहुत सारी घटनाओं के सन्दर्भ में इस बात को समझा जा सकता है|

ओशो महावीर के जीवन के सहारे अपनी बात कहते हैं|

महावीर के जीवन में एक घटना का उल्लेख है, जिस पर एक बहुत बड़ा विवाद चला। और महावीर के अनुयायियों का एक वर्ग टूट गया। और पाँच सौ महावीर के मुनियों ने अलग पंथ का निर्माण कर लिया उसी बात से। महावीर कहते थे जो हो रहा है वह एक अर्थ में हो ही गया है। अगर आप चल पड़े तो एक अर्थ में पहुंच ही गए।  अगर आप बूढ़े हो रहे है तो एक अर्थ में बूढ़े हो ही गए।

      महावीर कहते थे, जो हो रहा है, जो क्रियमाण है—वह हो ही गया। महावीर का एक शिष्‍य वर्षा काल में महावीर से दूर जा रहा था। उसने अपने एक शिष्‍य को कहा कि मेरे लिए चटाई बिछा दो। उसने चटाई बिछानी शुरू की। मुड़ी हुई, गोल लिपटी हुई चटाई को उसने थोड़ा सा खोला, तब महावीर के उस शिष्‍य को ख्‍याल आया कि ठहरो, महावीर कहते है—जो हो रहा है वही हो ही गया। तू आधे में रूक जा, चटाई खुल तो रही है, लेकिन खुल नहीं गयी है—रूक जा।
      उसे अचानक ख्‍याल हुआ कि यह तो महावीर बड़ी गलत बात कहते हे। चटाई आधी खुली है, लेकिन खुल कहां गई है। उसने चटाई वहीं रोक दी। वह लौटकर वर्षा काल के बाद महावीर के पास आया और उसने कहा कि आप गलत कहते है कि जो हो रहा है, वह हो ही गया। क्‍योंकि चटाई अभी भी आधी खुली रखी है—खुल रही थी, लेकिन खुल नहीं गई। तो मैं आपकी बात गलत सिद्ध करने आया हूं। महावीर न उससे जो कहा,वह नहीं समझ पाया होगा, वह बहुत बुद्धि का राह होगा, अन्‍यथा ऐसी बात लेकर नहीं आता।
      महावीर ने कहा, तूने रोका—रोक ही रहा था….ओर रूक ही गया। वह जो चटाई तू रोका—रोक रहा था…रूक गया। तूने सिर्फ चटाई रुकते देखी,एक और क्रिया भी साथ चल रही थी, वह हो गयी। और फिर कब तक तेरी चटाई रुकी रहेगी। खुल नी शुरू हो गयी है—खुल ही जाएंगी….तू लोट कर जा वह जब लौटकर गया तो देखा  एक आदमी खोलकर उस पर लेटा हुआ है। विश्राम कर रहा था। इस आदमी ने सब गड़बड़ कर दिया। पूरा सिद्धांत ही खराब कर दिया।
      महावीर जब यह कहते थे जो हो रहा है वह हो ही गया तो वह हय कहते थे, जो हो रहा है वह तो वर्तमान है, जो हो ही गया वह भविष्‍य है। कली खिल रही है। खिल ही गई—खिल ही जाएगी। वह फूल तो भविष्‍य में बनेगी, अभी तो खिल ही रही है। अभी तो कली ही है। जब खिल ही रही है तो खिल ही जाएगी। उस का खिल जाना भी कहीं घटित हो गया।
      अब इसे हम जरा और तरह से देखें, थोड़ा कठिन पड़ेगा।
      हम सदा अतीत से देखते है। कली खिल रही है। हमारा जो चिन्‍तन है, आमतौर से पास्‍ट ओरिएंटेड़ है, वह अतीत से बंधा है। कहते है कली खिल रही हे, फूल की तरफ जा रही है। कली फूल बनेगी…लेकिन इससे उल्‍टा भी हो सकता है। यह ऐसा है जैसे मैं आपको पीछे से धक्‍के दे रहा हूं, आपको आगे सरका रहा हूं। ऐसा भी हो सकता है कोई आपको आगे खींच रहा हो। गति दोनों तरफ हो सकती है। मैं आपको पीछे से धक्‍का दे रहा हूं,और आप आगे जा रहे हो।
      ज्‍योतिष का मानना है कि यह अधूरी है दृष्टि कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य हो रहा हे।
पूरी दृष्‍टि यह है कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य खींच रहा है। कली फूल बन रही है,इतनी ही नहीं—फूल कली को फूल बनने के लिए पुकार रहा है। खींच रहा है, भविष्‍य आगे हे। अभी वर्तमान के क्षण में एक कली है। पूरा अतीत धक्‍का दे रहा हे। खुल जाओ। पूरा भविष्‍य आह्वान दे रहा है, खुल जाओ, अतीत और भविष्‍य दोनों के दबाव में कली फूल बनेगी।
      अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत अकेला फूल न बना पाएगा। क्‍योंकि भविष्‍य में आकाश चाहिए फूल बनने के लिए। भविष्‍य में जगह चाहिए स्‍पेस चाहिए। भविष्‍य स्‍थान दे तो ही कली फूल बन पाएगी। अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत कितना ही सिर मारे, कितना ही धक्‍का माने—मैं आपको पीछे से कितना ही धक्‍का मारू, या दूँ।  लेकिन सामने एक दीवार हो तो मैं आपको आगे न हटा पाऊँ गा। आगे जगह चाहिए। मैं धक्‍का दूँ और आगे की जगह आपको स्‍वीकार कर ले, आमंत्रण दे-दे कि आ जाओ,अतिथि बना लें, तो ही मेरा धक्‍का सार्थक हो पाए। मेरे धक्‍के के लिए भविष्‍य में जगह चाहिए। अतीत काम करता है भविष्‍य जगह देता है।
      ज्‍योतिष की दृष्‍टि यह है कि अतीत पर खड़ी हुई दृष्‍टि अधूरी है, आधी—वैज्ञानिक हे, भविष्‍य पूरे वक्‍त पुकार रहा है, पूरे वक्‍त खींच रहा है। हमें पता नहीं हमें दिखाई नहीं पड़ता। यह हमारी आँख की कमजोरी है, यह हमारी दृष्‍टि की कमजोरी है। हम दूर नहीं देख पाते हमें कल कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।

