Posts tagged ‘Equality’

जुलाई 11, 2016

नारी … (महात्मा गाँधी)

“नारी” पुरुष की सहचर है, सहगामी है, संगी है, साथी है, और उसकी क्षमताएं किसी भी मायने में पुरुष से कमतर नहीं हैं|

नारी के पास पुरुष की गतिविधियों की बारीकियों में सम्मिलित होने का अधिकार है, और उसके पास, जैसे पुरुष के पास स्त्री के प्रति है, पुरुष जैसी ही स्वतंत्रता और छूट है|

सेवा और त्याग की आत्मा के जीते जागते उदाहरण के रूप में मैंने नारी को पूजा है|

प्रकृति ने जैसे नारी को स्वहित से परे की सेवा की आत्मिक शक्ति से नारी को परिपूर्ण किया है, उस शक्ति की बराबरी पुरुष कभी भी नहीं कर सकता|”

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नवम्बर 8, 2013

तिनकों का समाजवाद और पूंजीवाद

(1)

रोज की तरहstraw-001

कई-कई संकेत कर

आज भी अस्त हुआ

सूर्य!

कई तिनके बीने मैंने

तुमने भी कुछ तिनके उठाये

लोग भी थे

तिनके उठाते |

(2)

धरती बड़ी थी

जमीन उपजाऊ भी

कहीं बंजर भी

यदृच्छया लोग बिखेरे गये थे

बड़ी सी जमीन पर!

मौसम की हवा सर्द भी थी

गर्म भी!

बारिश की फुहारें भी थीं

ओले भी, बाढ़ भी!

सूरज भी पक्षपाती

गरम कहीं, नरम कहीं!

(3)

लोग भी भिन्न थे,

पता नहीं क्यों!

कुछ चपल, कुछ मद्धम

कुछ सुस्त, कुछ रेंगते से

एक ने कहा

तिनके बीनना है, लक्ष्य

यह खोज है,

संकेत है प्रगति का!

सब जुट गये,

‘अ’ ने, ‘ब’ ने, ‘स’ ने, ‘द’ ने

कई कई तिनके बीने

गट्ठर बनाए

(4)

तिनके बीनते बीनते,

एक ने पाया

कि,

इस तरह संतुलन बिगड रहा है

कुछ के पास तिनके ज्यादा हैं,

कुछ के पास कम

धरती भी कहीं तिनकों से पटी,

कहीं तिनका विहीन!

कई वाद चले,

तिनकों की ढेरियाँ बनती रहीं

बिगड़ती रहीं|

(5)

तिनकों का मूल्य क्या था?

तिनके क्या थे?

क्यों बीने गये?

कितने वृक्ष कटे?

कितने जंगल जले,

तिनकों के उत्पादन में?

तिनके तिनके थे,

चुभते भी थे,,

जलते भी थे|

(6)

तिनकों ने अपनी चुभन

अपनी जलन

उधार दी आदमी को

आदमी कभी न उतार सका

यह कर्ज!

ब्याज चक्रवृद्धि था

पुश्त दर पुश्त

बढ़ता गया…

(7)

आज फिर तुमने मुझसे बातें की

“‘युगल’

‘अ’ ने तिनके ज्यादा उठाये|”

मैंने मायूसी में सिर हिलाया

कोसा खुद को

चंद बातें की

मुट्ठी बांधी

कि,

कल हम अधिक तिनके उठाएंगे!

तिनके ही क्यों?

तिनके ही क्यों उठाएंगे

न तुम जानते थे,

न मुझे मालूम था|

Yugalsign1

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