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मई 23, 2014

गांधी Vs हिटलर

 

GandhiVsHitler-001

एक देश की करुणा संचित होती है गांधी में

एक देश का घमंड एकत्रित होता है हिटलर में

एक के उल्लेख के साथ प्रेम का आभास होता है

दूसरे के साथ घृणा की परिकाष्ठा का भय सताता है

एक आशा और प्रकाश का धोतक है

दूसरे की स्मृति अन्धेरा फैलाती है

पहला मानवता को पोषित करता है

दूसरा मानवता का विनाश करता है

पहला सदियों देश की जयजयकार करवाता है

दूसरा सदा देश को गालियाँ दिलवाता है

चुनाव सदा हाथ में है…

…[राकेश]

जुलाई 1, 2011

व्यक्ति अब तो आत्मसमर्पण करो

व्यक्ति !
तुमने चाहे
कितने ही युद्ध
क्योँ न लडें हों
जीते हों
कितना ही
संघर्ष
आविष्कार
और उन्नति की हो
लेकिन तुम
हमेशा
और
हर बार
हारे हो
अपने ही अहम से।

अपने अहम की
तस्वीर को
अपने अनुकूल न पाकर
तुम इसको
बार बार
बनाने
बिगाड़ने के लिए
अपने ही मन से
करते गए
मित्रता और शत्रुता
तर्क खोजकर
अपनी ही आत्मा को
ढालना चाहा तुमने
अपने अनुकूल।

लेकिन…..
तुम हमेशा
हारे हो
और इस तरह
तुम
न अपने अहम
न मन
और न अंतरात्मा को पा सके
तो फिर तुमने
पाया क्या…

कुछ नहीं
केवल शून्य
इसलिए
सब कुछ भूलकर
शून्य से ही
आरम्भ करो
अपना नवजीवन
मन शून्य होकर
महसूस करो कि
तुम्हारे भीतर
क्या चल रहा है
जो तुम नहीं चला रहे
इसलिए
प्रकृति के समक्ष
कृतज्ञ होकर
कर डालो
आत्मसमर्पण..
और सहजता से
मान लो कि
तुम्हारा असिस्त्व
वही है जो
समुद्र में
एक पानी की
बूँद का है
न इससे अधिक
और न कम।

और जिस पल
तुम ये अहसास कर लोगे
उस पल तुम
जीत जाओगे
और इसी के साथ
तुम्हारे लिए मिट जाएगा
जीत, हार का अर्थ
और तुम केवल
प्रकृति निष्ठ
व्यक्ति होगे!

(अश्विनी रमेश)

जून 13, 2010

प्रेम, अंहकार और टॉनिक

हजारों की भीड़ में भी
दूसरे हैं इस कारण
अपने होने का अहसास तो रहता है
परन्तु तब भी वजूद के होने की
बात गहरे में नहीं पनप पाती|

यह तो तभी पता चलता है
जब हजारों की भीड़ में से कोई एक
आकर हाथ थाम लेता है|


पहली बार
कोई हमारे अपने कारण
पास आता है|


उसने जैसे कि हम हैं
हमारे उसी रुप को
इन हजारों की भीड़ में से पसंद किया है।

प्रेम का पहला पड़ाव
अंह की तुष्टि तो कर ही जाता है।
उसे पुष्ट करने का टॉनिक तो दे ही जाता है।

... [राकेश]

मई 16, 2010

“मैं” है तो प्रेम कहाँ

अपने “मैं” को

खोकर जिसे पाते

वह सौगात प्रेम की !

…[राकेश]

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मई 7, 2010

प्रेम और अंहकार

समय रहते
एक बार तो
जवाब दे दो
मेरी पुकार का|
बाद में
ऐसा ना हो
समय उलझा ले
अपनी व्यस्तता के
जाल में मुझे|
और
विवश मै
चाहकर भी
तुम्हारी आवाज ही न सुन पाँऊ
…[राकेश]
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