Posts tagged ‘Fareb’

जुलाई 7, 2011

कहीं मकान बनाएँ क्या?

तकदीर की तह में उतर जाएँ क्या,
घर जलाके रौशनी को मनायें क्या?

होंटों पर ताले लगे हैं सुनायें क्या,
छुरी तले हैं ज़बाने तो गायें क्या?

बेकसी बता हद से गुजर जाएँ क्या,
जिंदगी के मारे हैं ज़हर खाएं क्या?

वहाँ भी कहीं मौत खड़ी मिलनी है,
जिंदगी तेरे रास्ते पर आयें क्या?

किस्मत कौन सी अपने हाथ में है,
किस्मत के मिले पर पछताएं क्या?

आज तो ज़रा भी दिल में नहीं दर्द,
किसी दोस्त को गले से लगाएं क्या?

कोई तो सूरत हो दिल बहलाने की
जिंदगी बता ताज़ा फरेब खाएं क्या?

हमने सरों पर छतें गिरती देखी हैं,
सोचते हैं कहीं मकान बनाएँ क्या?

(रफत आलम)

मार्च 15, 2011

बस आदमी मिलता नहीं…

विश्वास फरेब का नाम है बुजुर्गों ने कहा है
बता तो सही यार आस्तीन के पीछे क्या है

न शिकायत है किसी से न लबों पे गिला है
हम फकीरों के दिल में सबके लिए दुआ है

आज तो सारा माहौल ही कालिख से पुता है
आप अपना दामन बचाइए आपको क्या है

ज़ख्मो को खुला रख के घर से निकलता हूँ
मुझे मालूम है नमक भरने को दिन खड़ा है

तुम्हारा वादा-ए-मुहब्बत ज़बानी था और रहा
हमारा हर्फे वफ़ा दिल के वरक पे लिखा है

वक्त का उधार न चुका साँसों की पूंजी से
आदमी ने आखिर जीवन भी सूद में दिया है

बसे देखे दुनिया में सातों जातें चारों मज़हब
नहीं मिला तो बस आदमी ही नहीं मिला है

मैंने तो तेरी रहबरी का भरम रखा है आलम
ये रास्ता मंजिल को नहीं जाता मुझे पता है

(रफत आलम)

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