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दिसम्बर 15, 2013

‘आम आदमी पार्टी’ : सिर्फ हंगामा खड़ा करना मकसद…

aap

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

कहते हैं कुछ कवितायें कालजयी होती हैं क्योंकि स्वयं सत्य के अनुरोध पर प्रकृति स्वयं उन्हें जन्मा देती है और माध्यम उस भाव को जन्माने के लिए सुयोग्य एक कवि बन जाता है| दुष्यंत कुमार की इस कविता का उपयोग योग्य और षड्यंत्रकारी, दोनों किस्मों के लोगों ने बरसों से किया है| आपातकाल में और उसके बाद भी भिन्न किस्म के नेताओं ने भी इस कविता का उपयोग अपने हित में किया होगा, पर ऐसा ही पाया गया कि उनके द्वारा किया गया उपयोग दरअसल दुरुपयोग ही बन कर रह गया|

अब ‘आप‘ (आम आदमी पार्टी) के भारत के राजनीतिक पटल पर उदय के बाद और उसके बाद उनके तौर तरीकों से लग रहा है कि इस कविता को सही हाथ, सही मुख और सही वजूद मिल गये हैं|

आप‘ ने दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा ही नहीं बल्कि देश भर में बरसों से जमे जमाये विभिन्न  राजनीतिक दलों के पैरों तले से सुखपूर्ण राजनीति का वैभवपूर्ण कालीन खींच लिया है| सबकी परेशानी एक ही है कि अगर ‘आप’ और इसकी किस्म की मूल्यों आधारित राजनीति चली तो यह शत-प्रतिशत तय है कि उनकी पुरानी किस्म की राजनीति , जो सड़ कर घाव बन चुकी है और देश को नासूर की तरह खाए जा रही है, या तो मृत्यु को प्राप्त होगी या उसे मजबूरन निर्वासन पर जाना होगा|

कांग्रेस और भाजपा जैसे दल, जो विगत में अनेकों बार अस्पष्ट तरीकों से बहुमत जुटा कर सरकारें बना चुके हैं, इस बार ‘आप‘ के पीछे पड़ गये हैं कि ‘आप‘ को दिल्ली में सरकार बनानी चाहिए जबकि ‘आप‘ के पास सरकार बना सकने लायक विधायक नहीं हैं| ‘आप’ की वजह से भाजपा मजबूर है कि बहुमत से केवल 4-5 सीटें दूर रहने के बावजूद भी वह सरकार नहीं बना सकती क्योंकि अगर उसने विगत की भांति अस्पष्ट तरीके अपनाए सरकार बनाने के लिए तो कुछ माह बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में उसे जबरदस्त हानि उठानी पड़ सकती है| भाजपा ने उपराज्यपाल महोदय के बुलाने पर उन्हें सरकार बना पाने में अपनी असमर्थता जता दी और गेंद को ‘आप‘ के पाले में यह कह कर फेंक दिया कि ‘आप’ को अब सरकार बनानी चाहिए और भाजपा एक भले और जिम्मेदार विपक्ष की भांति उनके जनहित में किये सारे कार्यों का समर्थन करेगी| |

‘आप’ उप राज्यपाल महोदय से मिल पाती उसके एक दन पहले ही कांग्रेस ने अपनी तरफ से अति-राजनीतिक चतुराई दिखाते हुए ‘आप’ को बिना शर्त बाहरी समर्थन देने की चिट्ठी उप-राज्यपाल महोदय को भिजवा दी| कांग्रेस ने भाजपा की तर्ज पर ‘आप’ को अपने अनुभवी राजनीतिक कौशल से परास्त करने के लिए एक दुष्टता भरा दांव चला और उसे लगा होगा कि बस अब ‘आप’ फंस गई है और वह और भाजपा सरीखी पुरानी पार्टियां मिलकर ‘आप’ का दम निकाल देंगीं और राजनीति फिर से कीचड़ में खींच लेंगीं| पर वह भूल गई कि नया होने का मतलब मूर्ख होना नहीं होता और जो लोग मूल्यों पर आधारित राजनीति करने निकले हैं वे उनके घिसे पिटे दांवपेंचों के घेरे में आकर हार मानने वाले नहीं|

