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नवम्बर 24, 2014

नखशिख… (अज्ञेय)

agyeyaतुम्हारी देह
मुझको कनकचम्पे की कली है
दूर से ही स्मरण में भी गंध देती है
(रूप स्पर्शातीत वह जिसकी लुनाई
कुहासेसी चेतना को मोह ले)

तुम्हारे नैन
पहले भोर की दो ओस बूँदें हैं
अछूती, ज्योतिमय, भीतर द्रवित।
(मानो विधाता के हृदय में
जग गई हो भाप कणा की अपरिमित)

तुम्हारे ओठ
पर उस दहकते दाड़िम पुहप को
मूक तकता रह सकूँ मैं
(सह सकूँ मैं ताप उष्मा को
मुझे जो लील लेती है।)

 

[अज्ञेय]

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