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अक्टूबर 14, 2015

उ.प्र में सूखा और किसानों की दुर्दशा: मुख्यमंत्री के नाम सुझाव-पत्र (योगेन्द्र यादव)

13 अक्टूबर 2015
श्री अखिलेश यादव,
मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय : उत्तर प्रदेश में सूखे के संकट से निपटने के लिए कुछ सुझाव

प्रिय अखिलेश जी,

स्वराज अभियान के जय किसान आंदोलन के तहत हम कुछ साथी विगत 2 अक्टूबर से देश के सूखाग्रस्त इलाकों की ‘संवेदना यात्रा’ पर हैं. इस सिलसिले में पिछले चार दिनों में हमने बाँदा, हमीरपुर, महोबा, चित्रकूट, कौशाम्बी, फतेहपुर, उन्नाव, रायबरेली, कानपुर नगर, कानपुर देहात, औरैया, इटावा और आगरा जनपदों के गाँवों में यात्रा की, और किसानों से बातचीत की. इसके अलावा जिन इलाकों में हम नहीं जा पाए, वहाँ कार्यरत संगठनों एवं व्यक्तियों से भी हमने सलाह मशविरा किया.
राज्य में सूखे की स्थिति के बारे में आपको नियमित रूप से सूचनाएं तो मिलती ही हैं, आपके पास इस जानकारी का कहीं बेहतर तंत्र है. फिर भी कई बार बड़े सरकारी सूचना तंत्र के बावजूद कुछ सूचनाएँ शीर्ष तक नहीं पहुँच पातीं. इसलिए मैं इस यात्रा के निष्कर्ष और उनके आधार पर कुछ सुझाव आपके सामने रख रहा हूँ. आशा है कि इसे आप अन्यथा नहीं लेंगे और इन रचनात्मक सुझावों पर गौर करेंगे.

देश के सबसे अधिक सूखे से प्रभावित जिलों के दौरे के बाद हमारी टीम दो निष्कर्षों पर पहुंची है. पहला यह कि इस राष्ट्रीय आपदा का केंद्र बिन्दु उत्तर प्रदेश है. इस बार उत्तर प्रदेश में औसत से 45 प्रतिशत कम वर्षा हुई है. वर्षा की कमी से देश में सर्वाधिक प्रभावित 30 जिलों में से 17 उत्तर प्रदेश से हैं. प्रदेश के कई इलाकों में लगातार दूसरे या तीसरे वर्ष सूखा पड़ रहा है. एक बहुत बड़े इलाके में खरीफ की फसल लगभग बर्बाद हो चुकी है. ज्यादातर इलाकों में किसान रबी की फसल बोने की स्थिति में भी नहीं है. पीने के पानी का संकट है. लोग पशुओं को बेच रहे हैं या यूँ ही छोड़ दे रहे हैं.

हमारा दूसरा निष्कर्ष यह है कि प्रदेश में आपदा की इस घड़ी में प्रशासन तंत्र सूखे के शिकार किसान और मजदूरों को मदद पहुंचाने में असमर्थ रहा है. हालाँकि आपकी सरकार ने किसानों से मालगुजारी न वसूलने का फैसला जरूर लिया है, लेकिन यह कदम तो प्रतीकात्मक ही है. ऎसी प्राकृतिक आपदा के समय लोगों की सरकार से बहुत अपेक्षा होती है. लेकिन किसान को इस साल का मुआवजा तो दूर पिछली फसलों का मुआवजा भी नहीं मिल पाया है. खेती में मनरेगा का इस्तेमाल भी नहीं के बराबर है. इस संकट की घड़ी में जिन लोगों को सस्ते अनाज की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उनमें से अधिकांश उस राशन कार्ड के पात्र नहीं हैं.

कुल मिलाकर प्रदेश की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा बहुत बडे संकट से गुजर रहा है. जानवरों के लिए तो यह सूखा अकाल में बदलता ही जा रहा है, अगर सरकार की ओर से जल्द ही कुछ प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह भी आशंका है कि बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में सबसे गरीब वर्ग के लिए अकाल की स्थिति बन सकती है.

