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अगस्त 9, 2016

रूरल डेवेलपमेंट … (महात्मा गाँधी)

“भारत गाँवों में बसता है, अगर गाँव नष्ट होते हैं तो भारत भी नष्ट हो जायेगा|

इंसान का जन्म जंगल में रहने के लिए नहीं हुआ बल्कि समाज में रहने के लिए हुआ है|

एक आदर्श समाज की आधारभूत ईकाई के रूप में हम एक ऐसे गाँव की कल्पना कर सकते हैं जो कि अपने आप में तो स्व-निर्भरता से परिपूर्ण हो, पर जहां लोग पारस्परिक निर्भरता की डोर से बंधे हुए हों| इस तरह का विचार पूरे संसार में फैले मानवों के बीच एक संबंध कायम करने की तस्वीर प्रस्तुत करता है|

ऐसा कुछ भी शहरों को उत्पादित करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए जो कि हमारे गाँव उत्पादित कर सकते हों|

स्वतंत्रता बिल्कुल नीचे के पायदान से आरम्भ होनी चाहिए|

और इसीलिए हरेक गाँव को स्व:निर्भर होना ही चाहिए और इसके पास अपने सभी मामले स्वंय ही सुलझाने की क्षमता होनी चाहिए|

गांवों की ओर लौटना ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है|

मेरा आदर्श गाँव मेरी कल्पना में वास करता है|

एक ग्रामीण को ऐसे जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए जैसे किसी मलिन अँधेरे कमरे में कोई जानवर रहता है|

मेरे आदर्श गाँव में मलेरिया, हैजा और चेचक जैसी बीमारियों के लिए कोई जगह नहीं होगी| वहाँ कोई भी सुस्ती, काहिली से घिरा और ऐश्वर्य भोगने वाला जीवन नहीं जियेगा|

मेरा स्पष्ट विचार है कि यदि भारत को सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करनी है और भारत के माध्यम से पूरे संसार को सच्ची स्वतंत्रता का स्वाद चखना है तो हमें गाँवों में झोंपडों में ही रहना होगा न कि महलों में|

गाँव की पंचायत स्थानीय सरकार चलाएगी| और इनके पास पूर्ण अधिकार होंगे| पंचायत के पास जितने ज्यादा अधिकार होंगे उतना लोगों के लिए अच्छा होगा|

पंचायतों का दायित्व होगा कि वे ईमानदारी कायम करें और उधोगों की स्थापना करें|

पंचायत का कर्तव्य होगा कि वह ग्रामीणों को सिखाये कि वे विवादों से दूर रहें और उन्हें स्थानीय स्तर पर ही सुलझा लें|

यदि हमने सच्चे रूप में पंचायती राज की स्थापना कर दी तो हम देखेंगें कि एक सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा और जहां पर कि सबसे नीची पायदान पर खड़ा भारतीय भी ऊँचे स्थानों पर बैठे शासकों के समां बर्ताव और अधिकार पायेगा|

मेरे आदर्श गाँव में परम्परागत तरीके से स्वच्छता के ऊँचे मानदंड स्थापित होंगे जहां मानव और पशु जनित कुछ भी ऐसी सामग्री व्यर्थ नहीं फेंकी जायेगी जो कि वातावरण को गंदा करे|

पांच मील के घेरे के अंतर्गत उपलब्ध सामग्री से ही ऐसे घर बनाए जायेंगें जो कि प्राकृतिक रूप से ही हवा और रोशनी से भरपूर हों| इन घरों के प्रांगणों में इतनी जगह होगी कि ग्रामीण वहाँ अपने उपयोग के लिए सब्जियां उगा सकें और अपने पशु रख सकें|

गावों की गालियाँ साफ़ सुथरी और धूल से मुक्त होंगी|  हर गाँव में पर्याप्त मात्रा में कुंएं होंगे जिन तक हर गांववासी की पहुँच होगी|

सभी ग्रामीण बिना किसी भेदभाव और भय के पूजा अर्चना कर सकें ऐसे पूजा स्थल होंगें| सभी लोगों के उठने बैठने के लिए एक सार्वजनिक स्थान होगा| पशुओं के चारा चरने के लिए मैदान होंगे| सहकारी डेरी होगी| प्राथमिक और सेकेंडरी स्कूल होंगे जहां व्यावहारिक क्राफ्ट्स और ग्राम-उधोगों की पढ़ाई मुख्य होगी| गाँव की अपनी एक पंचायत होगी जो इसके सभी मामले सुलझाएगी| हरेक गानव अपने उपयोग के लिए दूध, अनाज, सब्जियों, फलों और खाड़ी एवं सूती वस्त्रों का उत्पादन करेगा|

