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अगस्त 14, 2010

पाकिस्तान : बाढ़ का प्रकोप – चंद तस्वीरें

प्रकृति का प्रकोप मानव को यदा कदा सहना ही पड़ता है और ऐसे समय मानव विवश खड़ा दिखायी देता है। विकसित देश अपनी सामर्थ्य और बेहतर प्रबंधन के बलबूते अपनी जनता को कम से कम हानि और परेशानी पहुँचने देते हैं जबकि विकासशील और गरीब देशों में प्राकृतिक प्रकोप कहर बन कर लोगों पर टूट पड़ता है।

इन गरीब और विकासशील देशों का दुर्भाग्य है कि सर्दी, गरमी और बरसात तीनों ही तरीके के मौसम में इन्हे प्राकृतिक प्रकोप की विभीषिका सहनी पड़ती है। प्रकृति के साथ मानव की छेड़छाड़ भी इन प्राकृतिक प्रकोपों को जब तब आमंत्रण देती रहती है।

इन विभीषिकाओं से परे सरकारों का प्रबंधन विचार करने का मुद्दा है।

नीचे दिये गये लिंक में दी गयी तस्वीरें देखें और बाढ़ के द्वारा दर्शायी गयी विनाश लीला को देखें।
चित्र इतने सजीव हैं मानो हरेक चित्र चित्कार कर रहा हो।

पाकिस्तान में बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों की तस्वीरें

ऐसे समय एक प्रश्न तो उठता ही है कि उसकी बेहतरीन कला की तारीफ कैसे करें क्योंकि कला एक भयानक ट्रेजडी से उत्पन्न दुख और पीड़ा  को उसके नग्न रुप में हमारे सम्मुख रख रही है। इतना विनाश देख कर पीड़ित हो चुके दिल और दिमाग तारीफ करने के काबिल नहीं रहते।

इन चित्रों से कहीं लगता है कि पाकिस्तान कुछ अलग है हमारे भारत से या वहाँ के लोग अलग हैं?

ऐसे ही लाचार लोग वहाँ भी हैं जैसे हमारे यहाँ।

बच्चों के गालों पर आँसू ऐसे ही सूख गये हैं जैस हमारे यहाँ सूख जाते हैं।

कुछ समय पूर्व प्रकाशित, श्री कृष्ण बिहारी जी की कविता मेरे गाँव का मुकद्दर कितना सटीक चित्रण करती है ऐसे माहौल का!

जुलाई 2, 2010

मेरे गाँव का मुकददर- (कृष्ण बिहारी)

हवाओं ने उड़ा दिये छ्प्पर
बौछारों ने गिरा दी भीतें
और उजड़ गये मेरे गाँव के घर।

ऊपर बादलों से भरा है मौसम
नीचे पानी ही पानी
सब कुछ एक बार फिर गया बिखर।

पिछली बार पड़ा था सूखा
चिटक गयी थी जमीन
मर गये थे मेरे गाँव के जानवर।

अबकी आई है बेतहाशा बाढ़
पानी उतरेगा नदी के पेट में महीनों बाद
तब तक किधर रहेंगे बेघर।

सरकारी पूड़ियों के पैकेट
जब गिराये जायेंगे
हेलीकॉप्टर से
लोग उन्हे खायेंगे
अपनों से लूट कर।

सुनता आ रहा हूँ जन्म से
देखता आया हूँ होश सम्भालने के बाद
यही है मेरे गाँव का मुकददर।

{कृष्ण बिहारी}

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