ओशो की इस दृष्टि को हम आज के भारत पर लागू करें तो भारत से गलत को, बुराई को, भ्रष्टाचार को हटाने का जो कार्य शुरू हुआ है वह रुकेगा नहीं और अपनी पूर्णता को प्राप्त करके रहेगा| अगर ऐसी संभावना न होती तो इतना भी न होता|

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अगस्त 25, 2013

मैं वर्तमान हूँ !

मैं जीवन के बीते समय पर पछतावा कर रहा था

और आने वाले समय के प्रति भयभीत हो रहा था,

अचानक, मैंने सुना,

मेरा ईश्वर बोल रहा था ,

“मेरा नाम “वर्तमान” है”|

वह रुका, मैंने इन्तजार किया,

उसने फिर बोलना शुरू किया,

“जब तुम भूतकाल में जीते हो,

बीते समय में की गई गलतियों और पछतावों के साथ,

तब मुश्किल हो जाती है मेरे लिए,

मैं ऐसे माहौल में नहीं रह सकता|

मेरा नाम ” भूत” नहीं है|”

“जब तुम भविष्य में जीते हो,

आने वाली समस्याओं और भय की कल्पनाओं के साथ,

तब भी बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है,

मैं वहाँ भी नहीं रहता,

मेरा नाम “भविष्य” नहीं है|”

जब तुम इसी क्षण में,

-जो तुम्हारे सामने है,

जीते हो,

तब कतई कोई मुश्किल मेरे लिए नहीं होती,

मैं यहीं रहता हूँ,

मेरा नाम “वर्तमान” है|”