अरविन्द केजरीवाल ने ‘आप‘ की तरफ से सोनिया गांधी (कांग्रेस), और राजनाथ सिंह (भाजपा) महोदय को पत्र लिख कर कांग्रेस और भाजपा द्वारा बिछाए राजनीतिक चक्रव्यूह को छिन्न- भिन्न कर दिया है और उन्हें एक बार फिर से जनता के सामने बेनकाब कर दिया है|

देखें अरविन्द केजरीवाल द्वारा

(1) –सोनिया गांधी को लिखा पत्र
(2) राजनाथ सिंह को लिखा पत्र
(3) उपराज्यपाल महोदय को लिखा पत्र

कांग्रेस क्यों ‘आप‘ को बिना मांगे समर्थन दे रही है?

समर्थन तो तब दिया जाता है जब या तो विचारधारा समान हो या किन्ही मुद्दों पर समानता हो| ‘आप’ का तो जन्म ही कांग्रेस, भाजपा, क्षेत्रीय दलों और वामपंथियों द्वारा पोषित राजनीति का विरोध करने के लिए हुआ है|

‘आप’ ने सही ही कांग्रेस और भाजपा से आप के 17 संकल्पों को पढ़ने के बाद समर्थन पर विचार करने की बात की है| अगर ‘आप’ के मेनिफेस्टो और इन 17 संकल्पों को कांग्रेस और भाजपा समर्थन दे सकती है तभी उन्हें ‘आप’ को समर्थन देने जैसे बात करनी चाहिए वरना जनता उन्हें अग्माई लोकसभा चुनाव में दर्शा देगी कि समर्थन का दिखावा करना उन्हें राजनीतिक रूप से बहुत भारी पड़ा है| अब ये चालबाजी वाली  राजनीति नहीं चल पायेगी भारत में|

मजेदार बात यह है कि कांग्रेस और भाजपा की एक समान विचार यह भी है कि दिल्ली में ‘आप’ को अल्पमत वाली सरकार बनाकर मजबूर करके उसे दिल्ली में ही सीमित करके बाद में उसे हर मोर्चे पर कठिनाइयों में डाल कर उसका भंडाफोड किया जाए| कैसा दुर्भाग्य देश का है कि अपने हितों पर कुठाराघात होता देख ऐसा भी राजनीतिक पार्टियां सोच सकते हैं| दिल्ली की जनता केएक बड़े तबके ने दिखा दिया है कि अहंकारपूर्ण राजनीति का अक्या हश्र हो सकता हैऔर अब देश भर में जागरूक मतदाता यही सब लोकसभा चुनाव में कर दिखायेंगे|

‘आप’ के पास पूर्ण बहुमत होता तो वह न केवल सरकार बनाती बल्कि अपने वादों को पूरा करके भी दिखाती और दिल्ली में व्यस्तता के बावजूद भी देश भर में अलख जगाती स्वच्छ राजनीति के उदय की|

स्वच्छ राजनीति को स्थापित करने का लक्ष्य तो हर हालत में पूरा होना ही है|

राजनीति सत्तासुख भोगने से हटकर पुनः सडकों पर पहुँच रही है और जिसे जनता के बीच उन जैसा बन कर उनके लिए कुछ करना है वही राजनीति में रह पायंगे बाकियों को अपनी मन पसंद जगह अब तक कमाए पैसों से ऐश्वर्यपूर्ण बंगले बनवाकर अवकाश प्राप्त जीवन जीने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए|

क्योंकि जैसा कि दुष्यंत कुमार की प्रसिद्द कविता की दो अन्य पंक्तियाँ कहती हैं :-

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

आप व्यक्ति आधारित आंदोलन नहीं है, यह जनता के हृदयों में बरसों से देश के साथ किये गये राजनीतिक छल के प्रति आक्रोश से मचे मंथन से निकला अमृत है जो देश में यत्र-तत्र-सर्वत्र स्वच्छ राजनीति के  अस्तित्व को स्थापित करेगा|