अपनी टीम के साथियों की ओर से मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि इस संकट की घड़ी में निम्नलिखित बेहद जरूरी कदम तुरंत उठाएँ.

1 प्रदेश में सूखे की तुरंत घोषणा
सूखे की उपरोक्त स्थिति को देखते हुए आपकी सरकार को पूरे प्रदेश में सूखे की तुरंत घोषणा करनी चाहिए, ताकि सूखा राहत के काम शुरू हो सकें. कर्नाटक और मध्य प्रदेश ने यह घोषणा कर दी है, जबकि वहाँ सूखे की स्थिति इतनी भयावह नहीं है. उम्मीद है कि आपकी सरकार राज्य आपदा राहत कोष और जरूरत पड़े तो राष्ट्रीय आपदा राहत कोष का इस्तेमाल करेगी और धन की कमी को सूखे की घोषणा के रास्ते में रोड़ा नहीं बनने देगी.

2 फसल नुकसान के मुआवज़े की घोषणा और बकाया राशि का भुगतान
आपकी सरकार ने पिछले साल ओलावृष्टि और अतिवृष्टि से हुए नुकसान के लिए मुआवज़े की घोषणा की थी, लेकिन यह मुआवज़ा कुछ ही गाँवों तक पहुँच पाया है. ज्यादातर बड़ी ग्राम पंचायतें अब भी इस मुआवजे का इंतजार कर रही हैं. जहाँ मुआवजा मिला भी है, वहाँ यह कुछ ही लोगों तक पहुँचा पाया है. इसमें भ्रष्टाचार की शिकायतें भी सामने आई हैं. इसलिए सरकार तत्काल किसानों बकाया मुआवज़ा दिलवाने की व्यवस्था करे.

पिछली फसल के मुआवज़े के साथ-साथ इस फसल को हुए व्यापक नुकसान की भरपाई के लिए एक वस्तुपरक और न्यायसंगत नीति की घोषणा होनी चाहिए. इस सन्दर्भ में आपकी सरकार मध्य प्रदेश के राजस्व कोड के प्रावधानों पर विचार कर सकती है. ऐसी न्यायसंगत व्यवस्था में मुआवज़ा निर्धारित करते समय दो बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए- (क) किसान ने बीज, खाद, कीटनाशक आदि में कितना निवेश किया था, जो बेकार चला गया ; तथा (ख) इस फसल के नुकसान की वजह से उस अवधि में न्यूनतम गुज़ारे लायक आमदनी का कितना नुकसान हुआ. इन दोनों तथ्यों को देखते हुए हमारा सुझाव है कि जहाँ फसल का पूरा नुकसान हुआ है, वहाँ सिंचित खेतों के लिए 20,000 रूपए प्रति एकड़ और असिंचित खेती के लिए 15,000 रूपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया जाना चाहिए. इस मुआवजे की घोषणा के तत्काल बाद मुआवजज़े की राशि प्रभावित किसानों के बैंक में खाते जमा की जानी चाहिए. फसलों के नुकसान का जायजा पारदर्शी तरीके से हो, इसके लिए किसकी फसल को कितना नुकसान हुआ, यह सूची ग्रामसभा के सामने पेश की जानी चाहिए.

3 क़र्ज़ के बोझ में दबे किसानों को तात्कालिक राहत
रबी के दौरान अतिवृष्टि और अब खरीफ के दौरान सूखे के कारण किसानों ने इन फसलों के लिए जो क़र्ज़ लिया था, वह डूब चुका है. अपेक्षित आय न होने की वजह से किसान पुराने बकाया कर्जे की अदायगी में भी असमर्थ है. क़र्ज़ के बोझ में दबा किसान आत्महत्या को विवश न हो इस लिए यह ज़रूरी है किसानों के तमाम खेती संबंधी और व्यक्तिगत ऋणों का पुनर्निर्धारण हो.