[I Am by Helen Mallicoat]

फ़रवरी 2, 2011

मुल्ला नसरुद्दीन : लंका में सभी बावन गज के

बात उन दिनों की है जब मुल्ला नसरुद्दीन को एक प्रदेश के शिक्षा विभाग ने कुछ समय के लिये इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स के पद पर ससम्मान आमंत्रित करके नियुक्त्त किया था और नसरुद्दीन ने देश के विकास में शिक्षा के मह्त्व को देखते हुये यह जिम्मेदारी अपनाने की स्वीकृति दे दी थी। उन्होने शिक्षा विभाग को कहा कि विभाग को सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा के स्तर को सुधारना चाहिये। वे प्रदेश भर के प्राथमिक स्कूलों के दौरे करने लगे। आज यहाँ तो कल वहाँ। साल के किसी दिन अवकाश न था उन्हे।

सारे दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर

उनका तो अटल विश्वास था ’कर्म ही पूजा है’ के सिद्धांत पर। किसी तरह की बाधा उन्हे न रोक पाती।

उसके बाद उन्होने दसवीं और बारहवीं तक के विद्यालयों के दौरे किये। उन्होने अपने इन तूफानी दौरों के दौरान सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, निजी, गरीब और धनी स्कूलों एवम विद्यालयों के इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, दर्शन शास्त्र और अर्थशास्त्र के कला और विज्ञान को गहराई से खंगाला।

इन यात्राओं से उपजे ज्ञान को देश के चहुँमुखी विकास और इसकी एकता और अखंडता की मजबूती के लिये उपयोग में लाने के लिये उन्होने राज्य सरकार को बेशकीमती सुझावों से भरी रिपोर्ट सौंपी। अगर मुल्ला नसरुद्दीन की रिपोर्ट पहले राज्य और बाद में समूचे देश में लागू हो जाती तो देश की दशा और दिशा ही और होती। पर राजनीतिज्ञों से ऐसी आशा रखनी कि वे विशुद्ध देश हित में कोई काम करेंगे ऐसा है कि जैसे कोई बरसते सावन में बिना छाते के बाहर निकल पड़े और सोचने लगे कि भीगेगा नहीं या कोई शराब का तबियती शौकीन दूरदराज से आती बेग़म अख्तर की आवाज में सुनकर कि

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब

हाथ में बड़े बड़े जग आदि लेकर बरसात में खड़े हो जायें और बाद में निराश होकर बरसात को और उस आदमी को गालियाँ दें जो बेग़म की गज़ल सुन रहा था।

मुल्ला नसरुद्दीन की बुनियादी सिफारिशें थीं कि देश के बच्चे देश की जिम्मेदारी हैं और ये बच्चे ही आने वाले भविष्य की दुनिया को संवार सकते हैं और हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने की एक जैसी सुविधा मिलनी चाहिये। अगर प्राथमिक स्कूल के स्तर पर ही बच्चों में धन, जाति और सम्प्रदाय के भेद होने लगेंगे तो यह बात भूल जानी चाहिये कि बड़े होकर वे इन भेदभावों से ऊपर उठ पायेंगे। ऐसा कभी नहीं हो पायेगा और देश के संसाधन, ऊर्जा और विचारशक्त्ति जैसे सभी बहुमूल्य गुण इन झगड़ों से निबटने में ही नष्ट होती रहेंगे और देश और इसके वासी पिछड़े ही रहेंगे।

शिक्षा सरकार का सबसे परम कर्त्तव्य होना चाहिये और सरकार को सबसे अच्छे स्कूल और विद्यालय खुद खोलने चाहिये और देश के सभी बच्चों को उनमें ही पढ़ाया जाये।