सबको इस बात में गर्व महसूस करना चाहिए कि वे कहीं भी और कभी भी उन उपलध वस्तुओं का प्रयोग करते है जो गाँवों में निर्मित की गयी हैं| अगर ठीक ढंग से प्रबंधन किया जाए तो गाँव हमारी जरुरत की सभी वस्तुएं हमें बना कर दे सकते हैं| अगर हम एक बार गानव को अपने दिल और दिमाग में स्थान दे देंगें तो हम पश्चिम का अंधा अनुकरण नहीं करेंगें और मशीनी औधोगीकरण की ओर अंधे बन कर नहीं भागेंगें|”

 

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जुलाई 25, 2011

फाइबर : अच्छे पाचन-तंत्र की युक्त्ति

आंतों को स्वस्थ रखने और कैंसर जैसी प्राण-घातक बीमारी से बचाने की विधि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिये भी चिंतन का विषय है। मनुष्य इतना ज्यादा जंक फूड और मीट आदि खाता है कि उसकी आंतों की स्वस्थता एक बड़ा मसला बन जाती है।
आयुर्वेद की भांति आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी अब Animal Food के बजाय Plant Food को तरजीह देने लगा है। खायी हुयी कोई भी खाद्य-सामग्री आंतों से गुजर कर जाती है और खाद्य-सामग्री में उपस्थित अघुलनशील फाइबर roto-rooter की तरह से कार्य करता हुआ पचने से बचे हुये बेकार अवशेषों और शरीर के लिये जहरीले तत्वों को शरीर से बाहर करने में मुख्य भूमिका निभाता है। खाद्य-सामग्री में फाइबर की मात्रा पर्याप्त न होने से कब्ज हो सकता है और अगर किसी को 24 घंटे तक एक बार भी हाजत नहीं होती तो उसे अपनी भोजन सामग्री में फाइबर की कम मात्रा के बारे में चिंतन करना चाहिये और इस मात्रा को कई गुना बढ़ा देना चाहिये।

कई दशकों पहले तक भारत में बहुत ज्यादा चोकर डालकर रोटी सेकी जाती थी जबकि उस समय के लोग शारीरिक श्रम आज के भारतीयों के मुकाबले ज्यादा करते थे, पैदल ज्यादा चलते थे। आज के भारतीय का जीवन आरामतलब हो गया है और गेहूँ का आटा चोकर रहित होकर मैदा बन गया है।

आज के मशीनी सहायता से चलने वाले दौर में ज्यादा अघुलनशील फाइबर भोजन का आवश्यक अंग होना चाहिये और मनुष्य को ऐसे फाइबर को भोजन के साथ ग्रहण करके बाद में पूरे दिन काफी मात्रा में पानी पीना चाहिये।

घुलनशील फाइबर पाचन-तंत्र से रक्त्त में मिश्रित होकर arteries और veins की दीवारों से cholesterol, fats और plaque को हटाता है जिससे कि ब्लड-प्रैशर और दिल की बीमारी से बचाव होता है।

मीट, मछली, अंडों, पोल्ट्री और डेरी पदार्थों जैसी खाद्य-सामग्रियों को खाने से यथासंभव बचना चाहिये और अगर ऐसा न हो सके तो इनकी मात्रा धीरे-धीरे काफी कम कर देनी चाहिये।

फलों, सब्जियों, अनाज, सीडस, बीन्स, और मेवों में फाइबर होता है अतः इनका अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिये और ये खाद्य-पदार्थ फाइबर-सप्लीमेंट्स से हर तरह से श्रेष्ठ विकल्प हैं। इनमें विटामिन्स और मिनरल्स भी ज्यादा होते हैं जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायता करते हैं।

रेड मीट (पोर्क, बीफ, बकरा, लैम्ब) और प्रोसेस्ड मीट (हैम, सलामी, हॉट डॉग, एवम सौसेसेज़ आदि) को एकदम तिलांजलि देनी चाहिये। शोध बताते हैं कि इन्हे खाने से आंतों के कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है।

अच्छे पाचन-तंत्र को बनाये रखने के लिये नियमित रुप से व्यायाम या शारीरिक श्रम आवश्यक है। सारे समय का आरामतलब जीवन और अच्छा पाचन-तंत्र नदी के दो किनारों के समान हैं जो मुश्किल से ही मिल सकते हैं।

(चिकित्सा विज्ञान और खाद्य-सामग्री  संबंधी लेखों में दी जानकारी पर आधारित)

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