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नवम्बर 30, 2014

अरी ओ करुणा प्रभामय…अज्ञेय

जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया हैagyeya
उस दुख में नही जिसे बेझिझक मैने पिया है।
उस गान में जियो जो मैंने तुम्हें सुनाया है,
उस आह में नही जिसे मैंने तुमसे छिपाया है।

उस द्वार से गुजरो जो मैंने तुम्हारे लिए खोला है
उस अंधकार से नहीं जिसकी गहराई को
बार बार मैंने तुम्हारी रक्षा की भावना से टटोला है।

वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ, बुनूँगा,
वे काँटेगोखतो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ, चुनूँगा।

वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे हित बनाता हूँ, बनाता रहूँगा,
मैं जो रोड़ा हूँ, उसे हथौड़े से तोड़तोड़
मैं जो कारीगर हूँ, करीने से
सँवारता सजाता हूँ, सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुँचाने का
उदार उद्यम मेरा होः
फिर वहॉ जो लहर हो, तारा हो,
सोनतरी हो, अरुण सवेरा हो,
वह सब, ओ मेरे वर्ग !
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो।

(अज्ञेय)

मार्च 16, 2013

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

चाहे यह ज़िंदगी खंगालो

या तुम इसकी रूह निकालो

ठंडी आहें नहीं भरूँगा

सब कुछ चुपचाप सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

मैंने कभी विरोध न माना

हर अनुरोध तुम्हारा माना

मान तुम्हारा रख पाऊं

मैं यह कोशिश दिन रात करूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

दुख से मेरा वैर नहीं है

कोई रिश्ता गैर नहीं हैं

यदि वह मेरा साथ निभाए

तो मैं उसके साथ रहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

बहुत मौत से डरते होंगे

वे जीते-जी मरते होंगे

मैं उनमे से नहीं बंधु !

जो समझौतों की मार सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

तुम भटको तो वापस आना

मन में कोई बात न लाना

दरवाजे पर जब पहुंचोगे

तुम्हे द्वार पर खड़ा मिलूंगा

तब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

{कृष्ण बिहारी}

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