प्रदेश सरकार ने मुल्ला नसरुद्दीन की सिफारिशों पर कान न रखे।

सरकारें यदि देशहित में शिक्षा पद्यति लागू कर दें तो शिक्षा के क्षेत्र में घुसपैठ करके लाखों करोड़ रुपये कमा रहे माफियाओं का क्या होगा। समाज खुद नहीं चाहता कि बच्चों से भेदभाव खत्म हो अतः लोग खुद पसंद करते हैं कि आर्थिक, जाति और सम्प्रदाय के आधार पर बने स्कूल और विद्यालयों में ही उनके बच्चे पढ़ें ताकि उनके झूठे अहं बने रहें।

बहरहाल मुल्ला नसरुद्दीन ने जिस काम में अपना समय और अपनी ऊर्जा झौंकी वह प्रयास उस समय तो सफल न हो पाया, हो सकता है कि कभी ऐसा भी देश में हो जाये। आशा का साथ छोड़ना मनुष्य के लिये संभव नहीं।

नसरुद्दीन जीवन के किसी भी क्षेत्र से हास्य की बात खोज ही लेते थे। अपने इन दौरों से जुड़ी बहुत सारी मजेदार बातें वे बताया करते थे और उनमें से बहुत सारी बातें चुटकलों के रुप में प्रसिद्ध हो चुकी हैं। भले ही लोग जानते न हों कि इन चुटकलों की शुरुआत मुल्ला नसरुद्दीन ने ही की थी।

अपने इन दौरों से जुड़ा एक मजेदार वाक्या वे सुनाते थे।

एक बार वे किसी पर्वतीय इलाके में बड़े ही दुर्गम स्थल पर स्थित एक स्कूल का दौरा करने पहुँच गये। उस दूरदराज के स्कूल में कभी कोई अधिकारी नहीं गया था पर मुल्ला तो कवियों एवम रवि से भी ज्यादा कुशल थे और जहाँ रवि और कवि भी न पहुँच पायें वे वहाँ भी पहुँच जाते थे।

नसरुद्दीन तो उस जगह के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गये। प्रकृति ने हर तरफ अपने सौंदर्य का ऐसा जलवा बिखेर रखा था कि आँखें हटती ही न थी। हवा में ऐसी ताजगी थी कि साँस लेने में भी आनंद की अनुभूति होती थी। आंनदविभोर नसरुद्दीन स्कूल में प्रवेश करते ही प्रधानाध्यापक के कक्ष में गये और उन्हे अपना परिचय देते हुये कहा कि वे अकेले ही कक्षाओं का मुआयना करेंगे और अध्यापकों को बताकर परेशान और सचेत न किया जाये।

छोटा सा स्कूल था। नसरुद्दीन कक्षाओं के बाहर से ही अध्यापकों एवम विधार्थियों को आपस में संवाद करते हुये देखते और सुनते रहे। तभी उनकी दृष्टि बाहर मैदान में पेड़ के नीचे बैठे कुछ बच्चों पर पड़ी। वे वहाँ पहुँचे और बच्चों से पूछा कि वे वहाँ क्यों बैठे हैं तो एक बच्चे ने बताया कि यहाँ उनकी अंग्रेजी की क्लास लग रही है।

नसरुद्दीन ने पूछा,” और आपके टीचर कहाँ हैं?”

जी, वे अभी आ जायेंगे। कल गिर गये थे हाथ में फ्रैक्टर हो गया था, उसी के लिये पास के अस्पताल से होकर स्कूल आने को बोल गये थे।

नसरुद्दीन बच्चों से बातें करने लगे।

कुछ देर बाद उन्होने ध्यान दिया कि बच्चे अंग्रेजी शब्दों को उनके मूल उच्चारण के साथ न बोलकर उन्हे उनके लिखने के आधार पर उच्चारित कर रहे हैं। मसलन ’अम्ब्रेला’ को कुछ ’यूम्बरेला’ बोल रहे थे और कुछ ’उम्ब्रेला’, ’स्टडी’ को ’स्टयूडी’ या ’स्टूडी’, ’गोट’ को ’जोट’ बोल रहे थे। अंग्रेजी की वर्णमाला में जो वर्ण जैसा उच्चारित किया जाता है वे शब्दों में भी उसे लगभग वैसा ही बोल रहे थे।

नसरुद्दीन ने सोचा कि टीचर से ही बात करेंगे। सो वे बच्चों से कहने लगे कि यहाँ चारों तरफ कितनी प्राकृतिक सुंदरता फैली हुयी है। उन्होने एक बच्चे से पूछा कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?