इस सम्बन्ध में हमारा सुझाव है कि: क) जिन इलाकों में फसल पूरी तरह बर्बाद हो गयी है, वहाँ पिछली दोनों फसलों के ऋण को माफ़ कर दिया जाए ; ख) किसानों के बकाया क़र्ज़ का ब्याज माफ़ कर दिया जाए ; ग) इन बकाया कर्जों की किश्तों की अदायगी मुल्तवी कर दी जाए ; घ) किसानों को सरल, सुगम और समयानुसार बैंक क़र्ज़ उपलब्ध करवाया जाए ताकि वह साहूकारों के चंगुल में फंसकर प्रतिमाह 5 से 10 प्रतिशत ब्याज देने को मजबूर न हो.

4 रोजगार गारंटी योजना को सही ढंग से लागू किया जाए
जब फसल बर्बाद हो जाए और किसान मजदूरों को रोजगार देने में असमर्थ हों, ऐसे में मजदूर और सीमांत किसान अपनी आजीविका के लिए सरकार की ओर देखता है, और रोजगार के लिए सरकार का मोहताज हो जाता है. रोजगार गारंटी योजना ऎसी ही स्थितियों से निपटने के लिए बनी थी. लेकिन आज सूखे की स्थिति में सरकार इस योजना का समुचित इस्तेमाल नहीं कर रही है. अधिकांश जरूरतमंद लोगों के पास जॉब कार्ड तो है, लेकिन कई महीनों से उन्हें कोई काम नहीं मिला है. जिन लोगों को काम भी मिला, उन्हें कई महीनों से भुगतान नहीं मिल पाया है. भुगतान न मिलने की वजह से अब गरीबों को लगता है कि इस योजना के तहत काम करने से कुछ हासिल नहीं होगा. हाल ही में भारत सरकार ने महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना में अधिकतम रोजगार की सीमा सौ दिन से बढ़ाकर डेढ़ सौ दिन कर दी है. इस योजना की मदद से सूखा प्रभावित गरीब परिवारों को वैकल्पिक रोजगार देने का यह महत्वपूर्ण अवसर है.

हमारा सुझाव है कि – क) मनरेगा के तहत राज्य के हर सूखाग्रस्त जिले में हर गाँव में काम उपलब्ध करवाया जाए, चाहे उसकी औपचारिक माँग हुई हो या नहीं ; ख) मनरेगा के काम को भूमि और पानी संरक्षण के लिए इस्तेमाल किया जाए, ताकि भविष्य में सूखे का सामना करने की क्षमता विकसित हो सके ; ग) काम के पंद्रह दिन के भीतर मजदूरी का भुगतान किया जाए, इसमें किसी भी तरह की देर होने पर दोषी व्यक्ति को सजा दी जाए ; घ) सूखे के समय लोगों को रोजगार न देने, उनके भुगतान में भ्रष्टाचार करने या मशीनों से काम करवाने की शिकायत पर सख्त कार्रवाई हो.

5 राशन व्यवस्था के जरिये खाद्यान्न संकट का मुकाबला
सूखे के चलते गाँवों में गरीबों के खान-पान पर असर पड़ रहा है. सूखे से खाद्यान्न की कमी और अकाल जैसे हालात न उत्पन्न हों, इसके लिए ज़रूरी है कि राशन व्यवस्था के जरिये जरूरतमंद लोगों तक सस्ता खाद्यान्न पहुंचाया जाए. लेकिन राज्य की सार्वजनिक आपूर्ति व्यवस्था आज यह करने में पूरी तरह से असमर्थ है. लाल कार्ड, पीले और सफ़ेद कार्ड वितरित करने की व्यवस्था में कोई न्यायसंगत आधार दिखाई नहीं देता. हर गाँव में बड़ी संख्या में गरीब परिवारों को पीला कार्ड दिया गया है, जिसके कारण वे सस्ते खाद्यान्न से वंचित हैं. चूँकि सरकार के लिए तुरंत इन कार्डो का पुनर्वर्गीकरण संभव नहीं है, इसलिए सूखाग्रस्त इलाको में सभी परिवारों को सूखे की अवधि के दौरान 60 किलो खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाय. इस दौरान उनसे इस खाद्यान्न का वही दाम लिया जाए, जो कि लाल कार्ड धारकों से लिया जाता है. जिन परिवारों के पास कोई भी कार्ड नहीं है, उन्हें भी सूखे के दौरान यही सुविधा एक अस्थायी प्रमाण पत्र के माध्यम से दी जाए.

