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जून 20, 2011

पिता तुम्हे याद करते हुये

हे पिता!
कितने वर्ष हो गये
तुम्हे इसी तरह कभी कभी याद करते हुये
जन्म से मृत्यु तक
तुम्हारा सघर्ष
सुना-जाना और देखा मैंने
अपराजेय काल से भी तो
खूब लड़े तुम,
उस एक पल के सिवा
कुछ भी तो नहीं झुका पाया तुम्हे
चाहा मैंने भी तो कितना
तुम्हे झुकाना
पराजित करना
पीढ़ियों के संघर्ष में
आपसी रण में
मगर समान ध्रुव थे हम
एक-दूसरे को दूर भगाने में ही
लगे रहे ताउम्र
पास आने की हर कोशिश में
दूर जाते रहे
और
अपनी असफलता को
विजय का सोपान समझ
मुस्कराते रहे हम
हार मानना
हमारे स्वभावों में नहीं
हार जाना
हमारी किस्मत में था
पर-
मैं तुम्हारा पुत्र
तुम्हारी तरह ही जिद्दी,
मैं समर से जूझूंगा
भले ही मारा जाऊँ अभिमन्यु की तरह
आशीर्वाद, अब तो दो
“वत्स, विजयी भवः”
मेरे लिये ईश्वर भी तुम
और देवता भी तुम।

हे पिता!
तुम्हारे सिवा
और किसकी ओर देखूँ मैं
संघर्ष के क्षणों में
तुम बहुत याद आते हो मुझे
कभी-कभी तो बहुत ज्यादा
जिस वक्त्त
लड़ रहा होता हूँ
मैं खुद से…

{कृष्ण बिहारी}

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