’जी नेटूर’

’नेटूर’?

’जी हाँ नेटूर’

’इसकी स्पेलिंग बता सकते हो’?

जी हाँ… एन ए टी य़ू आर इ ।

तब तक टीचर भी हाथ में प्लास्टर चढ़वाये हुये वहाँ आ गये। प्रधानाध्यापक ने उन्हे मुल्ला नसरुद्दीन के दौरे के बारे में बता ही दिया था। आते ही वे नमस्कार करके मुस्कुराते हुये खड़े हो गये।

नसरुद्दीन ने उनका हाल पूछा, हाथ के बारे में पूछा और फिर उसी बच्चे से कहा कि अब फिर से बताये कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं और उस अंग्रेजी शब्द की स्पेलिंग क्या है?

बच्चे ने फिर से दोहरा दिया।

नसरुद्दीन ने टीचर की ओर देखा। टीचर बच्चे की तरफ गर्व से मुस्कुराकर देख रहे थे। शाबास बेटा।

नसरुद्दीन ने दोहराया, एन ए टी य़ू आर इ, इन सबसे मिलकर क्या बना।

सब बच्चों ने समवेत स्वर में नारा लगाया और उनके साथ साथ उनके टीचर ने भी स्वर मिलाया, ” एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर”।

नसरुद्दीन के मस्तक पर पसीने की नमी आ गयी। पर वे अपने भावों पर नियंत्रण कर गये।

अच्छा बच्चों पढ़ाई करो।

टीचर से विदाई लेकर नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक के कक्ष में आ गये। वे कुछ क्रोधित भी थे। उन्होने प्रधानाध्यापक से कहा,” महोदय आपके स्कूल के अंग्रेजी के अध्यापक, कैसी अंग्रेजी बच्चों को पढ़ा रहे हैं।”

अच्छी अंग्रेजी पढ़ाते हैं श्रीमान।

कैसी अंग्रेजी पढ़ाते हैं, वे बच्चों को शब्दों का सही उच्चारण भी नहीं सिखाते। एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर, पढ़ाते हैं। इच्छा तो हो रही है कि उनकी शिकायत लिखूँ।

प्रधानाध्यापक निवेदन करने लगे,” नहीं श्रीमान ऐसा न करें, घर में अकेला कमाने वाला है। बेचारे का फुटूर बिगड़ जायेगा”।

’फुटूर’ सुनकर तो नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक का चेहरा देखते रह गये।

वहाँ सुधार का प्रबंध तो उन्होने किया ही। बाद में जब वे यह किस्सा सुनाते थे तो कहते थे कि इसलिये कहा जाता है कि लंका में सभी बावन गज के।

…[राकेश]

मई 16, 2010

जीवन बस यहीँ अभी

मन ही मन दुखी तो वह पहले से ही रहता था पर जब से उसने सस्ते दामों पर मिल जाने वाली ज्योतिष की एक किताब में पढ़ लिया था कि उस जैसे जातक अपने किये कामों और भूलों के कारण पछताते रहते हैं तब से तो उसने दुख को ही अपने जीवन का ऐसा भाव मान लिया था जो उसके साथ ताउम्र रहने वाला था।