6 आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार को मुआवजा
हाल ही में तेलंगाना सरकार ने एक शासनादेश के जरिये आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को दिए जाने वाली मुआवजे की एक सुसंगत व्यवस्था बनाई. हमारा सुझाव है कि उत्तर प्रदेश सरकार भी ऐसा ही एक आदेश जारी कर आज की व्यवस्था में सुधार कर सकती है. इस नयी व्यवस्था के तहत: (क) आत्महत्या के शिकार परिवारों की पहचान में तकनीकी औपचारिकताओं को खत्म किया जाना चाहिए ; (ख) जमीन जोतने वाले भूमिहीन परिवारों को भी इस मुआवजे का लाभ मिलना चाहिए ; (ग) मुआवजे में परिवार के बकाया कर्ज को माफ़ करने, तात्कालिक राहत राशि, विधवा के लिए रोजगार और बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए.

7 जानवरों के लिए ‘चारा छावनी’ की व्यवस्था
इस समय पूरे प्रदेश में मवेशियों के लिए भारी आपदा की स्थिति है. पिछली गेहूँ की फसल अतिवृष्टि से खराब होने के कारण चारा भी बर्बाद हो गया था. अब खरीफ की फसल सूख जाने की वजह से ज़हरीली हो रही है. सूखा जहरीला चारा खाकर जानवरों के मरने की खबर आ रही है. जो परिवार बाहर से महँगा चारा (वर्तमान बाजार भाव 600 से 800 रूपए प्रति क्विंटल) खरीदकर अपने जानवरों को नहीं खिला सकता, वह इस विपदा की स्थिति में मजबूर होकर जानवरों को औने-पौने दाम पर बेच रहा है, या फिर उन्हें गाँव के बाहर छोड़ रहा है. एक गाँव के लोग दूसरे गाँव में जानवरों को चरने के लिए छोड़ रहे हैं. चारों ओर अफरा-तफरी मची है. इससे जानवरों के प्राणों को खतरा तो है ही, छूटे हुए जानवरों द्वारा फसल बर्बाद करने की संभावना भी है. इस आपात स्थिति से बचने के लिए सरकार को बिना देर किए महाराष्ट्र की तर्ज़ पर ‘चारा छावनी’ बनानी चाहिए. इन चारा छावनियों में सैकड़ों मवेशियों को एक साथ रखकर सरकार की ओर से चारा और पानी उपलब्ध किया जाना चाहिए. सरकार उचित समझे तो इस काम मे स्वंयसेवी संगठनों, गौशालाओं और अन्य पशुपालक संगठनों को शामिल कर सकती है.

8 सूखाग्रस्त इलाकों में नलकूपों की मरम्मत के बाद
सूखाग्रस्त इलाकों में तालाब और पानी के अन्य स्रोत सूख गए हैं। इसलिए इंसान और मवेशी, दोनों पानी के लिए नलकूपों पर निर्भर हैं. लेकिन प्रायः हर गाँव में कई नलकूप छोटी-मोटी मरम्मत के अभाव में काम नहीं कर रहे हैं. इससे गाँववासियों , खास तौर पर औरतों को, बेहद कष्ट उठाना पड़ रहा है. अतः सरकार एक मिशन की तरह पूरे प्रदेश में नलकूपों की मरम्मत का काम अगले 2 हफ्ते में संपन्न कराए.

9 सिंचाई के लिए बिजली आपूर्ति
सूखे की मार से परेशान किसान अपने बोरबेल या ट्यूबवेल के ज़रिये अपनी फसल को बचने की चेष्टा कर रहा है लेकिन बिजली की आपूर्ति अपर्याप्त होने या समयबद्ध तरीके से न होने के कारण वह फसल को बचाने में असमर्थ रहता है. बिजली का विकल्प है डीज़ल, लेकिन वह इतना मंहगा पड़ता है कि किसान उसका इस्तेमाल नहीं कर सकता इसलिए अब रबी की फसल के लिए बिजली नियमित रूप से उपलब्ध करवाई जाए. जहाँ ज़रुरत हो वहां बिजली के बिलों को कुछ समय के लिए स्थगित किया जाये.

