Posts tagged ‘Dopahar’

नवम्बर 2, 2015

1984 से 2002

देखो कैसी खिली है फ़सल अबके बरस कहर की
चीखों से फटी जाती है ख़ामोशी दोपहर की
लहू-चकां है आस्तीं हर हाकम-ए-शहर की
गली-गली में दौड़ रही है नदी-सी एक ज़हर की

दबी हुई सिसकियाँ, आब्रूएं लुटी हुईं
पगलाई हुई जुल्फ़ें, नज़रें बुझी हुईं
नोचे हुए नक़ुश, चूड़ियाँ टूटी हुईं
कांपती हुई रूहें, आरिज़ें सूजी हुईं

रक्सां है लाठी दर लाठी कूचा-ओ-बाज़ार
रंग-ए-खूं दमक रहा है कितने ही दर-ओ-दीवार
फैल रहा है किसी अफ़वाह जैसे नफ़रत का आज़ार
उठते-गिरते चमक रहे हैं खंजर और तलवार

और वोह चेहरे!
खौफ़नाक चैहरे मज़हबी वैह्शत के
ख़ुद से नाराज़ चैहरे छिनी हुई इज्ज़त के
मासूम चैहरे नासमझ दर्द के
बेख्वाब चैहरे जिस्म-ओ-जां सर्द के
दोगले चैहरे नकली ग़म-ख्वारों के
अंधे चैहरे शहर के पहरेदारों के

उस दौर-ए-क़त्ल-ए-आम की गवाही कौन देगा?
मुआफ्ज़ा-ए-मौत-ओ-तबाही कौन देगा?
कोई नहीं, कोई नहीं, कोई भी नहीं

सिवाए उस धुएं के
जो जा-बा-जा बेघर भटक रहा है, अब तक
कातिलों के ज़हन में खटक रहा है, अब तक
शायर की आँखों में अटक रहा है, अब तक

(सिफ़र)

जनवरी 14, 2014

दोपहर, साथ, नींद और पलायन

इस तरह तो न थे, हम-तुम! avishkar-001

दुश्वारियां जिंदगी की तो पता थीं

कल भी|

ये फिरकते वृत्त है रौशनी के

किनारियाँ अंधेरों की तो पता थीं

कल भी|

बुद्धू बुद्ध की नींद भी गहरी

लाचारियाँ असमंजसों की तो पता थीं

कल भी|

सयानेपन की तुम्हारे भी सीमाएं हैं

पारियां बचपने की मेरी तो पता थीं

कल भी|

निर्वात तोडता है देह का चुम्बक

सीढियां लम्बी समाधानों की तो पता थीं

कल भी|

रिश्ते हैं कई मेरे और तुम्हारे तईं

गारियाँ सर्द अबोलों की तो पता थीं

कल भी|

कई तो हैं संजोग, ऐसे-वैसे

कलाकारियाँ कायनात की तो पता थीं

कल भी|

सिर्फ बोलों के आईने में रिश्तों का सच

दीवारियाँ रंग-ऐ-नस्ल की तो पता थीं

कल भी|

अपने-अपने सुखों में चटख आए दुख

बीमारियाँ सुखों -दुखों की तो पता थीं

कल भी|

प्यार भरे वो तरंगित, शर्मीले स्पंदन

यारियाँ दिल से दिल की तो पता थीं

कल भी|

Yugalsign1

अगस्त 14, 2011

एक पूरा दिन

उगते सूरज की सुबह
और डूबते सूरज की शाम के बीच
एक पूरा दिन है।

समस्यायों की फेहरिश्त के साथ
लड़ाई शुरु होती है
एक के अंत पर
दूसरी रोती है।

यह दोपहर से पहले का हाल है
उपलब्धियों के बीच
आदमी, कंगाल है।

मरीचिका की मार से
टूटता ज़िस्म लिये एक दौड़ जारी है
कुछ थोड़ा और
पाने की ललक भरी लाचारी है।

फटी-फटी आँखों पर
धूल अटी रुमाल है
सुबह की लाली में होश था
शाम की लाली निढ़ाल है।

और
दोनों के बीच
एक पूरा दिन है।

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 5, 2011

अहसास जो तुम्हे जीवंत रखता है

जीवन के
सर्द कठिन दिनों में
आसमान में
एक बादल का टुकड़ा
मन व्याकुल कर देता है
सूरज की गर्मी से
वंचित होने के अहसास से
तपती दोपहरी में
तपते हाँफते वदन को
यही वह बादल का टुकड़ा
मन
अलाह्दित ,हर्षित कर देता है
वर्षा की बौछार की
राहत देने वाली
आशा से
फिर वर्षा ऋतु में
यही बादल का टुकड़ा
भयभीत….
आतंकित कर देता है
जोर की वर्षा से
होने वाली
तबाही से
और यही बादल का टुकड़ा
हेमंत में फिर
शरद आने का
आभास दिलाकर
फिर व्याकुल कर देता है
सतरंगी खिली धूप के साथ
सुगन्धित खिलते फूलों की
मुस्कान से मदमाती खुशी
लेकर आते
बसंत की
आहट तक
बादल का यह टुकड़ा मन है
और
आत्मा सूरज है
सूरज के इर्द-गिर्द घूमते
बादल के टुकड़े
और
आत्मा के इर्द-गिर्द घूमते
मन का अहसास
एक जैसा ही है
जैसे बादल का टुकड़ा
अल्प काल के लिए
सूरज को छिपा तो सकता है
लेकिन उसके होने के
अहसास को
मिटा नहीं सकता
ठीक जिस तरह मन
अल्प काल के लिए
आत्मा को भ्रमित
तो कर सकता है
लेकिन उसके होने का
अहसास नहीं मिटा सकता
मौसम
ऋतु परिवर्तन
स्वाभाविक है
नियति है
इसीलिए तो
परिवर्तित होता है मन
व्याकुलता और हर्षता में
लेकिन हर स्थिति
परिवर्तन में
यही एक अहसास
तुम्हे जीवंत रखता है
और सुख देता है कि
बादल से मन के
टुकड़े के पीछे
सूरज सी आत्मा की रोशनी
सदैव महसूसती
और
अहसासती है!

(अश्विनी रमेश)

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