Posts tagged ‘fear’

जून 5, 2014

लोकतंत्र … James Mercer ‘Langston Hughes’

लोकतंत्र नहीं आएगा Langston Hughes

आज,

इस साल,

या और कभी

…समझौतों और भय के द्वारा तो कभी नहीं आएगा! 

 

मेरा भी उतना ही अधिकार है

जैसे किसी और का है

अपने पैरों पर खड़े होने का

और जमीन का टुकड़ा लेने का!

 मैं थक जाता हूँ

लोगों को कहता पाकर –

कि सभी बातों को वक्त लेने दो,

वे खुद से हो जाएँगी

कल किसने देखा है?

मुझे मरने के बाद स्वतंत्रता नहीं चाहिए

मैं कल के सपन पर जिंदा नहीं रह सकता!

स्वतंत्रता

एक बेहद शक्तिशाली बीज है

को कि

बोया जाता है

सबसे ज्यादा जरुरत के समय! 

मैं भी यहाँ रहता हूँ

मुझे स्वतंत्रता चाहिए

जैसे कि तुम्हे चाहिए!

–  Langston Hughes –

(February 1, 1902 – May 22, 1967)


 

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अप्रैल 7, 2013

मैं फिर भी उठ खड़ी होऊँगी – MAYA ANGELOU

तुम मुझे पराजित हुआ
साबित कर सकते हो इतिहास के पन्नों में
अपनी कड़वाहट और तोड़े मरोड़े झूठों के जरिये
तुम मुझे धूल -धूसरित कर सकते हो
पर मैं तब भी धूल की तरह ही उठ जाउंगी|

क्या मेरी जीवंतता तुम्हे विचलित करती है?
तुम निराशा के गर्त में क्यों गिरे हुए हो?
क्योंकि मैं ऐसे चलती हूँ
मानों मेरे पास तेल के कुएँ हों,
जो मेरे ड्राइंगरूम में तेल उगलते हैं,
चाँद और सूरज की तरह,
ज्वार की निश्चितता के साथ,
जैसे आशाओं का बसंत खिल आया हो,
मैं फिर भी उठ जाऊँगी|

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे?
झुके हुए सिर और नीची निगाहों के साथ खड़ा हुआ?
कंधे ऐसे गिरे हुए जैसे आंसूं की बूँदें,
ह्रदयविदारक विलाप से कमजोर हुयी?
क्या मेरे गर्वीले दावे तुम्हे अपमानजनक लगते हैं?
क्या तुम्हे घोर परेशानी नहीं होती मेरे वजूद को स्वीकार करने में,
क्योंकि मैं ऐसे हँसती हूँ
मानो मेरे पास सोने की खाने हों,
मेरे घर के पिछवाड़े में|

तुम मुझे अपने शब्दों से मार सकते हो,
तुम मुझे अपनी आँखों से काट सकते हो,
तुम मुझे अपनी घृणा से मार सकते हो,
पर तब भी, हवा की तरह, मैं फिर से उठ जाऊँगी |

क्या मेरा आकर्षक और कामुक व्यक्तित्व तुम्हे
विचलित करता है,
क्या यह एक आश्चर्य के रूप में तुम्हारे सम्मुख आता है
कि मैं ऐसे नृत्य करती हूँ
मानों मेरे पास हीरे हैं,
मेरी जंघाओं के मिलने की जगह पर|

मैं इतिहास की लज्जाजनक झोंपडियों से
उठ जाऊँगी,
मैं दुख से भरे बीते समय से
उठ जाऊँगी,
मैं एक काला महासागर हूँ,
चौड़ा और ऊँची उछाल लगाता हुआ,
ज्वार से उत्पन्न थपेडों को सहन करता हुआ|

मैं आतंक और भय की रातों को पीछे छोड़कर
उठ जाऊँगी
आश्चर्यजनक रूप से चमचमाते दिवस के रूप में
मैं उठ जाउंगी
अपने पूर्वजों द्वारा दिए गये उपहारों को लिए हुए
मैं गुलाम का स्वप्न हूँ,
उसकी आशा हूँ,
मैं उठ जाऊँगी
मैं उठ जाऊँगी
मैं उठ जाऊँगी

[ Still I Rise by Maya Angelou ]

 

जुलाई 18, 2011

दहशत

आजकल मै डरा हुआ हूँ
यह एक रचनाकार का डर है
शब्द ही नहीं मिलते मुझे कि
लिखूँ
विज्ञापन में नंगी देह दिखाती युवती की
विशेषतायें क्या हैं।
उसकी वाइटल स्टेटिस्टिक्स मुझे किस तरह
लुभाती है
कि मैं दो बच्चों का बाप,
और बच्चे भी बड़े हो गये हैं
किस तरह महसूसता हूँ ऐसे पलों को।

सुगंधित साबुन से नहाती युवती की
महकती देह
सुडौल गोल और चिकनी जाँघों को
सहलाना चाहता हूँ,
स्क्रीन पर ही सही
तो क्या यह पाप है?