मुझे आशा है कि आप इन सुझावों की मूल भावना का सम्मान करेंगे। इस पत्र का उदेश्य आलोचना या दोषारोपण नहीं है। इस राष्ट्रीय संकट की घडी में सभी को मिलकर काम करना है. हमारी टीम ने प्रदेश में भ्रमण कर कर किसानो के दुःख-तकलीफ़ को सुना – समझा है. इसलिए हमारा फर्ज़ बनता है कि हम उनकी आवाज़ को आप तक पहुँचाएँ. देश के इस सबसे बड़े प्रदेश की जनता इस आपदा के वक्त आप की सरकार की तरफ देख रही है. मुझे विश्वास है कि आप उनकी इन आशाओं पर खरे उतरेंगे।

भवदीय,

योगेन्द्र यादव
राष्ट्रीय संयोजक
जय किसान आन्दोलन

फ़रवरी 25, 2015

किसान की पगड़ी बचाने का यह आखिरी मौका है…शायद ! (योगेन्द्र यादव)

बहुत दिनों बाद किसान खबरों की सुर्खियों में है. सियासी दांव पेंच, वर्ल्ड कप की हार-जीत और शेयर बाज़ार के उतार-चढ़ाव के मोहपाश में बंधे मीडिया ने मानो एक-दो दिन के लिए किसान दिवस मनाने का फैसला ले लिया है. संसद में गतिरोध,बजट का सन्दर्भ, दिल्ली की हार के बाद मोदी के पैंतरे और फिर अन्ना हजारे. इन तमाम बातों से मीडिया को किसानों का दुःख-दर्द देखने की फुर्सत मिली है.

धीरे-धीरे किसान, खेती और गाँव देश के मानस पटल से ओझल होते जा रहे हैं. देश के कर्णधार, नीतियों के सूत्रधार और बुद्धिजीवी, सब मान चुके हैं कि देश के भविष्य में किसान, खेती और गाँव का कोई भविष्य नहीं है. इसलिए हमारे भविष्य की योजनाओं में ‘स्मार्ट सिटी’ है, सूचना प्रौद्योगिकी है, फैक्ट्रियां और मॉल हैं, लेकिन गाँव-देहात नहीं है. अगर कुछ है तो बस खेती की जमीन जिससे किसान को बेदखल करके यह सब सपने साकार किए जाने हैं. किसान खेती और गाँव के लिए एक अलिखित योजना है इस देश में. गाँव या तो उजड़ेंगे या फिर शहरों के बीच दड़बों में बंद हो जायेंगे. खेती धीरे धीरे काश्तकार के हाथ से निकलकर बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथ जायेगी. किसान शहरों की ओर पलायन करेगा, दिहाड़ी का मजदूर बनेगा. इस अलिखित योजना को हर कोई समझता है, बस मुंह से बोलता नहीं. ऐसे में किसान की व्यथा की खबर बूँद बूँद रिसती रहती है, सुर्ख़ियों में नहीं अखबार के अन्दर के पन्नो में किसी हाशिये पर पडी रहती है.

ऐसी ही एक खबर पिछले हफ्ते छपी. भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि उसके लिए फसलों के दाम को किसान की लागत से ड्योढ़ा करना संभव नहीं है. किसानों की अवस्था पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए दायर एक याचिका पर सरकार ने यह जवाब दिया. सरकार ने कहा कि किसान को लागत पर 50 फ़ीसदी मुनाफा देने से खाद्यान्न बहुत मंहगे हो जायेंगे. इसे सरकार के सामान्य जवाब की तरह देख कर नज़रंदाज़ कर दिया गया. असली बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया. मीडिया ने यह नहीं बताया कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना भारतीय जनता पार्टी का चुनावी वादा था. लोक सभा चुनाव और हरियाणा विधान सभा चुनाव के घोषणापत्र में बीजेपी ने लिखकर वादा किया था कि किसानो के लिए फसल की उनकी लागत के ऊपर 50 फ़ीसदी मुनाफा जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जायेगा. बीजेपी चुनाव जीत गयी, न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा में इस वादे को भुला दिया गया और सरकार की बेशर्मी देखिए कि उसने भविष्य में भी ऐसा कुछ करने से इनकार कर दिया है. मामला किसान का है इसलिए इस इनकार की खबरों में सुर्खियां नहीं बनीं.