दुष्यंत कुमार की कविता की दो अन्य पंक्तियाँ हैं

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

अब सड़-गल चुकी सत्ता आधारित राजनीतिक व्यवस्था की बुनियाद ही गिरने का वक्त्त आ रहा है| बेहतर यही होगा कि विभिन्न दलों में भले लोग, जो दलाल किस्म के नेताओं के कर्मों के कारण घुटा हुआ महसूस करते थे, डूबते हुए जहाज़ों को छोड़ कर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करें| और अगर यह संभव न हो तो अपने अपने दलों में रहकर सुधार की क्रान्ति का आह्वान करें और अपने अपने राजनीतिक दलों को, पारदर्शी और देश के प्रति जिम्मेदार और ईमानदारी को सम्मान देने वाला बनाएँ|

अप्रैल 6, 2011

इस मुल्क में हमारी हुकुमत नहीं रही (दुष्यंत कुमार)


ये कैसा भारत बना लिया है हमने कि देश के स्वास्थ्य को कोढ़ की तरह खाकर मृत्यु शैय्या पर ले जाने वाले भ्रष्टाचार का जड़ से समूल विनाश करने के लिये ईमानदार भारतीय चाहते हैं कि कदम उठाये जायें और लोकतंत्र (जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन) के नाम पर राजसुख भोगने वाले नेतागण और अधिकारीगण तरह तरह की चालाकियाँ दिखा रहे हैं जिससे कि जनहित वाला लोकपाल विधेयक विधिवत रुप से कार्यकारी न हो जाये। ऐसा हो गया तो उनके विशाल उदरों में काले धन की पूर्ति कैसे होगी? जनता चाहती है कि लोकपाल विधेयक अपने संशोधित रुप में जारी हो और नेता और अधिकारी इस जिम्मेदारी से मुँह चुरा रहे हैं।
किसी सभ्य लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं हुआ होगा जैसा भारत में हो रहा है। लोकतंत्र में जनता जो लोकहित में चाहती है वैसा करना सरकारों का कर्त्तव्य होता है।
आज भारत उस मोड़ पर आकर खड़ा है जब अगर अभी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता सामुहिक रुप से न उठी तो फितर यह इस देश से कभी भी रुखसती न पा पायेगा और ऐसे ही दैनिक जीवन का अपरिहार्य अंग बने रह कर इस पावन देश का नाश कर देगा।
कोई आश्चर्य नहीं कि अगर भविष्य में कोई सच्चा मनुष्य दुखी होकर चित्कार कर बैठे

दुनिया में अगर कहीं नर्क है
तो बस यहीं (भारत) है यहीं है!

क्रिकेट जैसे व्यवसायिक खेल के प्रति गजब की एकजुटता दिखाने वाले भारतीय, और खासकर इसकी युवा पीढ़ी, जिसमें करोड़ों युवा आते हैं, अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसी ही एकजुटता दिखा दें तो भारत के धनी से धनी, शक्तिशाली से शक्तिशाली, बड़े से बड़े लोग सात दिनों के अंदर घुटनों के बल बैठे मिलेंगे।

युवा पीढ़ी का सुंदर भविष्य निर्भर करता है इस बात पर कि उनका देश कितना ईमानदार है क्योंकि ईमानदार माहौल में ही वे अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं। भ्रष्टाचार मुक्त माहौल में वे अपने नये से नये विचारों को फलीभूत होते देखने का प्रयास कर सकते हैं। भ्रष्टाचार लील लेता है युवा पीढ़ी के अरमानों को।

भ्रष्टाचार से लड़ना आज के भारतीय युवा की सबसे बड़ी जरुरत है।

अगर आज नहीं लड़े तो फिर उन्हे एक भ्रष्ट देश के निकृष्टतम माहौल में ही बूढ़े होकर मर जाना होगा। और अगर आज भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त्त कर दिया गया तो इसकी उड़ान को दुनिया में कोई नहीं रोक सकता।

आज के आंदोलित माहौल में सबसे ज्यादा याद आते हैं तेजस्वी कवि स्व. दुष्यंत कुमार।

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

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आज सड़कों पर
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आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख
पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख

एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह
यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख

ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख

स्व. दुष्यंत कुमार की आग्नेय कविताओं का पाठ

P.S. : Pic. Courtesy The Hindu

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