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सितम्बर 27, 2011

दूर और कुछ जाना है

साथ तुम्हारे ही चलकर के दूर और कुछ जाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी पथ मेरा अंजाना है
चिर परिचित से मुझे लगे हो
शायद जन्मों साथ रहे हो
या फिर कोई और बात है
सुख-दुख जो तुम साथ सहे हो
मुझको तो ऐसा लगता है मन जाना-पहचाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
मिलना और झगड़ना मिलकर
यह तो अपनी आम बात है
जीत मिली है हरदम तुमको
मुझको तो बस मिली मात है
सारी उम्र मुझे तो शायद हरदम तुम्हे मनाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
जब-जब भी मिल जाते हो तुम
मन पर चाँद उतर आता है
दूर तुम्हारे होते ही पर
सुख जैसे सब छिन जाता है
बहुत रोकता हूँ मैं आँसू पर वह तो बाहर आना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
अपने पीछे था कल बचपन
आज द्वार पर आया यौवन
कल तक कोई रोक नहीं थी
आज लग गये मन पर बंधन
इनसे डरकर मेरे मन अब और नहीं घबराना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
प्रेम हमारा दीया-बाती
या फिर है चातक-स्वाति
निस दिन इसको बढ़ना ही है
जैसे नदिया चलती जाती
हमको भी तो मंजिल अपनी आज नहीं कल पाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी…

{कृष्ण बिहारी}

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जून 29, 2011

प्रेम जीवन का द्वार

प्रेम में
छिपी होती है
एक आग
जो तपा कर
सोने को कुंदन बना देती है।

प्रेम के
स्वादिष्ट भोज
में
समाविष्ट
रहते हैं
मीठे,
खट्टे,
कड़वे,
और कसैले
भाव रुपी
व्यंजन भी।

प्रेम के
अमृत रुपी
कलश में
ही बसा होता है
मीठा जहर भी।

प्रेम
अस्तित्व में
पूरकता भी लाता है
और यह
एक बहुत बड़े अभाव
की ओर इशारा भी कर देता है।

प्रेम के
साथ आने वाला सुख
गुलज़ार कर देता है
गुलशन
तो इसके साथ आने वाली
पीड़ा
उपजा देती है
एक नासूर भी
जो रिस रिस कर
जीवन को
एक लुभावनी मौत की
ओर खींचता ले जाता है।

प्रेम में
आपस में गुथे होते हैं
हार और जीत
इन्हे अलग नहीं किया
जा सकता।

प्रेम
जीवन की
निजता है
अस्मिता है।

प्रेम कर पाना,
प्रेम में होना,
जीवन जीने की,
जीवन जी पाने की,
जीवन से तारतम्य
बैठा पाने की
कसौटी है।

…[राकेश]

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