उधर हरियाणा सरकार ने भी गुपचुप किसानों को एक बड़ा झटका दिया, लेकिन इसकी कोई चर्चा नहीं हुई. सारे देश में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर बहस हो रही थी. अरुण जेटली कह रहे थे कि अध्यादेश में और कुछ भी बदलाव किया गया हो,कम से कम मुआवजे की रकम घटायी नहीं गयी है. लेकिन हरियाणा की बीजेपी सरकार 4 दिसंबर को अधिग्रहण का मुआवजा आधा कर चुकी थी. सन २०१३ के नए अधिग्रहण कानून में कहा गया था कि मुआवजा तय करते समय जमीन की कीमत पहले की तरह कलेक्टर रेट या पुरानी रजिस्ट्री के आधार पर आंकी जायेगी. ग्रामीण इलाकों में इस कीमत को दो से गुणा किया जा सकेगा. फिर जो राशि बनेगी उसमें उतना ही सोलेशियम जोड़ दिया जायेगा. यानि अगर जमीन का सरकारी दाम 20 लाख रुपये है तो किसान को कुल मिलाकर 80 लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन हरियाणा सरकार ने नए नियम बनाकर दाम को दुगना करने की बजाय य़थावत रखा. यानि हरियाणा में किसान को 80 लाख के बजाय 40 लाख मिलेंगे.

इतना बड़ा फैसला हो गया लेकिन कोई पूरा सच बताने को तैयार नहीं है. हरियाणा के मुख्य- मंत्री का दफ्तर कह रहा है कि यह फैसला औद्योगीकरण के लिए जरूरी था, लेकिन खुद खट्टर जी कह रहे हैं की मुआवजा कम हुआ ही नहीं! हरियाणा से चुने गए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बीरेंद्र सिंह कह रहे हैं कि उनके रहते मुआवज़े को चार गुणा से कम कोई कर ही नहीं सकता! इधर हरियाणा के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार अधिग्रहण के पुराने मामलों में भी 100 फ़ीसदी सोलेशियम देगी. लेकिन ख्ट्टर साहब की सरकार सिरसा में इसी हफ्ते होने वाले अधिग्रहण में सिर्फ 30 फीसद सोलेशियम देने का आदेश जारी कर रही है!

यही किसान-राजनीति की त्रासदी है. किसान की खबर हाशिये पर दबी है, किसान की विचारधारा टुकड़ों में बंटी है, किसान आन्दोलन खंड- खंड में बिखरा हुआ है| इसलिए, किसान की राजनीति ऐसे चौधरियों के कब्जे में है जो उसका वोट डकारकर सत्ता पर काबिज हो जाते हैं लेकिन किसान-हित की जगह बिल्डरों, उद्योग और व्यापारियों के हित में काम करते हैं|

आज देश को एक नई किसान-राजनीति की जरूरत है| आज किसानी घाटे का धंधा बन चुकी है| किसान के पास न तो आमदनी है, न ही अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के साधन| ले दे कर उसके उसके पास तीन ही चीजें बची हैं- पाँव के नीचे जमीं का टुकड़ा, उंगली में वोट देने की ताकत और सर पर बेवजह शान की प्रतीक पगड़ी| अपनी पगड़ी की आन को बनाये रखने के लिए किसान को वोट की ताकत का इस्तेमाल कर अपनी जमीं बचानी होगी| इसलिए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ चल रहा आन्दोलन किसान राजनीति को बदलने का बहुत बड़ा मौका है| यह मौका है किसान आन्दोलन को पुराने चौधरियों की गिरफ्त से बाहर निकाल कर भविष्य के सवालों से जोड़ने का, एक नया नेतृत्व और एक नई दिशा देने का|

हां, शायद यह आखिरी मौका है|

(योगेन्द्र यादव)

साभार : एक्सप्रेस टुडे

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