हरदम उसे यही लगता था कि उसने जिन्दगी में हर काम या तो गलत किया है या गलत तरीके से किया है। आशा की इतनी किरण उसके अंदर जरुर थी कि आधे समय वह इस ख्याल से भी भरा रहता था कि यदि उसे मौका मिल जाये तो वह अपनी जिन्दगी में पीछे जाकर इस इस कदम को सुधार ले और अपनी जिन्दगी को खुशहाल बना ले।

उसे लगता था कि यदि उसने वैसा न करके ऐसा किया होता या ऐसा न करके वैसा किया होता तो वह भी आज बहुत सफल और खुशहाल व्यक्तियों की जमात में शामिल होता।

जीवन ऐसे ही निराशाभाव से घिरे घिरे रह कर कट रहा था पर एक दिन चमत्कार हो गया। सोकर उठने पर उसने अपने आप को एक अंजान जगह पर पाया। उसके सामने एक मशीन रखी थी। जैसे ही वह उठ कर मशीन के पास गया, उसे सुनायी दिया।

वत्स यह टाइम मशीन है इसकी सहायता से तुम भूत और भविष्य दोनों में जा सकते हो।

अंधा क्या चाहे दो आँखे। उसे तो अपने कानों पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। जिस बात को वह कबसे करना चाहता था उसे करने की सुविधा खुद उसके पास चल कर आयी थी।

उसने भूतकाल वाला बटन दबाया तो स्क्रीन पर लिखा आया, “तुम चाहो तो भूतकाल में जाकर अपने जीवन में उठाये उन कदमों को मनमाफिक सुधार सकते हो जिन्हे तुम आज गलत कदम समझते हो

रोमांच से काँपता हुआ वह आँखे बंद करके मशीन के पास बैठ गया। उसके अब तक जीवन में बीते क्षणों और बीती घटनाओं की यादें उसके सामने से गुजरने लगीं।

कुछ देर बाद उसने आँखे खोलीं पर जाने उसे क्या हुआ उसके हाथ मशीन को छूने के लिये उठे ही नहीं। पहली बार उसे अहसास हुआ कि उसने जैसी भी जी एक घटनाप्रधान जिन्दगी जी जो कि औरों से अलग थी। अगर वह पीछे जाकर कुछ कदम बदल देता है तो वह यही आदमी नहीं होगा जो कि वह अब है। तब वह कोई दूसरा ही आदमी होगा। अगर उसमें इतनी ही खराबियाँ होतीं तो प्रकृति उसे अब तक जिन्दा ही क्यों रखती?

भूत का बोझ हटते ही वह चंचल हो उठा और उसने सोचा कि क्यों न भविष्य में जाकर देखा जाये। पर भविष्य में प्रक्षेपित होने से पहले उसने मशीन पर भविष्य का समय देखने की सुविधा में सौ साल बाद का समय देखने का विकल्प दबा दिया।

स्क्रीन पर दिखते माहौल में उसे सब कुछ अलग सा लगा। लोग और किस्म के लगे। सौ साल बाद जीने वाले लोगों के बीच उसने अपने को चुके हुये जमाने का आदमी पाया। आज का कोई भी परिचित, मित्र, रिश्तेदार या घर के लोगों में से कोई भी उसके साथ नहीं होगा ऐसा खयाल आते ही उसे लगा कि वह निपट अकेला पड़ जायेगा नये जमाने में।

पहली बार उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि उसका अपने समय के संसार से एक विशिष्ट सम्बंध है और वह अपने युग का प्रतिनिधि है। उसे केवल अभी इसी समय धरा पर जीवित होना था। न पहले न बाद में।

उसने खुशी खुशी टाइम मशीन को त्याग दिया।

वह निद्रा से जागा। अंदर और बाहर दोनों तरफ एक जाग्रति आ गयी। जीवन के प्रति उसकी धारणा ही बदल गयी।

पहली बार उसे “भूतो न भविष्यति” का अर्थ समझ में आया।

पहली बार उसने अपने आप को स्वीकार किया।

पहली बार उसने अपने अंदर आनन्द की झलक देखी।

…[राकेश]

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