Posts tagged ‘Exploitation’

जून 2, 2011

वक्त्त की किताब

लंबा इतिहास रहा है
क्रंदन और रुदन का
आदमी का आदमी द्वारा बेइंतेहा शोषण
बलवान की कमज़ोर पर बरतरी
वही जुल्मों सितम का निजाम है जो के था
अभी भी जारी है सफर घसीटी जाती
लहू में सनी अनगिनत गुमनाम लाशों का
जो बेसबूत फूँक दी जाती हैं
नए नास्तियों के गैस चैम्बरों में
या शार्कों के हवाले कर दी जाती हैं
अभी भी उड़ रहे हैं मीलों ऊपर फौलादी बाज़
जिनके पंजों में सिमटी हज़ारो टन बारुद
जाने किन खलिहानों को स्वाह करने वाली है
जाने कितनी बस्तियां जिंदा जलाई जानी हैं
चाँद के गले में फंदा फ़ेंक कर
सारी रोशनी आपने घर ले जाने कि तैयारी है
नीव रखी जा चुकी है न्यू वर्ल्ड आर्डर की
अभी कहाँ बुझी है अँधेरे पिशाचों की विकराल प्यास
जिसे सदा से
बेगुनाहों का उजला सुर्ख खून चाहिए होता है
आदमियत का वही बेरहम कातिल
इन्साफ की मूरत बना बैठा है

आज़ादी के बहाने
रेड इंडियनों का शिकार कर
हिरोशिमा-नागासाकी से चलता हुआ
थियेनमान चौक पर दम लेकर
ईराक, अफगानिस्तान और फिलिस्तीन तक
आदमियत को रौंदने के बाद
टयूनेशिया-लीबिया की तरफ
बढ़ गया है “चंगेजों” का कारवाँ
खूनी अध्याय जुड़ते जा रहे हैं
वक्त की किताब में।

दरअसल इन्साफ!
ताकत का बड़ा मजाक है
कमज़ोर के अस्तित्व के साथ
एक कारगर औजार है
जिसके सहारे
आसानी से शोषण होता है
बदनसीब सर्वहाराओं का
वे सपने दिखा कर
जिनकी वास्तविकता
पिंजरे में कैद पंछियों की
उड़ान के ख्यालों के सिवा कुछ नहीं

काश!
मुक्त हो कभी इंसानियत
सरहदों और हुक्मरानों की कैद से
धरती वही स्वर्ग हो जाए
जो कभी थी
नीले आकाश की तरफ
उड़ाने भरें
आज़ाद उमंगें और परिंदे।

कवि महोदय अभी तुमको
अनगिनत अध्याय हैं पढने
ज़ुल्म की काली किताब के,
सदियों की उदासी ठहरा कर
अनगिनत रुला देने वाले गीत रचने हैं।

(रफत आलम)

मई 26, 2011

सुंदरता अभिशाप बना दी जाती है!

पँखों का महत्व
पिंजरे में कैद पंछी के लिए
अर्थहीन है,
उसकी घायल चोँच
आज़ादी का सपना लिए
लोहे के तारों से लड़ रही है।

दो पल बहलने का सामान है
पँखों के रुपहले रंग,
लहू टपकाती चोँचों का क्रंदन
मनमोहक लगता है
संवेदनहीन अहसास को।

सुंदरता सदा से अभिशाप है!

वरना क्यों हरम भरे जाते
कहाँ रनवासों में मुरझाते
बेमिसाल हुस्न?
अपने पौरुष का दंभ भरने वाले भूपति
नपुंसकों की टोलियों से
अश्गाहों की रखवाली क्यों करवाते?

आह!
किस तरह लुटे होंगे
मासूम अरमान!

आज भी रईसों की जामत
कमसिन सोंदर्य की
वही बाइज्ज़त खरीदार है,
कला का नाम देकर
नग्नता का नाच देख रही हैं
अय्याशों की मदमस्त आँखें।

ये उन्मुक्तता यदि प्रगति का पैमाना है
क्यों आत्महत्या कर लेती है
सफलतम मॉडल?

(रफत आलम)

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