मुझे औरत की छातियाँ और गोलाइयाँ
खींचती हैं अपनी ओर
उनके आधे-अधनंगे ब्लॉउजों में
जहाँतक झाँक सकता हूँ
डाल देता हूँ आँखें
दिखते सौन्दर्य को न देखना
उसका अपमान है।

सौन्दर्य भी तो वस्तु नहीं
आँखों में होता है
न देखूँ तो
आँखों का होना बेकार है।

मगर पूछना चाहता हूँ कि
इन ब्लॉउजों की डिजाइन
किसने की है?
जिसने की है
उसका मकसद क्या है?
और पहनने वालियाँ क्या
पाना चाहती हैं?

एक कॉम्प्लीमेंट कि
यू आर ब्यूटीफुल…
लुकिंग गॉर्जियस…
स्टनिंग…?
यकीन मानिये
बहुत सी महिलायें
इन्ही आधे-अधूरे वाक्यों से
हो जाती हैं
लहालोट।

फिर जो कुछ होता है
उसी को लिखना चाहता हूँ मैं
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते है
क्योंकि,
बाद की स्थितियों को
गंदगी उपजाने वाला यह लिथड़ा समाज
अश्लील कहता है।

घुटनों को मोड़कर
एड़ियों पर नितम्बों को टिकाए
बैठी जवान औरतों को
घूरने वाले
लपलपाती जीभ निकाले मर्दों को
जब देखता हूँ,
उन्ही में से मैं भी हूँ,
तो डर जाता हूँ
कि
एक दिन जब सारी गोलाइयाँ
लटककर झूल जायेंगी
हड्डियों से प्यार करता माँस
चिचुककर लटक जायेगा
तब वह कितनी खूबसूरत लगेगी
तब कितना खूबसूरत दिखूँगा मैं?

यह एक ऐसी दहशत है
जो जवान और सुंदर दिखती औरत को
मेरी नज़रों में एक पल में
अचानक बियावान और बदसूरत
बना देती है।

औरत, समाज और अपने बारे में
जो मैं कहना चाहता हूँ
लिखना चाहता हूँ
उसके लिये जितने शब्दों का प्रयोग करुँगा
वे सभी शब्द आज की भाषा में
असंसदीय हैं।

मैं डरा हुआ हूँ
शब्दों के प्रयोग से
कि कहीं माफी न माँगनी पड़े
आवारा ताकतों से
मैं गालियाँ देना चाहता हूँ सबको
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते।

{कृष्ण बिहारी}

मई 27, 2010

मन के भय

समय कभी ऐसे भी रंग दिखाता है
कि खुशियों से भरे क्षण भी
पूरा सुकून नहीं ला पाते|


मन अन्दर ही अन्दर चौंकता रहता है,
एक भय सा बैठ जाता है मन में
ऐसा लगने लगता है
जाने कब ठंडी बयार के झौंके बहने बंद हो जायेंगे
और निराशाएं, कुंठाएं हमेशा की
सिर उठा सामने खड़ी हो जायेंगी।

ऐसा क्यों होता है?
इसका पता तो चल नहीं पाता।

शायद साहस खोजना होता है गहरे में
अंदर कहीं अपने ही वजूद में
ताकि
कठिन वक्त के दौर में
व्यक्ति सीधा खड़ा हो सके पैरों पर,
दौड़ न भी पाए तो
कम से कम
धीरे धीरे चल तो सके।

…[राकेश]

मई 25, 2010

स्वयं की बुराइयों का भय

मन डरता है

गुलाब के उस फूल की भाँति

जिसे भय हो कि

जब उसे चाहने वाला

उसे छूने लगेगा

तो उसके हाथों में

कहीं काँटे न चुभ जायें

…[राकेश]

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