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सितम्बर 27, 2016

परिधियां… (किशन पटनायक)

KishanPatnayakविद्यालयों, कार्यालयों, मंत्रालयों की
घंटियां और सीटियां
जब विराम का ऐलान करती हैं
अरमान मुक्त होते हैं
दुकानों की रंगबिरंगी बत्तियां
कपड़ों और चेहरों को
उद्भासित विवर्णित कर
आदमी को बाजा़र खींचता है
लोग कहते हैं
शहर में
शाम आ गई।
इस भूखंड का सूरज
उस भूखंड के लिए
मकानों के पीछे
लुढ़क जाता है
लाल टमाटर जैसे मुंह कर
क्या रोज की विदाई कोई शर्म की बात है?

आदमी का मन उसके पास वापस आता है
जैसे पानी में चापा हुआ गेंद
ऊपर से पत्थर हट गया हो,
मेरे शरीर के अंदर
एक सवाल जगता है
जहां कुंडलिनि सोयी है।
वहां से निकल
कलेजा जकड़
दिमाग को भर जाता है
“शाम का वक्त
आप कैसे गुजारते हैं?
मेरे लखनवी दोस्त
एम.ए. पास
सवालों का जवाब जिसके
बायें हाथ का खेल
ने कहा;
” हजरत गंज के
ऊपर नीचे
हम टहलते हैं
झक मारते हैं
(ज्यादा से ज्यादा)
कहवाघर में
गप लड़ाते हैं
धुआं उड़ाते हैं,
कहवे की चुस्की
धुएं के कशों से
शाम और आत्मा को
भर डालते हैं।”

[किशन पटनायक – (30 June 1930- 27 September 2004)]

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जुलाई 29, 2011

गुलाबी दुपट्टा

ऐसी ही भीगी रातों में
कांपते थे हाथ, दिल और दिमाग
जब परत दर परत
जिस्मों के तलिस्म खुलते थे।

अधखुली पलकों में
ठहर जाती थी रात
होठों के जाग उठे उभारों पर
सियाह बदलियाँ अमृत बरसा जाती थी।

चाहत की मदिरा पीकर
मदहोश हो जाता था अहसास
विस्मरति के भवँर में डुबाते
आत्मबोध के वे लम्हे
शरीर के बंधनों से परे
आत्माओं का मिलन करा जाते थे
जहाँ अंतर मिट जाता है
मैं और तू के बीच
वही पल तो थे अपनी पहचान के।

आज भी खुल कर बरस रही है घटा
खिड़की के गीले शीशों से परे
धुंधला गए है सब मंज़र
उसी तरह के जब
मैंने माटी के अंधे घर में छोड़ा था तुम्हे।

साथ गुज़ारे लाखो लम्हे
एक साथ जल रहे थे
सुन्न हो गये ज़हन के अलाव में
आखों के चश्मे में भाप थी मगर
उस रोज रो कब पाया था मैं।

सुहाग का जोड़ा पहने
दूर जाते,
बहुत दूर जाते देखता रहा था तुम्हे,
तब से एक गुलाबी दुपट्टा
मेरे ख्यालों में लहरा जाता है अक्सर
सुहाने मौसमों में रुला जाता है अक्सर।

(रफत आलम)

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